कोई मतलब नहीं निकला संडे लाकडाउन का...
कलेक्टर अजय गुप्ता द्वारा शासन के निर्देशानुसार आदेश जारी किए गए थे कि रविवार यानि संडे को जिले मे लाकडाउन मतलब "तालाबंदी" रहेगी। लेकिन जिला मुख्यालय से मात्र 18 किलोमीटर दूर इछावर मे पूरे नियम और कानून के परकच्छे तब उड़ गए जब लोग बगैर मास्क लगाए झुंडों मे बैठकर गप्पे हांकते रहे।
एमपी मीडिया पाइंट की टीम ने जो दृश्य देखा वह इतना निकृष्ट था कि.......वर्णन करने मे शर्म महसूस हो रही है।
टीआई विहीन इछावर थाने के पुलिसकर्मी तमाशबीन बने हुए थे। लोग अपनी मर्जीमाफिक तरीके से घूम रहे थे। खासतौर पर इछावर का कोलीपुरा मोहल्ला बेलगाम था जिसके हालात हमने कैमरे मे कैद किए।
हालांकि "दवा-दारु" की दुकानों को छोड़ सबकुछ बंद था। लेकिन दुकानों की शटरें गिरने का पूर्ण मतलब यह तो नहीं कि "लाकडाउन" सफल।
नियमों के परिपालन मे जिनसे चूक हो रही है उन्हें नियमानुसार "सजा" मिलनी चाहिए। यह "कर्ताधर्ता" का प्रथम कर्तव्य बनता है। हम जैसे मीडियाकर्मी पूंछ हिलाते भी है (यदि सही हो रहा हो तो)
वर्ना पूंछ मरोड़ने मे भी माहिर हैं।
कानून का धागा जब-जब टूटता पाया जाएगा__ तब-तब.....एक-एक शब्द हथकड़ी बन जाएगा। कलम सिर्फ़ बही-खातों को लिखने के लिए नहीं बनी___इससे इतिहास पहले लिखा जाता है।
मुझे मक्खन मारना याद नहीं , मैं सिर्फ़ आइना दिखाता हूँ कि तुम जो शुध्द घीं परोस रहे हो उसमे "मय्यड़" कितना है।
वैसे समय तो एक दर्पण है जिसमें हम झांकते रहते हैं और अफसोस यह कि हम अपनी पीड़ा,कष्ट और गुनाहों पर आँखे चार करते हैं। नि:संदेह आज आस्था और विश्वासों के टुकड़े-टुकड़े हुए हैं। मनुष्यों को मवेशियों की तरह खुला छोड़ दिया गया और व्यापारियों को कह दिया गया कि दुकानें बंद रखें। व्यापारियों ने सरकार की बातें मानी लेकिन उससे हुआ क्या?
बेलगाम लोग कानून को धता बताते रहे। पब्लिक घर मे बैठकर नियम लागू करने वालों का "हंसी-मजाक" उड़ाती रही___क्योंकि कोई भी प्राणी मस्तिष्कविहीन नहीं है।
हो सके तो कार्रवाई सख्त हो, वरना लोगों का जाया वक्त न हो,
कटु सत्य है कि कोरोना पर रोना बंद हो।
खासबात यह कि लेख बेहद बड़ा, लम्बा भी हो सकता था लेकिन संक्षिप्त मे समझदारों के लिए इशारा काफी।
राजेश शर्मा
कलेक्टर अजय गुप्ता द्वारा शासन के निर्देशानुसार आदेश जारी किए गए थे कि रविवार यानि संडे को जिले मे लाकडाउन मतलब "तालाबंदी" रहेगी। लेकिन जिला मुख्यालय से मात्र 18 किलोमीटर दूर इछावर मे पूरे नियम और कानून के परकच्छे तब उड़ गए जब लोग बगैर मास्क लगाए झुंडों मे बैठकर गप्पे हांकते रहे।
एमपी मीडिया पाइंट की टीम ने जो दृश्य देखा वह इतना निकृष्ट था कि.......वर्णन करने मे शर्म महसूस हो रही है।
टीआई विहीन इछावर थाने के पुलिसकर्मी तमाशबीन बने हुए थे। लोग अपनी मर्जीमाफिक तरीके से घूम रहे थे। खासतौर पर इछावर का कोलीपुरा मोहल्ला बेलगाम था जिसके हालात हमने कैमरे मे कैद किए।
हालांकि "दवा-दारु" की दुकानों को छोड़ सबकुछ बंद था। लेकिन दुकानों की शटरें गिरने का पूर्ण मतलब यह तो नहीं कि "लाकडाउन" सफल।
नियमों के परिपालन मे जिनसे चूक हो रही है उन्हें नियमानुसार "सजा" मिलनी चाहिए। यह "कर्ताधर्ता" का प्रथम कर्तव्य बनता है। हम जैसे मीडियाकर्मी पूंछ हिलाते भी है (यदि सही हो रहा हो तो)
वर्ना पूंछ मरोड़ने मे भी माहिर हैं।
कानून का धागा जब-जब टूटता पाया जाएगा__ तब-तब.....एक-एक शब्द हथकड़ी बन जाएगा। कलम सिर्फ़ बही-खातों को लिखने के लिए नहीं बनी___इससे इतिहास पहले लिखा जाता है।
मुझे मक्खन मारना याद नहीं , मैं सिर्फ़ आइना दिखाता हूँ कि तुम जो शुध्द घीं परोस रहे हो उसमे "मय्यड़" कितना है।
वैसे समय तो एक दर्पण है जिसमें हम झांकते रहते हैं और अफसोस यह कि हम अपनी पीड़ा,कष्ट और गुनाहों पर आँखे चार करते हैं। नि:संदेह आज आस्था और विश्वासों के टुकड़े-टुकड़े हुए हैं। मनुष्यों को मवेशियों की तरह खुला छोड़ दिया गया और व्यापारियों को कह दिया गया कि दुकानें बंद रखें। व्यापारियों ने सरकार की बातें मानी लेकिन उससे हुआ क्या?
बेलगाम लोग कानून को धता बताते रहे। पब्लिक घर मे बैठकर नियम लागू करने वालों का "हंसी-मजाक" उड़ाती रही___क्योंकि कोई भी प्राणी मस्तिष्कविहीन नहीं है।
हो सके तो कार्रवाई सख्त हो, वरना लोगों का जाया वक्त न हो,
कटु सत्य है कि कोरोना पर रोना बंद हो।
खासबात यह कि लेख बेहद बड़ा, लम्बा भी हो सकता था लेकिन संक्षिप्त मे समझदारों के लिए इशारा काफी।



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