लेखिका

रिश्ते का अंत...


मूसलाधार बारिश हो रही थी, एक बूढ़ा पिता अपने कमरे का दरवाजा खोलकर फर्श पर बैठा बारिश की टपकती बूंदों में अपने बीते दिन खोज रहा था। उसकी छोटी बहू निशा बारिश के मौसम को खुशनुमा बनाने के लिए अपने ससुर की फरमाइश पर उनके लिए पकौड़े बना रही थी तभी निशा के मोबाइल की घंटी बजती है निशा फोन रिसीव करती है,वह कुछ बोलती उससे पहले ही उधर से आवाज आती है....
" निशा.....हमारे मकान का किराया दो....दस साल का.. पांच हजार रुपये प्रति साल के हिसाब से मकान का किराया पचास हजार रुपये होता है...।" निशा आश्चर्यचकित हो जाती है,वह कुछ जान पाती इससे पहले ही फोन कट गया।
       निशा पिताजी (ससुर) के पास जाती है और बताती है कि
 " जेठ जी  का फोन था.मकान का  दस साल का  किराया पचास हजार रुपये मांग रहे हैं....।"
यह सुनते ही उनकी आंखें फटी की फटी रह गई जैसे उनके ऊपर किसी ने वज्र पात कर दिया हो और निशा फूट-फूट कर रोने लगी उसके मन मे हजारों सवाल उठने लगे निशा का पति धीरज प्राइवेट नौकरी करता है, उसके आने पर निशा उसको सारी बात बताती है। धीरज को तकलीफ़ होती है और वह बताता है कि
 ""उसके बड़े भाई नीरज फ्लाईंग अफसर हैं उन्होंने यह मकान चोरी से अपनी सास के नाम से खरीदा था। पिताजी जब रिटायर हो गए तब उनकी पेंशन नही बनी थी वे कोचिंग मे पढ़ाने लगे थे लेकिन मकान का किराया और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था, उनके रिश्तेदार ही यहां ज्यादा रहते थे उस समय मेरा भी  ग्रेजुएशन का आखिरी साल था। ऐसे मे पिताजी गांव लौट जाना चाहते थे लेकिन भाई साहब ने कहा आप हमारी सास के मकान मे रहिए कोई दिक्कत की बात नही उनका मकान इनकम्पलीट था न खिड़की न दरवाजे न बिजली न पानी फर्श भी कच्चा तब उन्होंने पिताजी से पचास हजार रुपये ले कर मकान को काम चलाउ मेंटेन करवाया । बिजली भी पिताजी के नाम से ली गई। पानी की कोई व्यवस्था नही तब से हम लोग ऐसे ही रह रहे है। रिटायर होने के बाद जो पैसा मिला उससे अपने दोनो छोटे बेटा-बेटी की शादी कर दी। उसमे भी भैया ने पिताजी का कोई सहयोग नही किया कभी भी किसी चीज की कोई जिम्मेदारी नही उठाई""
    निशा बोली कि मकान का किराया पहले क्यो नही लिया?मुझसे क्यो मांग रहे है?मेरी शादी को तो अभी कुछ ही महीने हुए है। पिताजी को बड़े बेटे से घोर निराशा हुई कभी कभी रोते और निशा से कहते बहू मुझे माफ कर देना मैं तेरे लिए कुछ भी नही कर पाया। वह हमेशा यही सोचते रहते कि मेरे मरने के बाद धीरज और उसके बीवी बच्चे का क्या होगा। वे अवसाद में चले गए पागलो जैसी हरकतें करने लगे और धीरे-धीरे उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया । इधर निशा को एक साल बाद बेटा हुआ । निशा को पता ही नही चला कि शादी का क्या सुख होता है उसे ऐसे लग रहा था जैसे उसके पास एक नही दो-दो बच्चे है। चार साल का समय बच्चे तथा पिताजी की देखभाल मे बीत गया। धीरे-धीरे निशा का स्वास्थ भी खराब होने लगा इन चार सालो मे उनके बड़े बेटे ने कभी फोन करके नही पूछा कि पिताजी किस हालत मे है चार साल बाद पिताजी का देहान्त हो गया।
     
           "इन सब का खामियाजा निशा और उसके बच्चे को भुगतना पड़ा । अपने बच्चे की परवरिश सही से नही कर पाई कोई सहयोग करने के लिए नही आया,जो आते अपना मतलब निकालते और ताना मार कर चले जाते कि वक्त की मारी है।"
        पिताजी के देहांत के बाद नीरज (बड़ा भाई) का फोन फिर आया। धीरज ने फोन रिसीव किया मकान का किराया मांगने लगे इस पर दोनों भाइयों मे फोन पर ही बहस शुरू हो गई धीरज ने रोते-रोते फोन निशा को पकड़ा दिया और कहा लो आज जो कह सकती हो कह दो। निशा ने आज अपनी चुप्पी तोड़ दी उसने कहा आपने दस साल पहले पिताजी से पचास हजार रुपये लेकर अपने मकान की मरम्मत करवाई और अपने ही पिता को मकान किराये पर दे दिया उस हिसाब से तो पिताजी दस साल पहले ही आपको मकान का किराया दे चुके है।नियमानुसार किरायेदार अगर किराये के मकान मे पैसा लगाता है तो मकान मालिक किराये मे काट लेता है अब तो आपको पचास हजार रुपये का ब्याज देना चाहिए इतना सुनते ही नीरज ने फोन काट दिया।
            नीरज ने धीरज से मकान खाली करवाके उस को बेच दिया धीरज आज अपने आप को अनाथ महसूस कर रहा था उसके साथ कोई भी नही खड़ा हुआ और ना ही कोई सांत्वना देने आया।धीरज अपनी पत्नी तथा बच्चे के साथ किराये के मकान मे रहने लगा।
              ""किसी ने सच ही कहा है गरीबी बहुत बुरी चीज है,गरीबो के रिश्ते नही होते इस तरह से धीरज के सभी रिश्तो का दिल से अन्त हो गया""

प्रियंका पांडेय त्रिपाठी
प्रयागराज उत्तर प्रदेश
----------------

परिचय

समीक्षा

जब रिश्तों की बंधन ... भावनाओं की मजबूत  डोरियों के स्थान पर स्वार्थ की कच्चे धागों से बंधने लगे...। तब रिश्ते चाहे खून के हों... या किसी अन्य प्रकार के.... ज्यादा लंबे समय तक नही टिक पाते..... बोझ से लगते इन रिश्तों को उतार फेंकने की जल्दी भी होती है... और श्रेष्ठ भी यही रहता है....। प्रियंका जी की कहानी... रिश्तों का अंत... लगभग यही बात कहती है कि... रिश्ता अब व्यापार के नजरिये से तोला जाने लगा है.... जिसमें आपसी प्रेम की केमिस्ट्री कम..... और लाभ हानि का गणित ज्यादा लगाया जाने लगा... नतीजा यह हुआ कि.. सुख दुःख का कंधे से कंधा मिलाकर सामना करने वाले... संयुक्त परिवार पहले एकाकी परिवार में बदलते गए... फिर मेरा तेरा के रगड़े ने... जीवन में इतने झगड़े पैदा कर दिए कि.... अब माता पिता तरक्की की सीढ़ी बनकर रह गए....। जैसा कथानक में बड़े भाई ने किया....। बूढ़े बाप के रिटायर होने वाले अंतिम भुगतान पर अपनी गिद्ध दृष्टि जमाई... फिर योजनाबद्ध तरीके से उनकी सुविधा के नाम पर.. अपने उपयोग मरण कर लिया...। आर्थिक रूप से कमजोर भाई... और उसके बच्चों पर संपन्न और सक्षम भाई ने कोई दया नहीं दिखाई.... अंत में जेठ का आदर करने वाली निशा का मुँह खुला... और रिश्तों की काली रात छा गई...। सीधे सरल शब्दों में... कथानक लिखा गया है.... जिसको और भी अधिक रुचिकर बनाये जाने की सभावना मौजूद हैं.....। जो आने वाले समय मै निखर सकती है...। बहुत बहुत बधाई प्रियंका जी....।
शैलेश तिवारी, संपादक

Share To:

Post A Comment: