हनुमत गुणों को आत्मसात करने की समय कर रहा मांग.....
श्री हनुमान जी...... कहलाते तो हैं राम भक्त... भक्ति रस में आकंठ डूबे... केसरीनदंन के भक्त से भगवान बन जाने का रास्ता आसान तो नही रहा....। एक भक्त जब भगवान बनता है.... तो हर गली, गाँव, चौराहा ऐसा नही बचता.... जहाँ खेड़ापति के रूप में... हनुमान मंदिर न हो...। ये आशीर्वाद भी माँ सीता की भक्ति से ही उन्हे मिला है....। इसका उल्लेख आध्यात्म रामायण के सार कांड में.. उस समय मिलता है... जब भगवान राम जी का राज्याभिषेक हो चुका था.....।
इन्हीं माता सीता ने हनुमान जी को... अजर अमर होने का वर भी दिया है....
अजर अमर गुन निधि सुत होहू,
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
ये प्रसंग रामचरित मानस के सुंदरकांड के 17/3 में उल्लेखित है....। आज जब हम उन्हीं बजरंगवली की जयंती मना रहे हैं तब.. हम कलियुग में जी रहे हैं.... इस युग के प्रत्यक्ष देव के रूप में भी हनुमान जी हैं.....यह आशीर्वाद उन्हें प्रभु राम और माता सीता ने वाल्मीकि रामायण में स्वयं दिया है...कि जब तक संसार में राम कथा होगी...हनुमान जी आप प्रसन्न होकर विचरते रहे....। जन जन के देवता भी हनुमान ही हैं....। राम जी के पास ले जाने वाले भी यही है.. हनुमान चालिसा में इसकी घोषणा है...
राम द्वारे तुम रखवारे,
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
चर्चा जब हनुमान चालीसा की हो तब तो... हनुमान जी के सर्व पूजित होने का कारण जानना आसान हो जाता है....
और देवता चित्त न धरई,
हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
इस का शाब्दिक अर्थ तो सीधे समझ आता है लेकिन भावार्थ हनुमान जी के उस असीमित बल की कहानी है, जो अन्य देवों की सीमा से ज्यादा है....। इसको दक्षिण के महाकवि कंबन ने तमिल भाषा के ग्रंथ रामावतारम ... जिसे कंबन रामायण भी कहा जाता है... में व्यक्त की है......
पांच में एक का पुत्र, पाँचों में एक को लाँघ के
पाँचों में एक के मार्ग से, आर्यों के नाते पहुँच
पाँचों में एक की पुत्री देख, विजनों के क्षेत्र में
पाँचो में एक लगाया, वह हमारी रक्षा करे..।
... यह है उनकी तमिल रचना का हिंदी अनुवाद.. जो वायु पुत्र के, सागर(जल) को, आकाश मार्ग से, लंका पहुंचकर, पृथ्वी पुत्री सीता से मिल, लंका को आग लगा देने की घटना है। इसमें वायु तत्व की देव दुर्गा.. जल तत्व के देव गणेश, आकाश तत्व के देव विष्णु, पृथ्वी तत्व के देव शिव और अग्नि तत्व के देव सूर्य का अप्रत्यक्ष वर्णन है... जो इस सृष्टि के निर्माण के आवश्यक पांच तत्व है... इनकी पूजा हर अनुष्ठान में आवश्यक है.... स्वस्तिक बनाकर और उसमें चार बिंदी लगाकर.... । यह बात भक्तो की भक्ति के लिए हुई...।
असल में हनुमान जी तो तब ज्यादा मार्गदर्शक बन जाते हैं... जब सामने खड़ी हो चुनोती.... वह भी भीष्णतम.... साधन पास में है नही... लेकिन सदा सफल हनुमान यही सिखाते हैं.... राम नाम मात्र के साधन से भी कठिनाई का समुद्र पार किया जा सकता है.... साधना से ही बाधा बनी... सुरसा, सिहिंका और लंकिनी पर विजय पायी जाती है... आगे की राह खोजने के लिए धैर्य रखना होता है.. तब विभीषण मिलता है...। भक्ति यानि माँ सीता को देखते ही उत्साहित नहीं होते हैं...संयम से इंतजार करते हैं.. उचित समय का....। विचार करते हैं... किस वेश में सीता के सामने प्रकट हुआ जाए.... कि उन्हें विश्वास हो जाए हनुमान के राम दूत होने का...। राम जी के गुण गाकर सीता का शोक दूर करते हैं....। असुर संहार से बल प्रदर्शित करते हैं...। बांधकर जब रावण के सामने पहुंचाए जाते हैं तब.... राम जी की बेखौफ आवाज बनकर रावण को उचित अनुचित का ज्ञान भी कराते हैं...। पूँछ में आग लगा देने के आदेश के बाद... राक्षसों द्वारा किए गए अपमान को भी सह जाते हैं.... और बाद में आग लगाकर अपने अपमान का बदला भी ले लेते हैं....।
