राजेश शर्मा 

पत्रकार हूं संवेदना लिखता हूं.. कभी दर्द तो कभी सच लिखता हूं, फिर भी कईबार शोषित हो जाता हूं, कई बार उलाहनाये भी झेलता हूं, पत्रकार हूँ संवेदना लिखता हूं,

तुम्हारी चाहत की कलम लिखता हूं, कभी रेसिपी तो कभी सुंदरता बटोरता हूं, कभी आतंकियों तो कभी आंदोलनों से गुजरता हूं, थप्पड़ तो कभी धक्के  खाता हूं, पत्रकार हूं संवेदना लिखता हूं,

राजनीति लिखता हूं रणनीति बन जाता हूं, सच की छलनी मे परोसता हूं, कभी दस्तावेजों पर तो कभी चौराहे पर कुचला जाता हूं, पत्रकार हूं संवेदना लिखता...
कभी दलाल कभी बिका हुअा कहलाता हूँ। कभी जलील होता हूँ, कई रातें फांके गुजारकर बिता देता हूँ।

परिवार से दूर रहता हूँ, क्या खाया-क्या पिया ध्यान नहीं देता हूँ। हररोज सिर्फ़ समाज मे आइना लिए घूमता हूँ...

दोस्तों, मैं गणेशशंकर विद्यार्थी का वंशज हूँ इसीलिए पत्रकार कहलाता हूँ।

बच्चों को बाजार लेकर नहीं जाता सोचता हूँ कहीं यह खिलौनों की जिद ना करलें...

बस एक जुनून की जागीर हूँ , मेले लिबास मे उजले भविष्य के लिए अपनी जिंदगानी मिटाता हूँ मैं . . .. .क्योंकि पत्रकार हूँ मैं।

दीपावली क्या होती नहीं जानता! पराये घरों मे जलता दीप बन त्योहार मनाता हूँ, . . .क्योंकि पत्रकार हूँ मैं। दिल मे होली जल रही हो भले ही लेकिन, मैं होली मे कंडे-लकड़ी बन जल जाता हूँ , कई रंगों मे ढला हूं इसीलिए पत्रकार कहलाता हूँ।

 मेरे हर टुकड़े जिगर के कुछ बोलते रहते हैं इसीलिए सदियों तक पहचाना जाता हूँ। चांद देख तुमने मनाए त्योहार, मैं सितारा बन गरीबों के जिगर मे पहुंच जाता हूँ ...क्योंकि मैं पत्रकार हूँ।

मुझे चाह नहीं सरकार की किसी योजनाओं की, मैं अपनी मंज़िल खुद कलम के सहारे तय करता हूँ। गिरती-बनती सरकारें जिसका कुछ बिगाड़ नहीं पायी आजतक वह अदना सा पत्रकार हूँ मैं...

मुझे अपने वालों ने ही नाम रिपोर्टर का देदिया,किसी ने बताया प्रतिनिधि हूँ फिर भी कोई मलाल नहीं है क्योंकि मैं पत्रकार हूँ ...
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