लेखक 

प्रेम*******

लड़कों की जीन्स के जेब में
तितिर-बितिर रखा 
लड़कियों की चुन्नी के छोर में 
करीने से बंधा 

दूल्हे की पगड़ी में 
सुहागन की
काली मोतियों के बीच फंसा
धडकते दिलों का
बीज मंत्र है प्रेम 

फूलों का रंग
भवरों की जान
बसंत की मादकता
पतझर में ठूंठ सा है प्रेम 

जंगली जड़ी बूटियों का रसायन
विश्वास के ताबीज में बंद
झाड़ फूक और 
सूखे रोग की दवा है प्रेम 

मासूम बच्चे की तरह 
उछाल दिया जाता है आकाश में
गिरता है
उल्का पिंड बनकर    
कोमल दूब और
दरकी जमीन सा होता है प्रेम

कोल्ड ड्रिंग्स की खाली बोतलों सा लुढ़कता 
चाय की चुस्कियों के साथ बिस्किट
और च्यूइंगम की तरह
घंटों चबाया जाता है प्रेम

बूढे माँ बाप की
दवाई वाली पर्ची में लिखा
फटी जेबों में रखा रखा
भटकता रहता है प्रेम 

और अंत में
पचड़े की पुड़िया में लपेटकर 
डस्टबिन में 
फेंक दिया जाता है प्रेम---


"ज्योति खरे"

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लेखक ज्योति खरे छिंदवाड़ा मध्यप्रदेश से हैं ... हिंदी में स्नातकोत्तर...  अभियंता पद से रेलवे से सेवानिवृत... कविता संग्रह होना तो कुछ चाहिए के रचियता... आकाशवाणी और दूरदर्शन पर काव्य पाठ कर चुके.... कई सम्मान से नवाजे गए... एम पी मीडिया पॉइंट के लिए अपनी सेवा देने की सहर्ष सहमति... हमारे छोटे से अनुरोध पर दे रहे हैं.... हम करते हैं आपका स्वागत...। 
संपादक
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