लेखक
#कविता
बाबा भी हुक्के के दम में खोज रहें है
अपने लिए एक जीवन्त फसल
जिससे एक घर की लौ कायम रहे।
हर रोज हमारे घर में मदिरा के बाद
चिल्ल-पों, चिल्ल-पों की आवाज सुनाई पड़ती है
मुहल्ले के लोग कहते हैं;
"लो, शुरू हुआ एक डोम कचकच..."
ईंट का जवाब पत्थर से देना
अब मुमकिन है जब डोम कचकच हमारे घर में शुरू हो जाएं
तब हम काले-काले लोग मुस्कुराते हैं काले समय में
जब भी हम आदि से अंत की तरफ बढ़ते हैं
एक प्रश्न हमेशा मौजूद रहता है?
पत्थर में मौजूद ईश्वर की तरह
झुग्गी में ले जाउंगा आदिवासी होने का सबूत
आज खरीद कर ले गया मैं
अपने और अपने पुत्र के लिए चिमटा
जब बदमाशी हद से ज्यादा हो जाती है तो
यही चिमटा उसके पीठ पर उसके आदिवासी होने का प्रतीक बन जाता है।
नग्न शरीर पर उकेर दिया जाता है आज भी कई जख्म
हम उज्ज्वल भविष्य की चिंता नहीं करते हैं
हम एक वक्त की रोटी की चिंता करते हैं।
हम चिंता करते हैं सिद्धु-कानू के इतिहास की
घर, बेटी,माता-पिता और अपने सभ्य समाज की
जिसमें हम आज भी घूंट कर जी रहे हैं।
जी रहे हैं बिन पक्के मकान के
जी रहे हैं बिन खेत-खलिहानों के
जी रहे हैं बिन वस्त्र के
जी रहे हैं बिन चप्पल के
जी रहे हैं बिन स्मार्ट इंडिया के
जी, हाँ! हम आदि हो चुके हैं
क्योंकि कोई भी हमें अपनाने के नाम पर आश्वासन देते फिरते हैं।
हम ठीक है;
अपनी एक अलग एक दुनिया में
जिसमें हमें कोई नीचा दिखाने के लिए
नहीं बेंच देता है अपने आप को
कोई हमारे इज्जत से खिलवाड़ तो नहीं करता है
अरे! हम भी इंसान और मानवता को समझते हैं
हम भी समझते हैं कि
मानव जीवन के मूल्य
जिसमें उल्लिखित है एक असभ्य समाज
जो यथार्थ से बिलकुल अलग है।
आदिवासी होने का प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है
आदिवासी होने के लिए जरूरी नहीं किसी क्षेत्रीय भाषा, पहनावे-ओढावे, खाद्य व्यंजन आदि सीखने की
बस जरूरी है कि
एक इंसान को इंसान के नजरिए से देखने की।
तब तुम स्वयं हर जाति, धर्म को त्याग बन जाओगे
एक स्मार्ट इंडियन
जिसमें दर्ज होगा हर मनुष्य के भीतर आदिवासी होने का प्रमाण।
लिखावट सी महीन
त्वचा सुन्दरता से भरपूर
लिखती हो काजल की कालिख से कविताएँ
सच कहूँ तो
तुम स्री ही हो सकतीं हो।
विचारणीय होतीं हैं तुम्हारी सोची हुई हर बातें
क्योंकि
हर बात में उपस्थित हो
तुम, तुम्हारी जीभ, आवाज़ और होठों से निकली भांप
सच कहूँ तो
लगता है कि इसी भांप से
तुम सेंकती हो तपती भट्टी पर रोटियाँ
हाँ! तुम ही हो जन्मदात्री
जिसने इस पृथ्वी को जन्म दिया है
जन्म दिया है
हमें, वनस्पति व जीवों को
इस धरती के सुख-दुखों को
पहचाना मैं
भूल गया था तुम्हें
जान पाया हूँ
अर्द्ध उम्र के बाद...
सच कहूँ तो
अवश्य मैं तुम्हें
और भी जानना चाहता हूँ कि
तुम अभी भी कहीं न कहीं
शेष बची हो;
मेरे अंदर
इस धरती के अंदर
ब्रह्माण्ड के अंदर
चारो धामों के अंदर
सिंदूर से लेकर सफेद रंगों के अंदर...!
जिसे मैं जानना चाहता हूँ कि
एक स्री को पहचानने के लिए
क्या हर पुरूष को भी कभी स्री होना चाहिए
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आप अनुगूँज अर्द्धवार्षिक साहित्य पत्रिका के संपादक भी हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक
#कविता
आदिवासी
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मासी ने खेतों में रोप दिए हैं धान के बीज
बुच्चिया ने मुँह में दुध चूसने वाले प्लास्टिक के निप्पल को ही मां का स्तन समझ लिया हैबाबा भी हुक्के के दम में खोज रहें है
अपने लिए एक जीवन्त फसल
जिससे एक घर की लौ कायम रहे।
हर रोज हमारे घर में मदिरा के बाद
चिल्ल-पों, चिल्ल-पों की आवाज सुनाई पड़ती है
मुहल्ले के लोग कहते हैं;
"लो, शुरू हुआ एक डोम कचकच..."
