(साहित्य का सोपान)


                                 लेखक

शब्द दिल से निकल के ग़ज़ल तो बने

हम  कभी   ख़ास  होंगे  ज़रूरी  नहीं,
हर  समय   पास  होंगे   ज़रूरी  नहीं।

जन्म से  ही  तुझे   चाहते  जो  बशर,
उम्र  तक   साथ   होंगे   ज़रूरी  नहीं।

चीख़ते  हम  रहे   दर्द  से  रात - दिन,
वो   सुने   भी  न  होंगे   ज़रूरी  नहीं।

जिन  नज़र में  दिखी  रोज चिंगारियाँ,
सब  बुरे   शख़्स  होंगे   ज़रूरी  नहीं।

कुछ लुटेरें यहाँ  पर पले  किस जगह,
देखते   वह   न  होंगे    ज़रूरी   नहीं।

बाग़बाँ  हम  बनायें   चमन का  किसे,
सब  सितमगर  न होंगे  ज़रूरी  नहीं।

जिस बड़े आदमी को  ख़ुदा कह दिये,
वो   ख़ुदातर्स    होंगे    ज़रूरी   नहीं।

जागते   हम  रहे   सोच कर  रात भर,
आज जो  कल  न होंगे  जरूरी  नहीं।

शब्द दिल से निकल के ग़ज़ल तो बने,
पर   पढ़े   लोग  होंगे    जरूरी   नहीं।

बशर--( मनुष्य )
ख़ुदातर्स-- (दयालु-कृपालु )

कमलेश्वर ओझा
सिंगरौली,मध्यप्रदेश
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परिचय

कमलेश्वर ओझा- सिंगरौली मध्यप्रदेश मे निवारत हैं। मूलतः वह बलिया,उत्तरप्रदेश के रहवासी हैं। आप कोल-इंडिया से सेवानिवृत्त हैं।हास्य-व्यंग लेख व कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित होती रही हैं। लगभग तीन दशक से कविता पाठ के साथ-साथ सूत्राधार की भूमिका मे रहे हुए मंच को सुशोभित करते आए हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।

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