लेखिका
स्त्री
आ रहा है
उम्र का वो दौर
जब हो गए हैं
अपनों के लिए
कर्तव्य सारे पूर्ण,
ऐसे में सिर उठाने लगे हैं
सोए हुए अरमान.....!
घूमने लगा
मन यादों के नगर में
करने लगा है आत्मविश्लेषण
बचपन, कैशोर्य ,युवावस्था का ,
जीना चाहती हूँ बचपन
माँ-पिता के साथ जैसा
मिलते हैं जो भी बच्चे
आते-जाते कहीं राहों में
उन्हें बचपन की ख़ुशियाँ देकर
अपना बचपन जीती हूँ........!!
बारिश आती है तो
भीगते/गाते हुए
नृत्य करना चाहती हूँ ,
युवावस्था के अधजिये सपनों को
उसी उमंग से जीकर
पूरा करना चाहती हूँ..........!!!
कर्तव्यों के निर्वहन में
परिवार को सहेजने में
अधूरा सा रह गया अस्तिव अपना
खो गया वजूद
दब गया जैसे कपड़ों के ढेर में कहीं
जिसे ढूँढना भी कठिन,,,,,,!!!!
अब जब होने लगे हैं
सारे सोए अरमान चलायमान
तो अब मैं अपने लिए
नदी की तरह बहते रहना चाहती हूँ
पड़ेगी जरूरत तो
पत्थर भी बनूँगी और
राह में आने वाले पत्थरों को
धकेलती आगे बढ़ती जाऊँगी....!!!!!
लो
उठा लिया
अब तो मिलकर
सबके साथ ब्रह्मांड भी,
देखना.....अब क्या-क्या कर जाऊँगी....!!!!!
डा० भारती वर्मा बौड़ाई
--------------------परिचय
डॉ भारती वर्मा बौड़ाई... देहरादून उत्तराखंड से हैं.. पेशे से टीचर हैं... साहित्य के प्रति समर्पण भाव है... आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स पर प्रकाशित होती रही हैं। सम सामयिक सामाजिक सरोकार से भी आपका गहरा नाता है। स्तन कैंसर के प्रति जागरुकता मुहिम में आपकी सक्रिय भागीदारी उनकी समाज के प्रति संवेदनाओं को रेखांकित करती है। एमपी मीडिया पॉइंट के लिए अपनी रचना "स्त्री" भेजी है। आपका स्वागत और आभार...।
संपादक


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