लेखिका
अख़बार के आंकड़ों में शायद यह जुड़ जाएगा कि इतने लोग सर्दी की चपेट में
आकर मर गए और उन कांकड़ों में यह नामहीन औरत भी रहेगी।
अरुण वर्मा अवकाश प्राप्त सरकारी अधिकारी थे। बहुत बड़े पद से सेवानिवृत्त
हुए थे। उसूल के पक्के इस अफसर के सामने खड़े होने से भी लोग डरते थे। कभी
झुक कर चले नहीं थे अरुण वर्मा, पर अब अपनी ही औलाद के सामने झुकना पड़
रहा था। लड़की उनको कभी पसन्द नहीं थी। हुई भी नहीं पैदा। जया को लड़कों को
ही लड़कियों वाले कपड़े पहनाकर खुश रहना पड़ता था।
बच्चे बड़े हुए तो उन्हें उचित शिक्षा के साथ बड़ा किया गया। वे तीनों अपने
पैरों पर खड़े हैं। अच्छी-अच्छी पोस्टों पर हैं। पर न जाने कहाँ कमी रह गई
कि तीनों के तीनों अत्यन्त आत्मकेंद्रित हैं। अगर एक साथ रह रहे हैं तो
केवल अरुण जी के इस आलीशान मकान की वजह से, जिसे प्यार से अरुण जी घर
कहते थे आज मकान कहते हैं। आजकल बात-बात पर उन्हें सुनना पड़ता है,
‘‘ज्यादा दिन जीना कितना खराब होता है, फलाने आदमी की इतनी उम्र है तो वह
आज बिस्तर पर है, औरों के ऊपर निर्भर करना पड़ता है, खाना-पीना,
नहाना-धोना इतना तक कि टायलेट तक नहीं जा सकते, कभी देर हो जाने से
बिस्तर भी खराब कर देते हैं, उनके बच्चे उन्हें मारते भी हैं
इत्यादि-इत्यादि कहानी बहुओं के मुँह से सुनकर जया डर जाती है और जब भी
मौका मिलता है अरुण जी को बताती है। अरुण जी केवल इतना ही बोल सकते हैं,
‘‘हम दोनों ही स्वस्थ हैं। इन लोगों को हमारे घर से मतलब है। हमारे मरते
ही तीनों बाँट-बूंटकर अलग होना चाहते हैं। हमसे प्यार नहीं है तो उन्हें
आपस में भी प्यार कहाँ है? बहुएँ भी हर तीसरे दिन एक दूसरे से लड़ पड़ती
हैं। साथ बेटे भी शुरू हो जाते हैं न जाने हमारी परवरिश में क्या कमी रह
गई थी। हाँ तुमने सही कहा था आज हमारी एक बेटी होती तो गले लगकर रो तो
लेतीं।
तुमने तो मेरे माता-पिता की कितनी सेवा की, अपने माता-पिता से भी बढ़कर
प्यार किया। मैं भी तो अपने माता-पिता का बेटा ही था, मैंने तो कभी नहीं
सोचा कि मैं अपने माँ-बाप की सेवा क्यों करूँ? मेरे और चार भाई भी तो हैं
और कभी नहीं चाहा कि वे बूढ़े हो गए हैं तो मर जाएँ। मैं तो सत्तर साल का
ही हूँ, पर मेरे पिता पिच्चासी साल जिए कभी एक दिन के लिए भी बिस्तर पर
नहीं पड़े। इनकी बातों से मत डरो। इस बासठ साल की उम्र में भी तुम तीनों
बहुएँ मिलकर जितना काम करती हैं उस से ज्यादा करती हो। हम अपने हाथ-पैरों
से जाएँगे और अच्छे जीकर जाएँगे। तुम उनकी बेतुकी बातों से मत डरो। वे
तुम्हारे मनोबल को तोड़ना चाहते हैं।’’
आजकल पहले की जया को अरुण जी ढूँढना चाहते हैं पर वह कहीं नहीं मिलती। वह
हँसी-खुशी, वह थोड़ी-सी बात में खुश हो जाना, सब कुछ कहीं खो गया है। कभी
अपने पोते-पोतियों के साथ थोड़ा-सा खुश रहती पर उसमें भी आज़ादी नहीं है।
‘‘माँ जी, ऐसा मत कीजिए, वैसा मत कीजिए, बच्चे गंदे मैनर्स सीख जाएँगे।’’
इतना ही नहीं, कभी-कभी जया अपने आप को ही भूल जाती है कि कभी वह स्कूल
में शिक्षिका थी। ये लोग तो उसे घर की नौकरानी की तरह डील करते हैं। जैसे
वह कोई जाहिल और अनपढ़ औरत हो। बैड मैनर्स-बैड मैनर्स सुन-सुनकर जया के
कान पक जाते हैं पर कुछ कह नहीं पाती। उनकी तीनो बहुएँ उनसे कम पढ़ी हैं।
पर तीनों उन्हें मैनर्स सिखाती हैं। कभी सोचती है, मैं इन लोगों से डरकर
क्यों रहती हूँ? अपने पति से डरकर रहते-रहते शायद आदत बन गई है। पर आजकल
पति भी बच्चों से डरकर रहते हैं। इतने कड़क स्वभाव के इन्सान ऐसे कैसे बदल
गए? पति का ऐसा असहाय, डरा-डरा चेहरा जया को अच्छा नहीं लगता है। अपना
घर, अच्छी पेंशन, आज भी दोनों का खर्चा अपने पैसे से ही चलता है फिर
क्यों ऐसा? कृतदास की तरह उनकी हर इच्छा को ही मुँह बंद करके पालन करना
पड़ता है। कभी-कभी अरुण जी को पहचान ही नहीं पाती जया। कहाँ शेर की तरह
दहाड़ने वाला अरुण वर्मा और कहाँ बहुओं के आदेश पर चार बच्चों को पार्क
में खिलाने ले जाने के लिए बाध्य अरुण वर्मा। कभी-कभी न चाहते हुए भी
उन्हें जाना पड़ता है। शरीर ठीक नहीं है तो उसे बहाना कहा जाता है। पहले
रख-ढक कर बोलती थी, अब बेटों का जोर पाकर खुले-आम अपमान करके हँस भी सकती
हैं बहुएँ। बेटे भी उनके साथ हँस लेते हैं। जैसे सामने खड़ा इन्सान बाप
नहीं, एक जोकर हो, या एक कामचोर नौकर हो जिसे पैसा भी नहीं देना पड़ता।
उल्टे कभी-कभी जरूरत पड़ने पर हाथ फैलाकर हज़ार-दो हज़ार लेने में भी शर्म
नहीं आती। लेते समय जरूर कहेंगे, ‘‘कल दे दूँगा’’ पर वह कल कभी नहीं आता।
बहुओं को आपस के सजने-संवरने के कम्पीटीशन से फुर्सत मिले तो ही काम
करेंगी न? और है तो चौबीस घण्टे की नौकरानी सास, जो मुँह से कुछ बोलती भी
नहीं। थककर चूर हो जाने पर भी बेटों की फरमाइश का खाना बनाती रहने में
माहिर। जब कभी बीमार पड़ती है जया, तब एक बार खाना बनाकर सारा दिन वही
परोसती रहती हैं। तब किसी के मुँह से चूँ तक नहीं निकलती। पर जब कभी कोई
रिश्तेदार आ जाय, जैसे जया की बहन-माँ या अरुण जी के भाई, जो कनाडा रहते
हैं अथवा अरुण जी की बहन जो आस्ट्रेलिया रहती है, तब इन लोगों का बर्ताव
देखने लायक होता है। क्योंकि इन लोगों के साथ आते हैं बहुओं के लिए कीमती
गिफ़्ट। ये भी खुश, वो भी खुश। बहुएँ दौड़-दौड़कर काम करेंगी। शाम को तीनों
में से कोई एक बारी-बारी बच्चों को पार्क ले जाएँगी। ‘‘पापा, आप विश्राम
कीजिए, मम्मी, इतनी सर्दी में आप ने शॉल नहीं लिया। केवल स्वेटर से काम
थोड़ ही चलता है। आप बीमार पड़ जाओगी। इतना पानी में मत रहिए, तबियत खराब
हो जाएगी। रोजमर्रा के काम ही अचानक बहुओं की चिन्ता का विषय हो जाते
हैं। पर जैसे ही अतिथि चले गए, वे भी साथ ही साथ बदल जाते हैं। जया उनके
यह नाटक देख-देख कर थक गई है। पर क्या करती? क्या उम्र हो जाने से ही
इन्सान को इतना असहाय हो जाना पड़ता है? जिसके पास अपना घर है, गुजारे
लायक साधन है, फिर क्यों यह डर? अपने बच्चों को खोने का डर, उनका साथ छुट
जाने का डर, अब भी कहाँ साथ है? साथ रहकर भी तो बहुत दूर रहते हैं कि
उन्हें छुआ तक नहीं जाता। फिर यह साथ का क्या मतलब हुआ?
आज न जाने क्या हुआ, सुबह-सुबह जया ने एक अजीब-सा संकल्प लिया। उसने अरुण
वर्मा को कहा, ‘‘तुम्हें याद है, जब हमने यह घर बनाया था उस समय पहले
मैंने अपने स्कूल की सहेलियों के साथ एक फ़्लैट बुक किया था। तुमने बहुत
गुस्सा किया था। आज तक तुमने वह घर देखा भी नहीं। मैंने थोड़ा-थोड़ा करके
किस्तों में पैसा जमा करके वह घर किराए पर चढ़ा रखा है। उसका कुछ पैसा भी
जमा है। छोटा ही सही, मैं उस घर में जाना चाहती हूँ। एक स्वाधीन ज़िन्दगी
जीना चाहती हूँ। इस तरह साथ रह के भी न रहना और सड़ते रहना, नौकरानी की
तरह बर्ताव सहन करना, मुझसे और नहीं होता। दूर रहकर बच्चों को खुश देखना
चाहती हूँ। मैं केवल जिन्दा हूँ, इस दोष से ताना सुनते रहना, पेंशन का
पैसा भी उनके हाथ में रख देने के बावजूद भी.....मैं उस घर में जाकर रहना
चाहती हूँ। तुम मेरा साथ दे सकते हो तो चलो, नहीं तो मैं ही....’’
अरुण वर्मा ने आज से पहले कभी अपनी पत्नि को इस मूड में नहीं देखा। इस
तरह बात करते नहीं देखा। घर में हामी भरना ही उसकी आदत थी, आज क्या हुआ?
अरुण जी चुप हो गए, कुछ कह नहीं पाए पर उनके मन को भी इस बात ने झिंझोड़
दिया। आज पत्नि के सामने हार जाने का मन कर रहा था पर चुपचाप वहाँ से चले
गए। शायद उन्हें कुछ समय चाहिए था। अपने अन्दर झांककर देखने के लिए और
सोचने के लिए। शायद उन्हें कुछ ताकत की जरूरत महसूस हो रही थी इतना बड़ा
कदम उठाने से पहले।
रोज़ सुबह-शाम घर से जब वे टहलने के लिए निकलते तो उन्हें रास्ते में
रेलवे के इसी कोने से निकलना पड़ता था जहाँ वे खड़े थे। आज सुबह-सवेरे जब
अरुण जी वहाँ पहुँचे तो उन्होंने देखा, मोड़ पर एक स्त्री मरी पड़ी थी।
उसकी गोद में एक छः-सात महीने का बच्चा था जो खूब रो रहा था। भीड़ तो जुटी
थी, पर कोई उस स्त्री को छूने की हिम्मत भी नहीं कर रहा था पुलिस के डर
से। अरुण जी ने सामने जाकर देखा, वह एक लड़की थी। अरुण जी ने झट सोच लिया,
क्या करना है। झुककर बच्ची को गोद में उठा लिया और वहाँ खड़े पुलिसमैन को
अपना कार्ड थमाते हुए बोले, ‘‘यह मेरा पता है, मैं इस बच्ची को ले जा रहा
हूँ। यह भूखी है, मर जाएगी।’’ पुलिस वालों ने उनसे लिखवा लिया और बच्ची
को उन के हवाले कर दिया। अच्छी पोस्ट पर रहने और एक ईमानदार अधिकारी होने
से उनको इस छोटे-से शहर में सब जानते थे।
घर लौटकर जया को सारी बात बता दी और पूछा, ‘‘क्या तुम इस उमर में इस
बच्ची को सम्भाल पाओगी?’’
जया ने हँसकर कहा, ‘‘क्यों नहीं, इस उमर में इतना कुछ कर सकती हूँ तो एक
पुतली और सही। मन बहला लूँगी इस पुतली से। पोती-पोतों को तो अपने हिसाब
से कभी प्यार भी नहीं कर पाई। बस उतना, जितना उनके माँ-बाप सही समझते
हैं। बाकी तो मेरा सब कुछ बैड मैनर्स है। यह भी लावारिस, हम भी उमर होने
के कारण लावारिस, इसलिए कोई रोक-टोक नहीं।’’ कहने के साथ ही दोनों हँस
पड़े, शायद सालों के बाद। जया ने कहा, ‘‘मैं पहले इसके लिए दूध लेकर आती
हूँ।’’
सालों से जया बहुओं को पूछ-पूछकर ही सब काम करती थी, उनकी कोई स्वाधीनता
तो थी ही नहीं, पर आज बिना किसी बात की परवाह किए किचन में जाकर दूध गरम
कर लाई और बच्ची को पिलाती रही। दुनियादारी से अनजान, भूखी बच्ची दूध
पीते ही एक निश्चिंत नींद में सो गई जया की गोद में। अरुण ने कहा, ‘‘इसे
कानूनन गोद लेंगे हम।’’
‘‘पर जब बच्चे पूछेंगे तो क्या कहेंगे आप? वे खुश तो नहीं होंगे।’’
‘‘हम कल ही हमारे छोटे-से घर में शिफ़्ट करेंगे और एक नई जिन्दगी शुरू
करेंगे। खुद के लिए जिएँगे। हम तीनों लावारिस।’’ दोनों ज़ोर-ज़ोर से हँसने
लगे, जी भरकर सालों के बाद जैसे ज़िन्दा हो उठे हों।
की शुरूआत हुई। असमिया, इंगलिश, बंगला में बाल अवस्था से ही कविता और
उसके बाद थोड़ा बड़ा होने पर कहानी, लेख इत्यादि की शुरूआत। नेपाली और हिंदी में कॉलेज के समय से लिखना शुरू। विभिन्न भाषाओं में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही। विभिन्न पुरस्कारों से भी पुरस्कृत
हुई। सत्यजीत राय के हाथों से बाल्यावस्था में ही पुरस्कृत हो चुकी हैं।
आज तक कई पुस्तकें छप चुकी हैं, जिसमें बाल कहानियाँ, बाल कविताओं का
संकलन भी है। कविता, कहानी, लेख, यात्रा वृत्तांत, लघु कथाएं सभी विधाओं
में लेखन कार्य करती हैं और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं।
संपादक
तीन लावारिस
बहुत भीड़ थी वहाँ, स्टेशन के कोने में एक गरीब औरत मरी पड़ी थी। कल केअख़बार के आंकड़ों में शायद यह जुड़ जाएगा कि इतने लोग सर्दी की चपेट में
आकर मर गए और उन कांकड़ों में यह नामहीन औरत भी रहेगी।
अरुण वर्मा अवकाश प्राप्त सरकारी अधिकारी थे। बहुत बड़े पद से सेवानिवृत्त
हुए थे। उसूल के पक्के इस अफसर के सामने खड़े होने से भी लोग डरते थे। कभी
झुक कर चले नहीं थे अरुण वर्मा, पर अब अपनी ही औलाद के सामने झुकना पड़
रहा था। लड़की उनको कभी पसन्द नहीं थी। हुई भी नहीं पैदा। जया को लड़कों को
ही लड़कियों वाले कपड़े पहनाकर खुश रहना पड़ता था।
बच्चे बड़े हुए तो उन्हें उचित शिक्षा के साथ बड़ा किया गया। वे तीनों अपने
पैरों पर खड़े हैं। अच्छी-अच्छी पोस्टों पर हैं। पर न जाने कहाँ कमी रह गई
कि तीनों के तीनों अत्यन्त आत्मकेंद्रित हैं। अगर एक साथ रह रहे हैं तो
केवल अरुण जी के इस आलीशान मकान की वजह से, जिसे प्यार से अरुण जी घर
कहते थे आज मकान कहते हैं। आजकल बात-बात पर उन्हें सुनना पड़ता है,
‘‘ज्यादा दिन जीना कितना खराब होता है, फलाने आदमी की इतनी उम्र है तो वह
आज बिस्तर पर है, औरों के ऊपर निर्भर करना पड़ता है, खाना-पीना,
नहाना-धोना इतना तक कि टायलेट तक नहीं जा सकते, कभी देर हो जाने से
बिस्तर भी खराब कर देते हैं, उनके बच्चे उन्हें मारते भी हैं
इत्यादि-इत्यादि कहानी बहुओं के मुँह से सुनकर जया डर जाती है और जब भी
मौका मिलता है अरुण जी को बताती है। अरुण जी केवल इतना ही बोल सकते हैं,
‘‘हम दोनों ही स्वस्थ हैं। इन लोगों को हमारे घर से मतलब है। हमारे मरते
ही तीनों बाँट-बूंटकर अलग होना चाहते हैं। हमसे प्यार नहीं है तो उन्हें
आपस में भी प्यार कहाँ है? बहुएँ भी हर तीसरे दिन एक दूसरे से लड़ पड़ती
हैं। साथ बेटे भी शुरू हो जाते हैं न जाने हमारी परवरिश में क्या कमी रह
गई थी। हाँ तुमने सही कहा था आज हमारी एक बेटी होती तो गले लगकर रो तो
लेतीं।
तुमने तो मेरे माता-पिता की कितनी सेवा की, अपने माता-पिता से भी बढ़कर
प्यार किया। मैं भी तो अपने माता-पिता का बेटा ही था, मैंने तो कभी नहीं
सोचा कि मैं अपने माँ-बाप की सेवा क्यों करूँ? मेरे और चार भाई भी तो हैं
और कभी नहीं चाहा कि वे बूढ़े हो गए हैं तो मर जाएँ। मैं तो सत्तर साल का
ही हूँ, पर मेरे पिता पिच्चासी साल जिए कभी एक दिन के लिए भी बिस्तर पर
नहीं पड़े। इनकी बातों से मत डरो। इस बासठ साल की उम्र में भी तुम तीनों
बहुएँ मिलकर जितना काम करती हैं उस से ज्यादा करती हो। हम अपने हाथ-पैरों
से जाएँगे और अच्छे जीकर जाएँगे। तुम उनकी बेतुकी बातों से मत डरो। वे
तुम्हारे मनोबल को तोड़ना चाहते हैं।’’