ईंट का जवाब पत्थर से देना
अब मुमकिन है जब डोम कचकच हमारे घर में शुरू हो जाएं
तब हम काले-काले लोग मुस्कुराते हैं काले समय में
जब भी हम आदि से अंत की तरफ बढ़ते हैं
एक प्रश्न हमेशा मौजूद रहता है?
पत्थर में मौजूद ईश्वर की तरह
झुग्गी में ले जाउंगा आदिवासी होने का सबूत
आज खरीद कर ले गया मैं
अपने और अपने पुत्र के लिए चिमटा
जब बदमाशी हद से ज्यादा हो जाती है तो
यही चिमटा उसके पीठ पर उसके आदिवासी होने का प्रतीक बन जाता है।
नग्न शरीर पर उकेर दिया जाता है आज भी कई जख्म
हम उज्ज्वल भविष्य की चिंता नहीं करते हैं
हम एक वक्त की रोटी की चिंता करते हैं।
हम चिंता करते हैं सिद्धु-कानू के इतिहास की
घर, बेटी,माता-पिता और अपने सभ्य समाज की
जिसमें हम आज भी घूंट कर जी रहे हैं।
जी रहे हैं बिन पक्के मकान के
जी रहे हैं बिन खेत-खलिहानों के
जी रहे हैं बिन वस्त्र के
जी रहे हैं बिन चप्पल के
जी रहे हैं बिन स्मार्ट इंडिया के
जी, हाँ! हम आदि हो चुके हैं
क्योंकि कोई भी हमें अपनाने के नाम पर आश्वासन देते फिरते हैं।
हम ठीक है;
अपनी एक अलग एक दुनिया में
जिसमें हमें कोई नीचा दिखाने के लिए
नहीं बेंच देता है अपने आप को
कोई हमारे इज्जत से खिलवाड़ तो नहीं करता है
अरे! हम भी इंसान और मानवता को समझते हैं
हम भी समझते हैं कि
मानव जीवन के मूल्य
जिसमें उल्लिखित है एक असभ्य समाज
जो यथार्थ से बिलकुल अलग है।
आदिवासी होने का प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है
आदिवासी होने के लिए जरूरी नहीं किसी क्षेत्रीय भाषा, पहनावे-ओढावे, खाद्य व्यंजन आदि सीखने की
बस जरूरी है कि
एक इंसान को इंसान के नजरिए से देखने की।
तब तुम स्वयं हर जाति, धर्म को त्याग बन जाओगे
एक स्मार्ट इंडियन
जिसमें दर्ज होगा हर मनुष्य के भीतर आदिवासी होने का प्रमाण।
रोहित प्रसाद पथिक , आसनसोल, पश्चिम बंगाल
++++++(+)स्री
(एक स्री को समझते हुए)लिखावट सी महीन
त्वचा सुन्दरता से भरपूर
लिखती हो काजल की कालिख से कविताएँ
सच कहूँ तो
तुम स्री ही हो सकतीं हो।
विचारणीय होतीं हैं तुम्हारी सोची हुई हर बातें
क्योंकि
हर बात में उपस्थित हो
तुम, तुम्हारी जीभ, आवाज़ और होठों से निकली भांप
सच कहूँ तो
लगता है कि इसी भांप से
तुम सेंकती हो तपती भट्टी पर रोटियाँ
हाँ! तुम ही हो जन्मदात्री
जिसने इस पृथ्वी को जन्म दिया है
जन्म दिया है
हमें, वनस्पति व जीवों को
इस धरती के सुख-दुखों को
पहचाना मैं
भूल गया था तुम्हें
जान पाया हूँ
अर्द्ध उम्र के बाद...
सच कहूँ तो
अवश्य मैं तुम्हें
और भी जानना चाहता हूँ कि
तुम अभी भी कहीं न कहीं
शेष बची हो;
मेरे अंदर
इस धरती के अंदर
ब्रह्माण्ड के अंदर
चारो धामों के अंदर
सिंदूर से लेकर सफेद रंगों के अंदर...!
जिसे मैं जानना चाहता हूँ कि
एक स्री को पहचानने के लिए
क्या हर पुरूष को भी कभी स्री होना चाहिए
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परिचय
रोहित प्रसाद पथिक , आसनसोल, पश्चिम बंगाल के निवासी हैं। कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, पुस्तक समीक्षा व रेखाचित्रों का निरन्तर प्रकाशन होता रहता है। एक काव्य संग्रह " ईश्वर को मरते देखा है !" हाल ही में प्रकाशित हुआ है।आप अनुगूँज अर्द्धवार्षिक साहित्य पत्रिका के संपादक भी हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक


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