
लेखिका
(साहित्य का सोपान)

माँ...
मैं सोचती थी
ब्याह हो जाएगा, तुमसे दूर हो जाऊंगी
तुम फिर बहुत याद आओगी
बड़ी गलत थी मैं
तुमसे दूर कभी हुई ही कहाँ...
ब्याह होके जब लांघ रही थी घर की देहरी...
तब तुमने थमा दी थी एक पोटली
और कहा ..इसे सहेज के रखना
तुमने कहा था...बिटिया अभी कई इम्तिहान आएंगे
कई पड़ाव आएंगे
पास होती जाना
पार करती जाना...
तुम्हारी दी पोटली खोली उसमे मिली ढेर सारी और पोटलियां
हर पोटली में रख दी थी अपनी सीखें
एक पोटली में तुमने दी..चौकन्नी सी आंख
जिससे मैने हर बार बचाया
आंधी ,तूफान ,बरसात आने से पहले..
अपने घर का छप्पर...
एक पोटली में बंद थी.. सहनशीलता
जिसे मैने लपेट लिया अपने वुजूद पे
मैं शीतल हो गयी.. तुम्हारी तरह..
इतनी पोटलियां ...
किसी मे त्योहारों की गमक
चेहरों की धनक, खाने का भंडार
खाने का जायका, हाथों की मिठास..
सब बांध दिया तुमने...
गुनगुनाती बहार बनना
किसी के लिए न सवाल बनना
हर रिश्ता निभाना, कोई बात न दिल से लगाना
हर पोटली में तुम हो, मेरे मन मे तुम हो..
तुम बिन संभव नहीं था..
ये मेरा वुजूद...
शुक्रिया...कि तुमने मुझे जन्म दिया
शुक्रिया..कि मैं तुम्हारी बेटी कहलाई
शुक्रिया..मुझे छांव देने का
शुक्रिया.. मुझे अपनी परछाई बनाने का...
और हां माँ...
तुमने जो पकड़ाई थी
उन और सलाइयां
अब सीख लिया है मैंने बुनना
मन सर्द होने से पहले ही
हर बार मैं बुन लेती हूँ दुशाला
और बचा लेती हूँ मन सर्द होने से..
रूपल जोहरी, नई दिल्ली
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