आजकल पहले की जया को अरुण जी ढूँढना चाहते हैं पर वह कहीं नहीं मिलती। वह
हँसी-खुशी, वह थोड़ी-सी बात में खुश हो जाना, सब कुछ कहीं खो गया है। कभी
अपने पोते-पोतियों के साथ थोड़ा-सा खुश रहती पर उसमें भी आज़ादी नहीं है।
‘‘माँ जी, ऐसा मत कीजिए, वैसा मत कीजिए, बच्चे गंदे मैनर्स सीख जाएँगे।’’
इतना ही नहीं, कभी-कभी जया अपने आप को ही भूल जाती है कि कभी वह स्कूल
में शिक्षिका थी। ये लोग तो उसे घर की नौकरानी की तरह डील करते हैं। जैसे
वह कोई जाहिल और अनपढ़ औरत हो। बैड मैनर्स-बैड मैनर्स सुन-सुनकर जया के
कान पक जाते हैं पर कुछ कह नहीं पाती। उनकी तीनो बहुएँ उनसे कम पढ़ी हैं।
पर तीनों उन्हें मैनर्स सिखाती हैं। कभी सोचती है, मैं इन लोगों से डरकर
क्यों रहती हूँ? अपने पति से डरकर रहते-रहते शायद आदत बन गई है। पर आजकल
पति भी बच्चों से डरकर रहते हैं। इतने कड़क स्वभाव के इन्सान ऐसे कैसे बदल
गए? पति का ऐसा असहाय, डरा-डरा चेहरा जया को अच्छा नहीं लगता है। अपना
घर, अच्छी पेंशन, आज भी दोनों का खर्चा अपने पैसे से ही चलता है फिर
क्यों ऐसा? कृतदास की तरह उनकी हर इच्छा को ही मुँह बंद करके पालन करना
पड़ता है। कभी-कभी अरुण जी को पहचान ही नहीं पाती जया। कहाँ शेर की तरह
दहाड़ने वाला अरुण वर्मा और कहाँ बहुओं के आदेश पर चार बच्चों को पार्क
में खिलाने ले जाने के लिए बाध्य अरुण वर्मा। कभी-कभी न चाहते हुए भी
उन्हें जाना पड़ता है। शरीर ठीक नहीं है तो उसे बहाना कहा जाता है। पहले
रख-ढक कर बोलती थी, अब बेटों का जोर पाकर खुले-आम अपमान करके हँस भी सकती
हैं बहुएँ। बेटे भी उनके साथ हँस लेते हैं। जैसे सामने खड़ा इन्सान बाप
नहीं, एक जोकर हो, या एक कामचोर नौकर हो जिसे पैसा भी नहीं देना पड़ता।
उल्टे कभी-कभी जरूरत पड़ने पर हाथ फैलाकर हज़ार-दो हज़ार लेने में भी शर्म
नहीं आती। लेते समय जरूर कहेंगे, ‘‘कल दे दूँगा’’ पर वह कल कभी नहीं आता।
बहुओं को आपस के सजने-संवरने के कम्पीटीशन से फुर्सत मिले तो ही काम
करेंगी न? और है तो चौबीस घण्टे की नौकरानी सास, जो मुँह से कुछ बोलती भी
नहीं। थककर चूर हो जाने पर भी बेटों की फरमाइश का खाना बनाती रहने में
माहिर। जब कभी बीमार पड़ती है जया, तब एक बार खाना बनाकर सारा दिन वही
परोसती रहती हैं। तब किसी के मुँह से चूँ तक नहीं निकलती। पर जब कभी कोई
रिश्तेदार आ जाय, जैसे जया की बहन-माँ या अरुण जी के भाई, जो कनाडा रहते
हैं अथवा अरुण जी की बहन जो आस्ट्रेलिया रहती है, तब इन लोगों का बर्ताव
देखने लायक होता है। क्योंकि इन लोगों के साथ आते हैं बहुओं के लिए कीमती
गिफ़्ट। ये भी खुश, वो भी खुश। बहुएँ दौड़-दौड़कर काम करेंगी। शाम को तीनों
में से कोई एक बारी-बारी बच्चों को पार्क ले जाएँगी। ‘‘पापा, आप विश्राम
कीजिए, मम्मी, इतनी सर्दी में आप ने शॉल नहीं लिया। केवल स्वेटर से काम
थोड़ ही चलता है। आप बीमार पड़ जाओगी। इतना पानी में मत रहिए, तबियत खराब
