घुमक्कड़ की डायरी 

शैलेश तिवारी 


अगर लेना है पुनर्जन्म का अहसास... 

सीहोर से लगभग 70 किलोमीटर दूर नरसिंहगढ़ की पहाड़ियों में बसा है... गाँव कोटरा.... जयपुर - जबलपुर राजमार्ग क्रमांक 12 ... यहीं पर स्थित है बारिश के दिनों में कश्मीर सा नजारा दिखने वाला... पर्यटक स्थल... चिड़ीखोह... यहीं से एक संकरी सी सड़क उत्तर की तरफ जाती हुई.... जंगलों और खेतों के दृश्यों से परिपूर्ण... ले जाती है ग्राम कोटरा...। जहाँ अंग्रेजों के जमाने का चिकित्सालय भी है और मिशनरी का चर्च भी..। प्रकृति की गोद में बसे इस गाँव को.... घेर रखा है पहाड़ियों ने... जिन पर छाई हरियाली... आसपास का सुरम्य वातावरण.... आमंत्रित करता है... दिल को... रुक जा रे रुक तू... यहीं पर कहीं... जो बात इस जगह है... वो कहीं पर नहीं...। गाँव में प्रवेश करने के बाद... आगे बढ़ते हुए.. दायाँ मोड़ लेकर.... कार कुछ बचती बचाती.. शैली में... हिचकोले खाते हुए... एक बार खुले खेतों के बीच से होती हुई.... एक तालाब किनारे जाकर... ठहर जाती है....। सामने है लाल पत्थर का... ऊँचा पहाड़.. और उस पर विराजित हैं... माँ कोटरा वाली...। ध्वजा फहरा रही है.... शक्ति की.. प्रेरित कर रही है... सीढ़ियां चढ़ने को....। कार से उतरते हैं...। पास के मैदान पर... बच्चों के क्रिकेट खेलने के दौरान.... उभरते स्वरों के अलावा... वातावरण शांत है..। फूल माला, प्रसाद, चढा़वा... ले लेने की गुजारिश की आवाजों से मुक्त है... यह स्थान..। ऊपर जाकर माँ शेरा वाली के दर्शन प्रकृति निर्मित गुफा में करना... भक्ति से भर देता है मन को...। शांति की तलाश वालों के लिए... शानदार मुकाम है....। अब तो काफी कुछ उन्नति जैसा दिखाई देता है.... पुजारी जी कुछ और ऊपर जाकर... एक और गुफा देखने की कहते हैं...। चट्टानी पहाडों की... दरार में से होकर... वहाँ भी पहुँचते हैं... ऊँचाई से अनुपम... नयनाभिराम दृश्य... कैद होकर रह जाता है... हमारी और कैमरे... दोनों की आँखों में...। गुफा में प्रवेश करने का... तरीका ही बड़ा अजीब है... पैरों की तरफ से होता है प्रवेश... और शुरू हो जाता है... लगभग पांच सौ मीटर का.... रहस्य और रोमांच का... वो सफर... जिसे आखिरी सांस तक.... भूलना संभव नहीं....। कहीं सीधे... तो कभी झुककर... कभी लेटकर कर.... हवा के ठंडे झोंके भी आते हैं... तो अंधेरा... पसीने से तर बतर... भी कर देता है...। नास्तिक व्यक्ति भी.. गुफा में प्रवेश कर... आस्तिक हो जाता है...। देवी देवताओं का स्मरण करते हुए... आता है... अंतिम सिरा गुफा का.... जहाँ सबसे कठिन परीक्षा है... बाहर निकलने की... करीब आठ से बारह फुट.. ऊँचाई की पर्वत की दरार से नीचे आने की... पेट, पीठ और हाथों के दम पर... खिसकते हुए नीचे आना.. और सरकते हुए.. बाहर निकल कर... पुनर्जन्म के अहसास को.... जी भर कर जीने के बाद.... जय माता दी... का उद्घोष करके.. खुली हवा में सांस लेकर... शुक्र है परमात्मा का भाव... जगा देती है ये गुफा....। मौका मिले... और शौक हो एडवेंचर का... प्रकृति के यौवन को निहाराने का... तो जरूर जाइये.. एक बार..। वैसे नवरात्रि में... मेला लगता है.... मुराद पूरी होती है... नव दंपति और नवजात भी.. माथा टेकने पहुँचते हैं।
--------------------
लेखक मप्र के लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार है और एमपी मीडिया पाइंट के संपादक

देखिये 


Share To:

Post A Comment: