जंगलों के लगातार कम होते क्षेत्रफल के सवाल पर वन विभाग का बेताली मौन समस्या के लगातार गहराते जाने की स्वीकृति कही जा सकती है। हाँ, एक जवाब भी वन विभाग अक्सर शब्दों में और कार्यवाही के रूप में देता आया है। वो है हर साल पौध रोपण के नाम पर भारी भरकम बजट को हल्के -फुलके तरीके से खर्च कर देना। यह भी बताया जाता है कि पेड़ों का प्रतिशत बढ़ा है। सोच कर आप हैरान नहीं हों कि वाकई में यह सच भी है। सवाल उठेगा कि अगर जंगल घटना सही है तो पेड़ों की संख्या बढ़ना कैसे सही हो सकता है।
तो आइये, आप और हम मिलकर समझते हैं वन विभाग के इस गोरखधंधे को...। दर असल जिस जंगल के सिकुड़ने की बात को स्वीकार किया जाता है और सरकारी आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं, वो जंगल क्षेत्र विभाग में सघन वन के रूप में जाना जाता है। लेकिन जिस क्षेत्र में पेड़ की संख्या बढ़ी हुई बताई जाती है उसको ओपन फॉरेस्ट एरिया कहा जाता है। यही वन विभाग का वह तिलिस्म है जिसमें घुसकर बुद्धि चकरा जाती है।
हाल में जारी हुई नेचर जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में एक व्यक्ति के लिए 422 पेड़ मौजूद हैं। दूसरे देशों की बात करें तो पेड़ों की संख्या के मामले में रूस सबसे आगे हैं। रूस में करीब 641 अरब पेड़ हैं, जो किसी भी देश से ज्यादा हैं। इसके बाद 318 अरब पेड़ों की संख्या के साथ कनाडा दूसरे स्थान पर, 301 अरब पेड़ों की संख्या के साथ ब्राजील तीसरे स्थान पर और 228 अरब पेड़ों की संख्या के साथ अमेरिका चौथे स्थान पर है
अन्य देशों की तुलना के वैश्विक अनुपात के मुताबिक, भारत में सिर्फ 35 अरब पेड़ हैं यानी एक व्यक्ति के लिए सिर्फ 28 पेड़। गौर करने वाली बात यह है कि हम दुनियाभर में हर साल करीब 15.3 अरब पेड़ खो रहे हैं, यानी कि प्रति व्यक्ति के अनुसार दो पेड़ से भी ज्यादा का नुकसान हर साल हो रहा है। दूसरी ओर की तस्वीर यह है कि हम बहुत कम संख्या में पौधे लगा रहे हैं। नेचर जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में पांच अरब पेड़ हर साल लगाए जा रहे हैं और जबकि हम हर साल 10 अरब पेड़ का नुकसान उठा रहे हैं।
अब बात करते हैं जिले में वन कटाई की। सीहोर जिले में गाहे बगाहे यह खबर पढ़ने को मिलती है कि वन विभाग ने मुखबिर की सूचना के आधार पर लकड़ी चोरों की घेराबंदी की और लकड़ी जब्त की। मजेदार बात यह होती है कि लकड़ी पकड़ी जाती है चोर नहीं..। दूसरी बात यह है की वन विभाग ने अपने सारे खबरियों को केवल लकड़ी चोरी के मामले में ही काम पर लगा रखा है। पेड़ न कटें या उनके कटते समय भी खबरी इन्हें खबर कर सकें ऐसी व्यवस्था अमल में नहीं आ पाई है।
जहाँ वन विभाग लकड़ी पकड़ता है वहाँ तक पहुंचने में चोर को जंगल का लंबा हिस्सा पार करना होता है। इस बीच में विभाग की कई बीट और चेकिंग नाके भी पड़ते हैं लेकिन चोर, लकड़ी अथवा दोनों कभी नहीं पकड़े जाते। विभाग ने किसी भी बीट के उन कर्मचारी या प्रभारी के खिलाफ कभी कोई कार्यवाही नहीं की है जिनके बीट से चोरों ने पेड़ काट कर ठूँठ छोड़े हैं। विभाग ने इस करतूत को ढंकने का भी पुख्ता इंतजाम कर रखा है कि ऐसे सभी प्रभारी या कर्मचारी के खिलाफ अर्थ दंड के आदेश पारित कर दिए लेकिन उनकी वसूली का काम आज भी बाकी है। ये मात्र उदाहरण है पूरी हकीकत नहीं.. लेकिन जंगलों के सिकुड़ने और लकड़ी के पकड़ाये जाने का सच...।


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