नाबालिक शहीद को शत शत नमन


राजेश शर्मा 

 आज याद आ जाते हैं हर खुदी को खुदीराम बोस जब-जब अगस्त माह में एक के बाद एक यानि 11 अगस्त का दिन आएगा एक नाबालिग शहीद जरूर याद आएगा। मैं जानता हूं कि इसके बारे में बाजारु अखबार कुछ नहीं लिख पाएंगे, मैं यह भी जानता हूं कि देश को खाने और संसद में चिल्लाने वाले और दलबदलु नेता भी इस शहीद का स्मरण तक नहीं कर पाएंगे, फिर भी शहीदों के वंशजों की इस देश में कोई कमी नहीं है।

हम बताएं अपनी पीढ़ियों को की भारत और बंगाल का यह शेर अपनी जवानी की दहलीज पर कदम रखने वाला ही था कि महज 17 साल की आयु में शहीद हो गया और शाहदत भी ऐसा इतिहास बन गई  कि जब-जब भी शहीदों का जिक्र होगा, खुदीराम बोस का नाम आदर से लिया जाएगा।
इन्हीं के साथ जिक्र करना उचित होगा प्रफुल्ल कुमार चाकी का जिन्होंने पिस्टल से खुद को मारकर शहीद कर लिया था।
 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस ने अपनी 17 वर्ष की आयु में अंग्रेज शासक एवं जज मिस्टर किंग्स फोर्ड को जान से मारने का प्रयास किया था।
 सत 30 अप्रैल की थी निशाना चूका तो चुकता ही गया और गफलत मे मिस्टर कैनेडी घायल हुए, फेंके हुए बम से कैनेडी की बेटी की मौत हो गई, बंगाल के इस शेर को इस जुर्म के चलते ब्रिटिश शासकों ने ना केवल गिरफ्तार किया बल्कि उसे फांसी की सजा भी सुनाई। 11 अगस्त सन् 1908 को यह किशोर मुस्कुराते हुए फांसी के फंदे पर झूल गया। शव यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए खुदीराम बोस की भस्म पूरी तरह बुझ भी नहीं पाई थी कि वो वहां लोगों ने उसे समेट लिया , कुछ महिलाओं ने इसे धारणकर भस्म के ताबीज पहने , कुछ ने अंगूठी मे जड़वा लिया।तो कुछ लोगों ने इस राख को अपने पूजा घर में रख लिया इसके पीछे  सबका कहना यही था कि "मां पूत जने तो खुदीराम बोस जैसा" ,, मातृभूमि के लिए प्राण उत्सर्ग करने वाले इस महान योद्धा को नमन करना मेरे लिए गर्व का विषय है। 3 दिसंबर 1889 को जन्मे और 11 अगस्त 1908 को शहीद हुए इतिहास के इस महान योद्धा को भूलाया नहीं जा सकता।
शत-शत नमन
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