जीवन तो सुंदर है मगर..... 

हैलो…..
सर कार्यक्रम मे आना है आपको बतोर अतिथि..
अनुज प्रदीप नागिया की आवाज सुनाई दी। मैंने पूछा… क्या आयोजन करने जा रहे हो भाई..। नगर के होनहार युवाओं के लिए सौंदर्य प्रतियोगिता का मंच सजाने जा रहे है। Ok ही निकल सका मुँह से..। …

ख्यालातों के झोंकों से परम्परा के बादल टकरा उठे। ठीक रहेगा इस आयोजन में जाना..। परम्पराओं के प्यार ने अंगड़ाई लेकर कहा…मच गई ऊहापोह.. हाँ और न दोनों अपनी तरफ खींचने में व्यस्त…लेकिन अंदर के जिज्ञासु बच्चे ने हिप्नोटाइज कर दिया विचारों की भँवर को….सम्मोहन की अदाओं ने सदा सीखने की चाह को बलवती किया…। देखें तो सही इसमें आखिर होता क्या है…सुने हुए और देखे का अंतर समझने की इच्छा जाग्रत हो गई….संशय गुजरे वक्त का हिस्सा बन गया…..निर्णय हो चुका…

बाइक की दिशा… आयोजन स्थल की तरफ कर दी..। साढे सात के निर्धारित समय पर पहुँचा वहाँ…। रंग बिरंगी रोशनी मे नहाया स्टेज…. तैयार था कुछ नया दिखाने को…। कुछ मम्मीयां अपने नटखटों को संवार रही थी… मालूम हुआ वंडर किड्स भी केट वाक करेंगे रैम्प पर…। साउंड सिस्टम की धम-धम…. दिल में कंपन पैदा कर रही…।

तभी आए आयोजक प्रदीप नागिया…. अग्रिम पंक्ति मे बैठने का उनका आग्रह…. मेरा सवाल कब शुरू होगा जलसा.. उनके साथी विक्रम मिश्रा ने मुझे कंपनी देना शुरू किया… तफ़्सील से हर तैयारी की जानकारी दे रहे थे…

प्रतिभागी पिछले दो घंटे से खुद को तैयार करने में व्यस्त हैं… अपने अपने ड्रेस डिजाइनर, मेक अप, और अन्य सहयोगियों के निर्देश में… इस जानकारी ने कौतुहल बड़ा दिया… टी आकर के मंच की, साउंड सिस्टम, रंगीन रोशनी, जज की नियुक्ति, अतिथि आमंत्रण, प्रतिभागियों का सिलेक्शन आदि कई दिनों की मेहनत से आज की शाम खूबसूरत बनने वाली थी…।

घड़ी की सुइयों के आठ तक पहुँचते पहुँचते… मुख्य अतिथि और जज की पेनल का आगमन हो चुका… संचालक ने अपनी उद्घोषणाएँ शुरू की… कार्यक्रम शुरू हुआ… युवा बालाओं और नौजवानों ने… अपनी पहनी हुई ड्रेस के मुताबिक खास अंदाज में चलकर… अपना जलवा बिखेरना शुरू किया…उपस्थित युवाओं के कंठ से लंबी ऊ…ऊ…ऊ..की आवाज उत्साह बढ़ाने के लिए काफी थी…धमाकेदार आवाज में बजते संगीत पर उनकी केट वाक जारी रही…

देखकर कुछ कोफ़्त भी हुई…. क्या जरूरत है ये सब करने की… लगा भीड़ से अलग दिखने की चाह… अपना वजूद साबित करने के जुनून को बाजारवाद ने केश कर लिया… प्रायोजकों की लंबी सूची गवाह थी इस बात की….।

बारी नन्हें मुन्नों की भी आई… हुनरमंद संतानों की अदायगी पर तालियां कुछ ज्यादा आई…। ख्यालात की नदी की गुनगुनाहट भला क्यों रुकती.. प्रतिभागियों मे से बेहतर छांटने के मापदंडों मे क्या क्या शामिल होगा… इसी दिशा में विचार सरिता का प्रवाह था..। प्रतियोगिता में तीसरा स्थान किसी को नहीं मिलता… भारतीय रेल की तरह तीसरा दर्जा खत्म है यहाँ…. ये अलग बात है कि सेकंड रनर अप की अवधारणा.. घोषित तो थर्ड ही करती है…।

प्रतियोगिता की समाप्ति पर मुख्य अतिथि पूर्व मिस इंडिया रहीं शैफाली शर्मा के साथ मंच साझा किया… उनसे परिचय कराया मेरे पत्रकार साथी छोटे भाई विवेक दोहरे ने….। इतने में जज मंडल को स्टेज पर बुलाया गया… परिणाम की घोषणा के लिए…जिसमें शामिल थी जैना फ़ारूखी मैडम..

