आखिर क्या चाहती हैं सोनिया गांधी?
क्या देश से खत्म हो जाएगा विपक्ष?
बिखराव से कैसे बचेगी पार्टी
मध्य प्रदेश की राह पर राजस्थान
विजया पाठक


एडिटर, जगत विज़न

      मौजूदा समय कांग्रेस के लिए विपत्तियों से भरा है। राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कांग्रेस में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। मानो ऐसा है जैसे कांग्रेस बिना लगाम की दौड़ रही हो। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेस की दिशा और दशा दोनों से मुंह फेर लिया है। यही कारण है कि वर्तमान समय में कांग्रेस रसातल में जाती दिख रही है।
मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार के साथ जो घटनाक्रम हुआ ठीक वैसा ही घटनाक्रम अब राजस्थान में दोहराया जा रहा है। लगभग तय माना जा रहा है कि राजस्थान में डिप्टी सीएम और कांग्रेस के दिग्गदज व युवा नेता सचिन पायलट कांग्रेस से नाता तोड़कर बीजेपी में शामिल होंगे। उनका बीजेपी में शामिल होना मानो कांग्रेस का एक राज्य और कांग्रेस से छीन जाना। अभी बिखराव और बचाव का नाटकीय खेल चरम पर है। कभी भी इस खेल का अंत हो सकता है। अब सवाल उठता है कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व क्या कर रहा है? बड़े अचरज वाली बात है कि धीरे-धीरे कर कांग्रेस का कुनबा बिखरता जा रहा है और केंद्रीय नेतृत्व हाथ पर हाथ रखकर तमाशा देख रहा है। आखिर सोनिया गांधी क्या चाहती हैं? अब तो कांग्रेस के बड़े नेता भी पार्टी हाईकमान की उपयोगिता पर सवाल खड़े करने लगे हैं। राजस्थान के घटनाक्रम पर हाल ही में कांग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि क्यार अस्तबल के सारे घोड़े निकल जाने के बाद हम जागेंगे। कपिल सिब्बल की आवाज में बढ़ा संदेश छुपा है, जो सीधे-सीधे सोनिया गांधी के लिए है। उनका कहना एकदम सही है। हम देख चुके हैं कि मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस हाईकमान मौन रहा था और तमाशबीन बना बैठा था। वैसे ही मौन राजस्थाचन मामले पर है। इस मौन के कारण ही कांग्रेस के हाथ से मध्यप्रदेश खिसक गया था। अब राजस्थान की बारी है। कांग्रेस का यह रवैया ताज्जुपब में डालने वाला है। कांग्रेस के लिए वर्तमान समय बहुत चिंतन और मनन करने वाला है। कांग्रेस के लिए सोचनीय बात है कि उससे कांग्रेस का युवा बिग्रेड बगावत कर रहा है। उपेक्षा और तिरस्कार से त्रस्त होकर युवा नेता बगावती तेवर अपना रहे हैं। क्या वजह है कि ऐसी स्थितियां निर्मित हो रही हैं? इन्हीं सवालों पर विचार करने की आवश्यकता है। यदि हम कहें कि कांग्रेस की यह दुर्दशा कांग्रेस के सीनियर नेताओं के पुत्र मोह के कारण हो रही है तो इसमें गलत नहीं होगा। क्योंकि मध्यप्रदेश में कमलनाथ ने अपने बेटे नकुलनाथ और दिग्विजय सिंह ने अपने बेटे जयवर्धन सिंह को बढ़ाने के लिए पार्टी को गर्त में पहुंचाया और सरकार तक गवां बैठे। हम जानते हैं कि दिग्विजय सिंह एक बड़े और समझदार नेता हैं। उनमें सबको साथ लेकर चलने की प्रतिभा है। लेकिन क्यान कारण रहा कि उन्होंरने सिंधिया को मनाने का प्रयास ही नहीं किया। निश्चित है कि कोई बड़ा कारण रहा होगा अन्य‍था दिग्विजय सिंह ऐसी स्थिति नहीं बनने देते। यह भी सत्यह है कि कमलनाथ ने अपने बेटे के खातिर ही ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे बढ़ने नहीं दिया। और नतीजा यह हुआ कि सिंधिया ने पार्टी तक से किनारा कर लिया। ठीक वैसे ही स्थिति राजस्थान में बन गई है। यहां भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने बेटे वैभव गहलोत की राजनीति चमकाने के चक्कर में सचिन पायलट जैसे प्रतिभाशाली और युवा नेता की अनदेखी कर रहे हैं। यही कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का पुत्र मोह कांग्रेस को डुबोने पर तुला है। आखिर सोनिया गांधी को इन दिग्गजों की मंशा क्यों समझ नहीं आ रही है। अचंभित करने वाली बात तो यह भी है कि एक-एक कर कांग्रेस के युवा नेता पार्टी से किनारा करते जा रहे हैं और पार्टी हाईकमान इन्हेंा मनाने या उनकी परेशानी को दूर करने की बात ही नहीं करती। मध्यप्रदेश के बात करें तो यदि सोनिया गांधी और राहुल गांधी चाहते तो सिंधिया पार्टी छोड़ने का कदम नहीं उठाते। उनकी शिकायत पर गौर ही नहीं किया गया। क्या कारण है कि पार्टी इन मामलों पर हस्तक्षेप ही नहीं करती। समझ से परे है और केंद्रीय नेतृत्व के कदम पर सवाल उठते हैं। ऐसा नहीं है कि कांग्रेसी नेताओं में ही मनमुटाव है। अन्य पार्टियों में भी ऐसा होता है लेकिन उन पार्टियों में मनमुटाव के कारणों को हल किया जाता है। आवश्यक कदम उठाए जाते हैं। पर कांग्रेस में ऐसा नहीं हो रहा है। यहां तो बगावती तेवर उठे तो पार्टी छोड़ने पर ही खत्म होते हैं। यदि ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन देश से विपक्ष का नाम और निशान ही मिट जाएगा। विपक्ष का ऐसा बिखराव लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। विपक्ष का मजबूत और एकजुट होना लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे अहम है।
70-80  के दशक में जहां सत्ता पक्ष इतना मजबूत था कि विपक्ष के पास नगण्य  शक्ति थी और सत्ता पक्ष अपनी मनमर्जी से सत्ता का दुरुपयोग करता था। उसी समय इमरजेंसी जैसा काला अध्यादेश देश में जुड़ा। क्या अब देश इसी मोड़ पर जा रहा है। सच हो सकता है। यहां कांग्रेस देश के पास बहुत बड़ा अन्याय कर रही है। अपनी एकजुटता को मजबूत करने के बदले बिखर रही है।  यह बिखराव आने वाले समय में बहुत कष्टदायी होने वाला है।
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