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औरत


सुरेश के घर मे आज खुशी का माहौल था और होता भी क्यों नहीं,,उनकी पत्नी विमला ने तीन पुत्रों के बाद एक चाँद सी बिटिया को जन्म दिया था।इसी खुशी में उन्होंने पूरे मोहल्ले में नत्थू हलवाई के लड्डू बंटवाए।बिटिया के नामकरण का कार्यक्रम उन्होंने धूमधाम से किया और बेटी का नाम रखा दामिनी।दामिनी की मनमोहक छवि ओर चंचलता ने सबका दिल् जीत लिया और घर पर सभी उससे बहुत प्यार करते।सुरेश ओर विमला के लिए वो एक खिलौना थी।सुरेश बाबू तो उसे अपनी आंखों से ओझल ही नही होने देना चाहते थे।माता पिता का पुत्री के प्रति बढ़ता प्रेम देख तीनों बेटे दामिनी से गुस्सा रहते ओर दामिनी को परेशान करते रहते।उसके कहीं जाने पर पाबंदी ,कपड़ो पर पाबन्दी।
दामिनी रोते रोते विमला के पास जाती और भाइयों की शिकायत करती विमला प्यार से दामिनी को समझा देती,,ओर कहती बिटिया तुम पराया धन को कुछ ही दिनों की मेहमान हो फिर जब ससुराल जाओगी तो पति का इतना प्यार मिलेगा सब भूल जाओगी।
सुरेश बाबू ने दामिनी को बहुत उच्च शिक्षा दिलायी।पढ़ाई पूरी होते ही  उसके लिए रिश्तों की खोज शुरू की कई रिश्ते देखे पर अंत मे उन्हें दीपक बहुत पसंद आया।दीपक बहुराष्ट्रीय कंपनी में इंजीनियर था।दामिनी को भी दीपक एक नज़र में पसंद आ गया ।
सुरेश ने धूमधाम से दामिनी की शादी की।दामिनी बहु बनकर ससुराल में आ गयी।कुछ दिनों तक दामिनी को बहुत अच्छा लगा पर धीरे धीरे उसकी सास ने जो बहुत पुराने विचारों वाली थी  उसे छोटी छोटी बातों पर टोकना शुरू किया।संस्कारी दामिनी  सब चुपचाप सुन लेती पर रात को जब दीपक को ये बात बताती तो दीपक हँसकर बात टाल देता और कहता माँ बुजुर्ग है,बुजुर्ग भगवान का दूसरा रूप होते हैं वो जो बोले सुन लिया करो ओर फिर माँ कितने दिनों की मेहमान है उसके बाद फिर तुम जो चाहो वैसा करना।दरअसल दीपक सास बहू के झगड़े में  पड़ना ही नहीं चाहता था।
शादी के एक साल बाद ही घर मे खुशियों के रूप में बेटे का जन्म हुआ,,दीपक ने उसका नाम रखा सूरज।
दामिनी सास पति देवर की देखभाल ओर बेटे की परवरिश में खुद का अस्तित्व कब का भूल गयी थी।उसे अपनी सुध ही नही थी।उसे पता ही नहीं चलता था कब सुबह से रात हो गई।सास का बात बात पर टोकना बढ़ता ही जा रहा था और दीपक हमेशा की तरह हँसकर टाल देता था।
सच होनी का भी कोई भरोसा नही जैसा भी था  अच्छा ही चल रहा था दामिनी की ज़िंदगी में। 
एक दिन अस्पताल से माँ को दिखाकर आते समय एक ट्रक की टक्कर में दीपक ओर माँ भगवान को प्यारे हो गए।दामिनी पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा सूरज केवल सत्रह वर्ष का था उस समय।
दामिनी समझ ही नही पायी कि वो क्या करे।
बस अब उसका एक ही सपना था सूरज को  पढ़ाना ओर उसकी अच्छी नौकरी लगवाना।दामिनी ने दीपक के बीमा ओर प्रोविडेंट फंड से मिले रुपये सूरज की पढ़ाई में लगा दिए और उसे बहुत अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला करवा दिया।पढ़ाई में बहुत होशियार था सूरज,पढ़ाई पूरी करते ही बहुराष्ट्रीय कंपनी में उसकी नौकरी लग गयी।
एक दिन सूरज ने माँ से कहा माँ में दिव्या से शादी करना चाहता हूँ वो मेरे साथ ही नौकरी करती है।
दामिनी के लिए इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती थी ।उसने तुरंत शादी के लिए हाँ कर दी।
दिव्या ओर सूरज की धूमधाम से शादी करवा दी।आज जब बहु घर मे आयी तो दामिनी की खुशी का ठिकाना ही नहीं था।
पर कुछ दिनों में दिव्या ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए बड़े घर की बेटी जो थी दिव्या।उसको दामिनी का बात बात पर बोलना अच्छा नहीं लगता था।एक दिन तो दिव्या सूरज के सामने ही दामिनी से झगड़ पड़ी।और उन समय सूरज ने माँ से कहा माँ तुमने तो अपनी पूरी ज़िंदगी अपने हिसाब से जी ली अब तो घर को दिव्या के हिसाब से चलने  दो।
सूरज के मुँह से ये बात सुनकर दामिनी की आँखों के आगे अंधेरा छा गया, लगा वो बस गिरने ही वाली है बड़ी मुश्किल से उसने अपने आप को संभाला।एक पल में ही दामिनी के सामने उसकी पूरी ज़िंदगी किसी फ़िल्म की रील की तरह घूम गई। 
दामिनी को आज लग रहा था औरत का जीवन हमेशा किसी पुरुष के अधीन क्यों रहता है? 
बचपन मे भाई, जवानी में पति और बुढ़ापे में पुत्र ,, क्यों वो स्वंतत्र निर्णय नहीं ले पाती।
गुलशन प्रेम कोटा राजस्थान
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 परिचय 

गुलशन प्रेम... कोटा राजस्थान से हैं और एक ऐसा नाम जिसके अंदर साहित्य एक जुनून की तरह जिंदा है..। पेशे से एम आर हैं तो घुमक्कड़ है लेकिन  कहीं भी  साहित्य आयोजन हो, गुलशन भाई जरूर शिरकत करते हैं। रिश्तों को जीना भी इनसे सीखा जा सकता है। घर में भी एक म्युजिक लाइब्रेरी सजा रखी है। गुलशन जी का एमपी मीडिया पॉइंट में स्वागत है।
संपादक
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