विचार रहे होंगे आप... सुनी हुई कहानी क्यों बता रहा हूँ...। इसमे हनुमान जी के व्यक्तित्व के बहुत से गुणों का वर्णन है...। इनका प्रदर्शन या उपयोग हनुमान तभी कर पाए जब उन्हें मौका मिला...। इससे पहले वो थे क्या... एक भगोड़े राजा सुग्रीव के मात्र सचिव... लंका में रात और दिन बिताने के बाद हनुमान... राम भक्त भी है, गुण निधान हैं, बलशाली हैं, बुद्धिमान हैं आदि आदि अनेकानेक उपलब्धियां पा जाते हैं सुंदरकांड में लंका से लौट कर....। क्यों पा जाते हैं.... उल्लेख हो चुका है.... बिना साधन के... विपरीत परिस्थितियों में अपना श्रेष्ठ कर दिखाया हनुमान ने...... हमें राह दिखाने को..।
आज हम भी कोरोना संकट के कारण विपरीत स्थिति में जी रहे हैं... जिसकी कभी कल्पना नहीं की थी... जब लंबे समय घर में रहना होगा... सीमित साधनों से जिंदगी जीना होगी.... अदृश्य दुश्मन से लड़ाई के लिए...।
यह लड़ाई... धैर्य, संयम, विश्वास, साहस, ज्ञान विज्ञान, साधना के सहारे, उचित अनुचित का विचार करते हुए, हर हाल में जीतना ही है। यही हनुमत चरित्र का संदेश भी है.... जो हमें समझ कर अपना भी लेना है...।
जय श्री राम......
और देवता चित्त न धरई.......
शैलेश तिवारी
श्री हनुमान जी...... कहलाते तो हैं राम भक्त... भक्ति रस में आकंठ डूबे... केसरीनदंन के भक्त से भगवान बन जाने का रास्ता आसान तो नही रहा....। एक भक्त जब भगवान बनता है.... तो हर गली, गाँव, चौराहा ऐसा नही बचता.... जहाँ खेड़ापति के रूप में... हनुमान मंदिर न हो...। ये आशीर्वाद भी माँ सीता की भक्ति से ही उन्हे मिला है....। इसका उल्लेख आध्यात्म रामायण के सार कांड में.. उस समय मिलता है... जब भगवान राम जी का राज्याभिषेक हो चुका था.....।
इन्हीं माता सीता ने हनुमान जी को... अजर अमर होने का वर भी दिया है....
अजर अमर गुन निधि सुत होहू,
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
ये प्रसंग रामचरित मानस के सुंदरकांड के 17/3 में उल्लेखित है....। आज जब हम उन्हीं बजरंगवली की जयंती मना रहे हैं तब.. हम कलियुग में जी रहे हैं.... इस युग के प्रत्यक्ष देव के रूप में भी हनुमान जी हैं.....यह आशीर्वाद उन्हें प्रभु राम और माता सीता ने वाल्मीकि रामायण में स्वयं दिया है...कि जब तक संसार में राम कथा होगी...हनुमान जी आप प्रसन्न होकर विचरते रहे....। जन जन के देवता भी हनुमान ही हैं....। राम जी के पास ले जाने वाले भी यही है.. हनुमान चालिसा में इसकी घोषणा है...
राम द्वारे तुम रखवारे,
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
चर्चा जब हनुमान चालीसा की हो तब तो... हनुमान जी के सर्व पूजित होने का कारण जानना आसान हो जाता है....
और देवता चित्त न धरई,
हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
इस का शाब्दिक अर्थ तो सीधे समझ आता है लेकिन भावार्थ हनुमान जी के उस असीमित बल की कहानी है, जो अन्य देवों की सीमा से ज्यादा है....। इसको दक्षिण के महाकवि कंबन ने तमिल भाषा के ग्रंथ रामावतारम ... जिसे कंबन रामायण भी कहा जाता है... में व्यक्त की है......
पांच में एक का पुत्र, पाँचों में एक को लाँघ के
पाँचों में एक के मार्ग से, आर्यों के नाते पहुँच
पाँचों में एक की पुत्री देख, विजनों के क्षेत्र में
पाँचो में एक लगाया, वह हमारी रक्षा करे..।
... यह है उनकी तमिल रचना का हिंदी अनुवाद.. जो वायु पुत्र के, सागर(जल) को, आकाश मार्ग से, लंका पहुंचकर, पृथ्वी पुत्री सीता से मिल, लंका को आग लगा देने की घटना है। इसमें वायु तत्व की देव दुर्गा.. जल तत्व के देव गणेश, आकाश तत्व के देव विष्णु, पृथ्वी तत्व के देव शिव और अग्नि तत्व के देव सूर्य का अप्रत्यक्ष वर्णन है... जो इस सृष्टि के निर्माण के आवश्यक पांच तत्व है... इनकी पूजा हर अनुष्ठान में आवश्यक है.... स्वस्तिक बनाकर और उसमें चार बिंदी लगाकर.... । यह बात भक्तो की भक्ति के लिए हुई...।
असल में हनुमान जी तो तब ज्यादा मार्गदर्शक बन जाते हैं... जब सामने खड़ी हो चुनोती.... वह भी भीष्णतम.... साधन पास में है नही... लेकिन सदा सफल हनुमान यही सिखाते हैं.... राम नाम मात्र के साधन से भी कठिनाई का समुद्र पार किया जा सकता है.... साधना से ही बाधा बनी... सुरसा, सिहिंका और लंकिनी पर विजय पायी जाती है... आगे की राह खोजने के लिए धैर्य रखना होता है.. तब विभीषण मिलता है...। भक्ति यानि माँ सीता को देखते ही उत्साहित नहीं होते हैं...संयम से इंतजार करते हैं.. उचित समय का....। विचार करते हैं... किस वेश में सीता के सामने प्रकट हुआ जाए.... कि उन्हें विश्वास हो जाए हनुमान के राम दूत होने का...। राम जी के गुण गाकर सीता का शोक दूर करते हैं....। असुर संहार से बल प्रदर्शित करते हैं...। बांधकर जब रावण के सामने पहुंचाए जाते हैं तब.... राम जी की बेखौफ आवाज बनकर रावण को उचित अनुचित का ज्ञान भी कराते हैं...। पूँछ में आग लगा देने के आदेश के बाद... राक्षसों द्वारा किए गए अपमान को भी सह जाते हैं.... और बाद में आग लगाकर अपने अपमान का बदला भी ले लेते हैं....।
विचार रहे होंगे आप... सुनी हुई कहानी क्यों बता रहा हूँ...। इसमे हनुमान जी के व्यक्तित्व के बहुत से गुणों का वर्णन है...। इनका प्रदर्शन या उपयोग हनुमान तभी कर पाए जब उन्हें मौका मिला...। इससे पहले वो थे क्या... एक भगोड़े राजा सुग्रीव के मात्र सचिव... लंका में रात और दिन बिताने के बाद हनुमान... राम भक्त भी है, गुण निधान हैं, बलशाली हैं, बुद्धिमान हैं आदि आदि अनेकानेक उपलब्धियां पा जाते हैं सुंदरकांड में लंका से लौट कर....। क्यों पा जाते हैं.... उल्लेख हो चुका है.... बिना साधन के... विपरीत परिस्थितियों में अपना श्रेष्ठ कर दिखाया हनुमान ने...... हमें राह दिखाने को..।
आज हम भी कोरोना संकट के कारण विपरीत स्थिति में जी रहे हैं... जिसकी कभी कल्पना नहीं की थी... जब लंबे समय घर में रहना होगा... सीमित साधनों से जिंदगी जीना होगी.... अदृश्य दुश्मन से लड़ाई के लिए...।
यह लड़ाई... धैर्य, संयम, विश्वास, साहस, ज्ञान विज्ञान, साधना के सहारे, उचित अनुचित का विचार करते हुए, हर हाल में जीतना ही है। यही हनुमत चरित्र का संदेश भी है.... जो हमें समझ कर अपना भी लेना है...।
जय श्री राम......


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