हो जाएगी। रोजमर्रा के काम ही अचानक बहुओं की चिन्ता का विषय हो जाते
हैं। पर जैसे ही अतिथि चले गए, वे भी साथ ही साथ बदल जाते हैं। जया उनके
यह नाटक देख-देख कर थक गई है। पर क्या करती? क्या उम्र हो जाने से ही
इन्सान को इतना असहाय हो जाना पड़ता है? जिसके पास अपना घर है, गुजारे
लायक साधन है, फिर क्यों यह डर? अपने बच्चों को खोने का डर, उनका साथ छुट
जाने का डर, अब भी कहाँ साथ है? साथ रहकर भी तो बहुत दूर रहते हैं कि
उन्हें छुआ तक नहीं जाता। फिर यह साथ का क्या मतलब हुआ?
आज न जाने क्या हुआ, सुबह-सुबह जया ने एक अजीब-सा संकल्प लिया। उसने अरुण
वर्मा को कहा, ‘‘तुम्हें याद है, जब हमने यह घर बनाया था उस समय पहले
मैंने अपने स्कूल की सहेलियों के साथ एक फ़्लैट बुक किया था। तुमने बहुत
गुस्सा किया था। आज तक तुमने वह घर देखा भी नहीं। मैंने थोड़ा-थोड़ा करके
किस्तों में पैसा जमा करके वह घर किराए पर चढ़ा रखा है। उसका कुछ पैसा भी
जमा है। छोटा ही सही, मैं उस घर में जाना चाहती हूँ। एक स्वाधीन ज़िन्दगी
जीना चाहती हूँ। इस तरह साथ रह के भी न रहना और सड़ते रहना, नौकरानी की
तरह बर्ताव सहन करना, मुझसे और नहीं होता। दूर रहकर बच्चों को खुश देखना
चाहती हूँ। मैं केवल जिन्दा हूँ, इस दोष से ताना सुनते रहना, पेंशन का
पैसा भी उनके हाथ में रख देने के बावजूद भी.....मैं उस घर में जाकर रहना
चाहती हूँ। तुम मेरा साथ दे सकते हो तो चलो, नहीं तो मैं ही....’’
अरुण वर्मा ने आज से पहले कभी अपनी पत्नि को इस मूड में नहीं देखा। इस
तरह बात करते नहीं देखा। घर में हामी भरना ही उसकी आदत थी, आज क्या हुआ?
अरुण जी चुप हो गए, कुछ कह नहीं पाए पर उनके मन को भी इस बात ने झिंझोड़
दिया। आज पत्नि के सामने हार जाने का मन कर रहा था पर चुपचाप वहाँ से चले
गए। शायद उन्हें कुछ समय चाहिए था। अपने अन्दर झांककर देखने के लिए और
सोचने के लिए। शायद उन्हें कुछ ताकत की जरूरत महसूस हो रही थी इतना बड़ा
कदम उठाने से पहले।
रोज़ सुबह-शाम घर से जब वे टहलने के लिए निकलते तो उन्हें रास्ते में
रेलवे के इसी कोने से निकलना पड़ता था जहाँ वे खड़े थे। आज सुबह-सवेरे जब
अरुण जी वहाँ पहुँचे तो उन्होंने देखा, मोड़ पर एक स्त्री मरी पड़ी थी।
उसकी गोद में एक छः-सात महीने का बच्चा था जो खूब रो रहा था। भीड़ तो जुटी
थी, पर कोई उस स्त्री को छूने की हिम्मत भी नहीं कर रहा था पुलिस के डर
से। अरुण जी ने सामने जाकर देखा, वह एक लड़की थी। अरुण जी ने झट सोच लिया,
क्या करना है। झुककर बच्ची को गोद में उठा लिया और वहाँ खड़े पुलिसमैन को
अपना कार्ड थमाते हुए बोले, ‘‘यह मेरा पता है, मैं इस बच्ची को ले जा रहा
हूँ। यह भूखी है, मर जाएगी।’’ पुलिस वालों ने उनसे लिखवा लिया और बच्ची
को उन के हवाले कर दिया। अच्छी पोस्ट पर रहने और एक ईमानदार अधिकारी होने
से उनको इस छोटे-से शहर में सब जानते थे।
घर लौटकर जया को सारी बात बता दी और पूछा, ‘‘क्या तुम इस उमर में इस
बच्ची को सम्भाल पाओगी?’’
जया ने हँसकर कहा, ‘‘क्यों नहीं, इस उमर में इतना कुछ कर सकती हूँ तो एक
पुतली और सही। मन बहला लूँगी इस पुतली से। पोती-पोतों को तो अपने हिसाब
से कभी प्यार भी नहीं कर पाई। बस उतना, जितना उनके माँ-बाप सही समझते
हैं। बाकी तो मेरा सब कुछ बैड मैनर्स है। यह भी लावारिस, हम भी उमर होने
के कारण लावारिस, इसलिए कोई रोक-टोक नहीं।’’ कहने के साथ ही दोनों हँस
पड़े, शायद सालों के बाद। जया ने कहा, ‘‘मैं पहले इसके लिए दूध लेकर आती
हूँ।’’
सालों से जया बहुओं को पूछ-पूछकर ही सब काम करती थी, उनकी कोई स्वाधीनता
तो थी ही नहीं, पर आज बिना किसी बात की परवाह किए किचन में जाकर दूध गरम
कर लाई और बच्ची को पिलाती रही। दुनियादारी से अनजान, भूखी बच्ची दूध
पीते ही एक निश्चिंत नींद में सो गई जया की गोद में। अरुण ने कहा, ‘‘इसे
कानूनन गोद लेंगे हम।’’
‘‘पर जब बच्चे पूछेंगे तो क्या कहेंगे आप? वे खुश तो नहीं होंगे।’’
‘‘हम कल ही हमारे छोटे-से घर में शिफ़्ट करेंगे और एक नई जिन्दगी शुरू
करेंगे। खुद के लिए जिएँगे। हम तीनों लावारिस।’’ दोनों ज़ोर-ज़ोर से हँसने
लगे, जी भरकर सालों के बाद जैसे ज़िन्दा हो उठे हों।
-- कुहेली भट्टाचार्जी डिब्रूगढ़ (असम)
------------------------------परिचय
कुहेली भट्टाचार्या, डिब्रूगढ़, आसाम में जन्म हुआ। छः साल की उम्र से लेखन कार्यकी शुरूआत हुई। असमिया, इंगलिश, बंगला में बाल अवस्था से ही कविता और
उसके बाद थोड़ा बड़ा होने पर कहानी, लेख इत्यादि की शुरूआत। नेपाली और हिंदी में कॉलेज के समय से लिखना शुरू। विभिन्न भाषाओं में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही। विभिन्न पुरस्कारों से भी पुरस्कृत
हुई। सत्यजीत राय के हाथों से बाल्यावस्था में ही पुरस्कृत हो चुकी हैं।
आज तक कई पुस्तकें छप चुकी हैं, जिसमें बाल कहानियाँ, बाल कविताओं का
संकलन भी है। कविता, कहानी, लेख, यात्रा वृत्तांत, लघु कथाएं सभी विधाओं
में लेखन कार्य करती हैं और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं।
संपादक


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