माँ के लिए बेटे का प्यार है दक्कन का ताज
माँ बाप का संतान के प्रति प्यार ..... ठीक झरने के पानी जैसा है... पानी के ऊपर से नीचे आने जैसा..। लेकिन जब संतान माँ बाप से प्यार करे तो पानी का नीचे से ऊपर चढ़ना होता है..... यानि ताकत लगती है.... ठीक वैसी जैसी कि मोटर पंप से पानी ऊपर चढ़ाया जा रहा हो...। ये काम आज के युग में कुछ दुर्लभ सा होता जा रहा है...।
इतना ही कठिन काम वीं शताब्दी में एक बेटे ने किया... मगर अफसोस अधिकांश लोग उस स्थान को देखने के बाद भी... उस को पति पत्नी के प्यार के रूप में ही देखते हैं....। ऐसा संभव इस कारण भी हो पाता है कि..... जिस तरह कि ये इमारत बनाई गई है... वो मियां बीबी के प्यार के रूप में... दुनियाँ के अजूबों मरण शामिल है...। लेकिन इसी ताजमहल की प्रतिकृति बनाई गई है औरंगाबाद महाराष्ट्र में....। इसको अताउल्लाह खां के वास्तु विशारद और हंसपत राय की इंजनियरिंग में 1631 में..... बनाना शुरू करवाया... इतिहास के पन्नों में दर्ज क्रूर शासक ओरंगजेब के बेटे आजम शाह ने.... अपनी माँ रबिया- उल- दुर्रानी उर्फ दुलराम बानो बेगम की याद में...। 1653 ई में यह मकबरा बन कर तैयार हुआ...। लंबे चौड़े क्षेत्रफल में फैले इस दक्कन के ताज में चार मीनारें भी आगरा के ताज महल की तरह खड़ी की गई और नक्काशी भी कराई गई...। बहरहाल माँ बेटे के प्यार की निशानी के रूप में इसे देखने का लुत्फ़ लिया जा सकता है। विदेशी पर्यटकों के लिए भी यह आकर्षण का केंद्र है।
शैलेश तिवारी
माँ बाप का संतान के प्रति प्यार ..... ठीक झरने के पानी जैसा है... पानी के ऊपर से नीचे आने जैसा..। लेकिन जब संतान माँ बाप से प्यार करे तो पानी का नीचे से ऊपर चढ़ना होता है..... यानि ताकत लगती है.... ठीक वैसी जैसी कि मोटर पंप से पानी ऊपर चढ़ाया जा रहा हो...। ये काम आज के युग में कुछ दुर्लभ सा होता जा रहा है...।
इतना ही कठिन काम वीं शताब्दी में एक बेटे ने किया... मगर अफसोस अधिकांश लोग उस स्थान को देखने के बाद भी... उस को पति पत्नी के प्यार के रूप में ही देखते हैं....। ऐसा संभव इस कारण भी हो पाता है कि..... जिस तरह कि ये इमारत बनाई गई है... वो मियां बीबी के प्यार के रूप में... दुनियाँ के अजूबों मरण शामिल है...। लेकिन इसी ताजमहल की प्रतिकृति बनाई गई है औरंगाबाद महाराष्ट्र में....। इसको अताउल्लाह खां के वास्तु विशारद और हंसपत राय की इंजनियरिंग में 1631 में..... बनाना शुरू करवाया... इतिहास के पन्नों में दर्ज क्रूर शासक ओरंगजेब के बेटे आजम शाह ने.... अपनी माँ रबिया- उल- दुर्रानी उर्फ दुलराम बानो बेगम की याद में...। 1653 ई में यह मकबरा बन कर तैयार हुआ...। लंबे चौड़े क्षेत्रफल में फैले इस दक्कन के ताज में चार मीनारें भी आगरा के ताज महल की तरह खड़ी की गई और नक्काशी भी कराई गई...। बहरहाल माँ बेटे के प्यार की निशानी के रूप में इसे देखने का लुत्फ़ लिया जा सकता है। विदेशी पर्यटकों के लिए भी यह आकर्षण का केंद्र है।



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