पहले कलम फिर बम से जगाई थी आजादी की अलख,

दुनियां के दो महान क्रांतिकारी भगतसिंह-चंद्रशेखर आजाद की पहली मुलाकात हुई थी अखबार के दफ्तर मे।                                 

           
            "जयंती" अमर शहीद भगतसिंह 

लेखक- राजेश शर्मा 


अमर शहीद भगतसिंह ने बम और कलम दोनों से ही आजादी की अलख जगाने का काम किया था। वह कानपुर से गणेशशंकर विद्यार्थी के संपादन मे प्रकाशित दैनिक प्रताप अखबार के पत्रकार रहे। उन्होंने इसी अखबार के माध्यम से अपने क्रांतिकारी विचारों को शब्द बनाकर देशवासियों तक पहुंचाने का बखूबी काम किया। यह बहुत कम लोग जानते होंगे कि दुनियां के दो महान क्रांतिकारी भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद की पहली मुलाकात भी अखबार के दफ्तर मे हुई थी जिसका नाम "प्रताप" था और उसके संपादक गणेशशंकर विद्यार्थी ।


जिला लायलपुर जो वर्तमान मे पाकिस्तान का शहर फैजलाबाद है। इसी शहर से 5-7 किलोमीटर दूर बंगा नामक गांव मे 27-28 सितंबर सन् 1907 को भगतसिंह के रुप मे महान क्रांतिकारी का जन्म हुआ था। कहते है भारत माता के लिए प्राण न्यौछावर करने का ज्ञान भगतसिंह को मां की कोख से ही प्राप्त हो गया था।
जब इस बालक का जन्म हुआ तो पिता किशनसिंह एवं चाचा अजीतसिंह दोनों ही जेल मे बंद थे लेकिन इस सौभाग्यशाली बालक के जन्मदिवस पर ही पिता और चाचा को जमानत मिल गई और वे जेल से रिहा कर दिये गए। उस दिन परिवार मे दो तरफा खुशी का महौल था। एकतरफ पुत्र का जन्म और दूसरी तरफ पिता एवं चाचा की रिहाई। जब पुत्र के नामकरण की बारी आई तो दादी ने कहा जन्मा बालक भाग्यशाली (भागवाला) है इस वजह से बच्चे का नाम भगतसिंह रख दिया गया।

सचमुच ही भगतसिंह घर के साथ भारत राष्ट्र के लिए भी भाग्यशाली साबित हुए। आज पूरा कुल उन्हीं के नाम से जाना जाता है। दुनियां के महान क्रांतिकारियों का जब-जब जिक्र आता है तब-तब भगतसिंह का न‍ाम आदर से लिया जाता है। मात्र 23 वर्ष 5 माह 26 दिन की आयु मे वह इतनी बड़ी जिंदगी जी गए जिसे आगामी कई सदियों तक विस्मृत किया जाना नामुमकिन है।

बचपन से ही क्रांतिकारी विचारधारा रखने वाले भगतसिंह जब अपनी जवानी  की दहलीज़ पर पहला कदम रख रहे थे तभी वह कानपुर जा पहुंचे जहां उन्होंने दैनिक अखबार "प्रताप" मे पत्रकारिता का कार्य संभाल कर कलम के माध्यम से आजादी की अलख जगाने का दायित्व भी बखूबी निभाया।

एक दिन जब संपादक गणेशशंकर विद्यार्थी के दफ्तर मे जब ढिले-ढाले कपड़े पहन पत्रकार भगतसिंह बैठे हुए थे तभी प्रेस मे चंद्रशेखर आजाद का आगमन हुआ। संपादक गणेशशंकर विद्यार्थी ने आजाद को दफ्तर के अंदर बुलाया और उनका परिचय भगतसिंह से कराया। 
भगतसिंह और चंद्रशेखर के बीच हुई यह पहली मुलाकात  दुनियां के स्वर्णिम इतिहास का अमिट पन्ना साबित होगी यह तो शायद उस दिन गणेशशंकर विद्यार्थी ने भी नहीं सोचा होगा। आजादी के दोनों दीवाने उसी दिन से हमसफर हो गए थे।

1928 तक तो भगतसिंह का संपर्क घर से जुड़ा रहा लेकिन इसके बाद का समय उन्होंने घर से गायब रहकर क्रांतिकारियों के साथ ही व्यतीत किया।

भारत मे थोपे साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय गंभीर रुप से घायल हो शहीद हो गए तब उनकी का मौत बदला लेने की बागडोर भगतसिंह तथा उनके साथी क्रांतिकारियों ने हीे संभाली।
एसपी स्काट तो बच गए, लेकिन डीएसपी सांडर्स को मौत के घाट उतारकर जो बदला लिया गया उसने अंग्रेजी हुकूमत की चूले हिलाकर रख दीं।

अंग्रेजों ने भगतसिंह को जब पकड़ने का प्रयास किया तब उन्होंने असेंबली मे यह कहते हुए बम फेंका-" गूंगे और बहरे प्रशासन कोे जगाने लिए तेज धमाकों  की जरुरत होती है"
धमाकों के माध्यम से भगतसिंह ने अपने विचारों और प्रयासों को कभी नहीं रोके जाने का पैगाम अंग्रेजी हुकूमत तक पहुंचा दिया।

आजादी के इस दीवाने ने फांसी के फंदे को जिस अंदाज से चूमा वह भी दुनियां के इतिहास मे मिसाल है। जब भगतसिंह,राजगुरु और सुखदेव को फांसी के तख्ते की तरफ ले जाया जा रहा था तब जेल के बैरकों के सभी कैदी रो रहे थे। यहां तक कि  जेलर खान बहादुर मोहम्मद अकबर जैसे संगदिल इंसान की आंखों से भी आंसू टपक रहे थे। 
लेकिन इंकलाब जिंदाबाद के नारों के बीच भगतसिंह के चेहरे पर खुशी साफ झलक रही थी। भगतसिंह से अंग्रेज कितने भयभीत थे इसका अंदाजा तो इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें  24 मार्च 1931 को फांसी दिये की तारीख़ निश्चित की गई थी लेकिन डरी हुई अंग्रेजी हुकूमत ने एक दिन पहले यानि 23 मार्च शाम को ही फांसी दे दी और आनन-फानन मे अंतिम संस्कार भी कर दिया।

आजादी के इस दीवाने ने जिस अंदाज मे फांसी के फंदे को चूमा वही निराला अंदाज़ आज भी भगतसिंह को युवाओं की पसंद बनाए हुए है। आज दुनियां के महान क्रांतिकारियों मे शुमार अमर शहीद भगतसिंह की जयंती पर समूचे देश के सांथ-सांथ पत्रकारिता जगत भी शत-शत नमन करते हुए उन्हें  श्रदा के साथ याद करता है।

                              जय हिन्द

(लेखक एमपी मीडिया पाइंट के प्रधान संपादक हैं)
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