आते ही उन्होंने मुझसे कहा…. आपको देखा है कहीं… एक खूबसूरत महिला के मुँह से सुनकर अच्छा तो लगा… लेकिन उन्हें पहचान नहीं पाने का मलाल ज्यादा रहा…। क्या आप पहले दैनिक जागरण मे काम करते थे… मैंने हां कहा तो बताया कि.. वो भी इवेंट मैनेजर के तौर पर उस समय वहीं थी…।

मेरी पहचान का कारण बना मेरी ठोड़ी का गहरा काला तिल… ये राज जानकर मुस्कुरा उठा मैं… कहा.. ऊपर जाकर धन्यवाद दूंगा प्रभु को… वाह क्या चीज बख्शी आपने मुझे…. शिकायत भी करूँगा कि.. ये तिल जैना मेम जैसी सुंदर महिला को क्यों न अता किया…।

परिणाम की घोषणा के लिए जैना मेम के हाथ माइक आया और उन्होंने दो शब्द बोलने का आग्रह कर दिया… इस सौंदर्य प्रतियोगिता में आए सभी जन सौंदर्य दर्शन के प्रति जागरूक होंगे ही… आदि काल से सौंदर्य दर्शन मानव मन की तीव्रतम इच्छा रही है… आज के युग मे तो ये परोसने का आईटम है… पुरुषों की सेविंग क्रीम के एड में सुंदर महिला की उपस्थिती इस बात की गवाह भी है…।

मेरा सवाल है आपसे कि सौंदर्य बोध आप मे से कितनों को है… संभव है कि सभी हाथ उठा दें.. जो बाह्य सौंदर्य के पारखी ज्यादा होंगे…। इस शाम को सुंदर बनाने में आयोजकों ने अथक मेहनत की….। कुछ घंटों की शाम को सुंदर दिखने के लिए युवाओं ने कितना अधिक समय खर्च किया है.. तब जाकर ये शाम हमारे जीवन की एक खूबसूरय शाम बन सकी है…।

समय के छोटे से हिस्से को खूबसूरत बनाने के लिए कितना कठोर परिश्रम सभी ने किया….। यही एक बात हमारे काम की है… कि अगर पूरे जीवन को सुंदर बनाए रखना है तो….. कितना परिश्रम करना होगा… कौन कर पाता है इतना परिश्रम… इतनी हाड़ तोड़ मेहनत… जो जिंदगी के हर लम्हें को खूबसूरत बना दे…। ज़ाहिर है सवाल का जवाब सवाल ही होता जनसमुदाय की तरफ से…। एक विचार का पुर्जा उनकी तरफ उछालते हुए मैंने आगे कहा कि…. ईश्वर ने खुश रहने की नियामत केवल इंसान को बख्शी है… किसी अन्य प्राणी को नहीं… प्रसन्न रहने की प्रतिनिधि क्रिया का नाम है….. मुस्कान… जो टूटे दिलों को जोड़ने की ताकत रखती है…. नफरत की आँधियों से हमारे बसे बसाए आशियानों को बचाती है… लेकिन दिक्कत ये है कि…. आदमी गैरों से तो मुस्कुरा लेता है… पर अपनों से मुस्कारने मे उसकी जान निकलती है….
घर में मुँह चढ़ा कर घुसने वाले…. जिस दिन मुस्कुरा कर घर में आने लगेंगे…. जिंदगी सुंदर हो जाएगी…. इसमे न ज्यादा खर्च है… न मेहनत…. न कोई परेशानी…। तो जरा मुस्कुराइये जनाब…. और जिंदगी को सुंदर बनाने में जुट जाइये...।
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