गायक
न जाने कहाँ जाएं, हम बहते धारे हैं ...
जी हाँ... इस बार बात कर रहे हैं... 1975 में आई फिल्म रफ्तार के उस गीत की..... जिसमें जिंदगी का फसाना और अफसाना... दोनों ही फलसफे के अंदाज में.... गीत मे पिरोया गया है....। शब्दों के मोतियों को चुन चुन कर... वाक्यों का धागा बना कर..... गीत की जो माला तैयार की गई है.... वाकई में जीवन के उस दर्शन को बहुत ही सहजता से कह जाती है.......जिसे उपनिषदो में बहुत ही गूढ़ शब्दों में बताने की कोशिश की गई है.... लेकिन गीतकार अभिलाष जी की... कलम के इस कलाम... पर सौ-सौ सलाम... करने को जी मचल उठता है कि... उन्होंने कितने सरल अंदाज में ... जिंदगी का फलसफा समझा दिया है। लगे हाथ यह भी बताते चले कि.... गीतकार अभिलाष .... उस व्यक्तित्व का नाम है... जिसने एक गीत ऐसा भी लिखा... जो तमाम स्कूलों, कालेजों और कार्यक्रमों में... प्रार्थना का सर्वमान्य गीत बन गया...
जिसके बोल हैं... "इतनी शक्ति हमें देना दाता... के मन का विश्वास का कमजोर हो न...।" इस गीत के लिए उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह ने कलाश्री के सम्मान से नवाजा..। यह भी हो सकता है कि... इस गीतकार का नाम जुबां पर कम ही आया हो....। बाद में इन्हें 2012 में दादा साहब फाल्के अवार्ड भी मिला है....।
गीत को संगीत दिया है... चाचा भतीजा की मशहूर संगीतज्ञ जोड़ी.... सोनिक ओमी ने.... गीत में छिपे दर्द को... असल भाव को.... उभार कर श्रोताओं के लिए कर्णप्रिय... और कालजयी बना देना... संगीत का ही कमाल होता है...। जैसे ही गीत का... प्रारम्भिक संगीत (intro music) शुरू होता है... तब सुनियेगा... बायलिन की उस कसक को... जो कानों में गीत के दर्द को पिघला कर.. दिल में उतार देती है...।.... और उस पर गीत के बोल.... संसार है एक नदिया..... जब गायक मुकेश की आवाज में सुनाई देते हैं... तब मानों सुनने वाला... उस धार में खुद को बहता हुआ... महसूस करता है.... और पार्श्व से कोरस के आते हुए स्वर..... अहा!!!!!... श्रोता को दुनियाँ... जहान... से काटकर.. गीत की नाव की सवारी ही करा देते हैं.... टकराने लगता है उसका मन... दुःख और सुख के दोनों किनारों से... जो उसने भोगे हैं... जीवन की लहरों के थपेडों के साथ...। गायक मुकेश की आरोह - अवरोह की लहरों वाली... धीर गंभीर आवाज.... कायनात भर के सुर ताल...को अपने में समेट कर हम तक पहुंचती है। हालांकि इसके एक अंतरे के बाद गायिका... आशा भोसले दूसरा अंतरा गाती हैं... बारिश की बनती बिगड़ती बूंदों के... माध्यम से जीवन के बनने बिगड़ने... की कहानी भी सुना देती है...।
खैर इस फिल्म के नायक विनोद मेहरा और नायिका मौसमी चटर्जी हैं...। गाना चरित्र अभिनेता मदन पुरी और नायिका मौसमी चटर्जी पर फिल्माया गया है...।
परिचय
गीत के मजे लेने से पहले ये और जान लीजिए कि, इस गाने के मुकेश के गाये अंतरे को आपके सामने लेकर आए हैं... कराओके गायक दिलीप सिंह परमार... वैसे तो मूलतः आष्टा के निवासी हैं.... परिवार उज्जैन निवास करता है.... और दिलीप जी.... भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के क्षेत्रीय लोक संपर्क ब्यूरो ग्वालियर में क्षेत्रीय प्रचारक के पद पर कार्यरत हैं...। अब सुनिये इस मिसाल बने गीत को... परमार साहब की बेमिसाल आवाज में...।
संपादक- शैलेश तिवारी
सुनिए


Post A Comment: