कृष्ण ने सिखाया हँसते हुए जीना... 

शैलेश तिवारी 

कृष्ण.... एक ऐसे अवतार... जो अकेले ही सोलह कलाओं से युक्त माने गए। इसकी पुष्टि अमेरिका हुए उस रिसर्च से होती है , जिसमें कृष्ण के अलावा राम, जीसस,  स्वामी विवेकानंद आदि अन्य को भी शामिल किया गया था। शोध का आधार यह रखा गया कि इनमे से कौन महापुरुष अपनी जिंदगी को किस लेबल पर जी पाया । आम आदमी अपने जीवन को औसतन तीसरे लेबल तक ही जी पाता है। यही रिसर्च बताती है कि अकेले कृष्ण ने ही अपने जीवन को सोलहवें लेबल पर जिया। वहाँ के जो सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन के विश्वविद्यालय हैं उनमे कृष्ण एक शोध विषय के रूप में इसलिए शामिल हैं कि वहाँ की प्रबंधन की पुस्तकों में कोई भी चेप्टर ऐसा नहीं है जिसमें कृष्ण का उदाहरण नहीं दिया गया हो। बात फिर चाहे फैमिली मेनेजमेंट की हो या फिर फंड मैनेजमेंट की अथवा मार्केटिंग मैनेजमेंट की, यानि मैनेजमेंट के हर टॉपिक पर कृष्ण के प्रबंधन का उल्लेख किया गया है। 
यह बात हम अधिकांश कृष्ण भक्तों के लिए गर्व जैसी अनुभूति करायेगी लेकिन इस पर हम को और हमारी अब तक की सभी सरकारों को अफ़सोस होना चाहिए कि कृष्ण का व्यक्तित्व और उनका कृतित्व दोनों ही हमारी शस्य श्यामला भूमि भारत वर्ष की बौद्धिक संपदा हैं । उन पर शोध का कार्य हमारे यहाँ ज्यादा होना चाहिए था लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। 
इससे अलग होकर हैं ये भी बात करें कि संपूर्ण कृष्ण को आज भी भारत में पूरा का पूरा स्वीकार ही नहीं किया जाता है । उदाहरण के रूप में हम उन्हें ले लेते हैं जिन्होंने उन्हें कान्हा के रूप में स्वीकारा .. उनके लिए यह कठिन रहा कुरुक्षेत्र के गीता का ज्ञान देने वाले कृष्ण को स्वीकार कर पायें। जिन्होंने उन्हें वंशीवाले कन्हैया के रूप में पूजा उनके लिए आसान नहीं रहा चक्रधारी कृष्ण की आराधना करना। जो वासुदेव सोलह हजार एक सौ राजकुमारियों के उद्धारक हों उनके द्वारा कन्हैया के रूप चीर हरण जैसी लीला को किया जाना स्वीकार ही नहीं हो पाता। कुछ लोग उनकी माखन चोरी की लीला को इस नजरिये से देख ही नहीं पाते हैं कि ये अन्यायी और क्रूर राजा कंस के खिलाफ एक प्रकार का जनांदोलन था। जो उसकी कर नीति का विरोध कर रहा था। रास रचाने वाले कृष्ण को मानने वाले इस बात को स्वीकार करने में हिचक जाते हैं कि इन्हीं कृष्ण ने शंख नामक राक्षस का उद्धार कर उसके अत्याचारों से वहाँ की प्रजा को मुक्त कराया। गाय चराने वाले बाल गोपाल की छवि को ह्रदय में धारण करने वाले श्रद्धालु उनकी द्वारिका बसाने वाले सृजनात्मक कार्य को याद ही नहीं कर पाते...। आज भारत में इस बात की भी जरूरत है कि कृष्ण के संपूर्ण व्यक्तित्व को पूजा जाए। उनके कृतित्व से कुछ सीखा जाए।  ये भी बताते हैं कि अकेले वो ही ऐसे अवतार हुए जो सत्ता के लिए संग्राम में नहीं उतरे..। जब भी संग्राम किया तो सत्ता किसी और के हवाले कर दी..। मथुरा जीत कर उग्रसेन को सौंपी तो द्वारिका का राज पिता वसुदेव को बनाया। नरकासुर को मारकर उसके बेटे को गद्दी पर बैठाया। कुरुक्षेत्र का युद्ध पांडवों के लिए लड़ा। 
खैर इससे अलग हट कर बात करें तो कृष्ण अकेले व्यक्तित्व हैं जिनसे मुलाकात करना उस दौर में सभी के लिए सुगम रहा जब वो कान्हा थे तब भी... और जब वह द्वारिकाधीश बन तब भी...। वर्तमान देखे तो उनकी कथा सुनाने वालों से मिलना ही काफी दुष्कर कार्य है। अकेले कृष्ण ऐसे अवतार हैं जो हर परिस्थिति में गाते हैं.... बजाते हैं... और नाचते भी हैं...। उनका अकेला यही गुण आज के जीवन के लिए मूल मंत्र है कि स्थिति से विचलित नहीं होकर मुस्कुराते हुए.. उनका सामना करने की कला भी कृष्ण ही हमें सिखाते हैं। जबकि उनके जीवन में आए कष्टों की तो हम अपने जीवन में कल्पना भी नहीं कर सकते। सारे संकटों का सामना वह हँसते हुए ही करते हैं। मानव बनकर समझा गए हैं कि जीवन जीने की रीत है... मस्ती से जीवन जीना..। जय श्री कृष्ण...। 

शैलेश तिवारी, सीहोर

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