साहित्य का सोपान
लेखिका 

 स्त्री चाहत का अंतर्द्वंद

स्त्री हूँ ना....

वामांगिनी भी...

तुम्हें सहेज लेना 

चाहती हूँ।

उन्मुक्त अपने 

विचारों को 

तुम तक पहुँचाना

चाहती हूँ।

कुछ अनकहा बताना

चाहती हूँ,

कुछ सुमधुर,

हृदयस्पर्शी  सुनना

चाहती हूँ।

तेरे मन का तो 

पढ़ लेती हूँ पर,

क्या मेरे मन में है,

वो भी स्वतः 

तू पढ़ ले, 

कुछ ऐसा चाहती हूँ।

तू अपने में ही

खोया है,

जाने इस आभासी दुनिया ने

दूरी का बीज 

क्यूँ बोया है।

नेह के पुल से 

सन्निकट आकर वो,

बेबुनियाद दूरी

मिटाना चाहती हूँ।

कुछ बैरागी से 

गीत मन में हैं तेरे, 

उन्हें अपने दिल 

की सान्निध्य-धुन

से बदलना

चाहती हूँ।

कभी ये दिल को 

समझाती हूँ।

मैं बस एक बाती हूँ।

तुझ जैसे दीये का

आसरा चाहती हूँ।

मैं अपने प्यार 

की स्याही से 

नाम अपना,

तेरे दिल पर 

लिखवाना चाहती हूँ।

मैंने सारी बातें

बोली हैं,

दिल की सारी गिरह 

खोली हैं, फिर भी

तेरा निष्ठुर दिल,

एक अनजान पहेली है।

जो बर्फ़ हुई,

अहसासों की परतें,

तेरे दिल की,

उन परतों को, नेह से,

पिघलाना चाहती हूँ।

मैं अपने मन के

अंतर्द्वंद को 

सुलझाना 

चाहती हूँ।

- डॉ प्रतिभा गर्ग
गुरुग्राम, हरियाणा

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