कहते हैं मां धोखा नहीं देती,औलाद को हरहाल मे मौका देती,लेकिन मां ने मेरी ख्वाहिश को नेस्तनाबूत किया। 10 सितंबर 17 को।

मुझे सिखाया था लड़ने का सलीका,जिंदगी से जूझने का तरीका लेकिन ढेड़ माह मे ही खुद कैंसर के कीड़ों से जंग हार गई।

दिल बहलाने को सब कहते हैं तुम्हारी मां तुम्हारे सांथ है। क्या धन,दौलत,शोहरत को आपकी मौजूदगी मान लूं__नहीं यह आपकी मौजूदगी नहीं क्योंकि मेने देखा है आपकी गरीबी का पालना,मेने देखा है बच्चों के लिए अपनी ख्वाहिशों को मारना, मेने देखा है पाई-पाई को बचाना--

मां तू नहीं तो कुछ नहीं । सिर्फ़ जिंदगी टेर करता हूँ तेरे दिल को दिलासा खुद देता हूँ . . .नरसिंहगढ़ की मिट्टी को प्रणाम करता हूँ।

लोग कहते हैं तू मेरे पास है लेकिन मैं समझता हूँ मैं तुझसे अब कितना दूर हूँ । मुकम्मल मुकाम भी विधाता बताता नहीं। जाने क्यूँ वह भी रुठा सा रहता है। दिल मे जब भी मां तेरा जिक्र होता है मेरे दर्द को देख विधाता भी रोता है।

मैं उजड़े जमन की दास्तान बन गया हूँ। मै हकीकत मे खुद एक बयान बन गया हूँ। मेरी लेखनी की स्याही तुझे कसम है मेरे अक्षरों को आकार देते रहना। जहां भी हो अच्छे से रहना। निशानी के रुप मे पिता अभी मौजूद हैं। मैं चेहरे मे उनके तेरा चेहरा देखता रहता हूँ--कुछ इस तरह जिंदगी का गुजर-बसर करता रहता हूँ।

कल्पना नहीं की थी तेरे बिना जिंदगी की, न जाने क्यूँ कल्पना से अब नजरें चार करता हूँ। मां सिर्फ़ एक मेरी ही नहीं मैं तो सभी संतानों के संताप अपने शब्दों से व्यक्त करता हूँ जो तूने मुझे कोख मे सौंपे थे।

जानता हूँ तुझे मेरे चेहरे को पढ़ना याद है अब तो तेरी तस्वीर से भी नज़रें चुराता हूँ क्योंकि सोचता हूं कहीं तू मेरे दर्द को देख न ले . . .
नहीं तो जन्नत छोड़कर दर्दभरे इस लोक मे फिर से मेरे पास आ जाएगी। निपट लूंगा तमाम झंझटों से मगर "यादों" से निपटना याद नहीं। 

मेरी आँखे अपने-आप धुल जाती हैं जब स्मरण मे आप आती हैं। 
जब वक्त 10 सितंबर का आता है क्या कहूँ ? चलती इस जिंदगी मे, मैं जिंदगी से रुठ जाता हूँ। लोग कहते हैं मैं शायर,कवि,साहित्यकार,पत्रकार हूँ मगर कैसे मान लूं!!

बस कहता हूँ मैं, छोटी बाई का हर स्तर पर सबसे छोटा कहलाता हूँ।        

                            माँ तुझे सलाम

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