लेखक
हम आठ -दस लोग होली का रंग खेल रहे थे अडोस-पड़ोस के घरों में रंग लगाकर आये और बुजुर्गों का आशीर्वाद भी लिया . चौथे फ्लोर से नीचे उतारते हुए मैंने दूसरे फ्लोर कि डोर बेल बजा दी . मेरे दोस्त घबरा से गए थे कि अनजान आदमी के घर कैसे जाएँ .
दरवाजा आंटी जी ने खोला था . मैंने नमस्ते किया और उनके पैर छुए .
"हम आपके पडोसी हैं और होली खेलने आये हैं . अंकल जी कहाँ हैं ?" मैंने प्रश्न पूछा .
"वो अन्दर हैं . आ जाओ बेटा ." और उन्होंने सबके लिए रास्ता दे दिया . दूसरे कमरे में अंकल जी उदास से लेते हुए थे . हमें देखकर वह उठ बैठे .
"आओ बच्चो आओ . होली मुबारक हो ." वह मुस्कुराते हुए बोले .
"अंकल जी ! आप बाहर बहुत कम निकलते हैं . क्या बात है ? कोई काम हो तो आप हमें निस्संकोच बता दिया करें . आपके बच्चे ही हैं हम भी ." मैंने कहते हुए उन्हें टीका लगा दिया गुलाल का . उन्होंने मुझे बहुर कस के सीने से लगा लिया.
"ओये राजू !....." उनके मुंह से यह नाम अचानक निकला . मैं हैरान था .
"अंकल जी ! राजू कौन है ? आपका बेटा है क्या ? कहाँ रहता है ?" मैंने सवाल किया . मेरे मित्र भी शांत खड़े थे .
"हाँ, बेटा था मेरा . इन्डियन आर्मी में था . पोता भी था . उसकी शहादत के बाद बहू की शादी कर के हम यहाँ आ गए . आज बहुत मन उदास था . तुमने हमारी होली मना दी . वरना आजकल कौन किसी का ख्याल करता है . लोगों को खुद से ही फुर्सत नहीं ." वह मुझसे अलग होते हुए बोले .
"अंकल जी ! हम सब हैं न . हम हर सन्डे को पार्क में इकट्ठे होते हैं , वहाँ सफाई करते हैं और एक -दूसरे के साथ खेलते हैं . आप भी चला करें आंटी जी को लेकर . अब आप के ही हैं हम सब बच्चे . " मेरे कहते ही सब ने उन्हें और आंटी जी को रंग लगाया और पैर छोकर आशीर्वाद लिया .
"बैठो बच्चो , मैं पकौड़े बनाती हूँ ." आंटी बोली .
"बलबंत कौरे ! पकौड़े रहने दे . नमकीन दे जरा आज दो पैग लगाऊंगा इनके साथ ." अंकल जी ने चहकते हुए कहा .
"हा हा हा ...अंकल जी हम में कोई भी नहीं पीता पर नमकीन हम सब खाते है " मेरे इतना कहते ही कमरा ठहाकों से गूँज उठा .
"आइये ! आप भी चलिए ,आज सब से मिलवाते हैं आपको ." और हम अंकल जी को साथ लेकर फिर अगले घरों में घुस गए . आंटी के चेहरे की मुस्कान और आँखों के गीले कोर सिर पर लिया दुपट्टा पोंछ रहा था . आज उन्हें एक नया परिवार मिल गया था .
शब्द मसीहा
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विलक्षण रचनाकार। कविता, कथा, उपन्यास व आलेख लेखन पर पूर्ण अधिकार रखते हैं।
भारतीय रेल के मुंशी प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित शब्द मसीहा केदार नाथ जी की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आप भारतीय रेल में अभियंता पद पर पदस्थ हैं।
संपादक
नया परिवार========
बात होली के रोज की है . कुछ समय से सामने के मकान में एक बुजुर्ग दंपत्ति रहने आये थे . किसी से कोई राम-रहीम भी नहीं था . सिर्फ काम से काम जैसे दूध लेना , सब्जी लेना और अपने घर में कैद रहना .हम आठ -दस लोग होली का रंग खेल रहे थे अडोस-पड़ोस के घरों में रंग लगाकर आये और बुजुर्गों का आशीर्वाद भी लिया . चौथे फ्लोर से नीचे उतारते हुए मैंने दूसरे फ्लोर कि डोर बेल बजा दी . मेरे दोस्त घबरा से गए थे कि अनजान आदमी के घर कैसे जाएँ .
दरवाजा आंटी जी ने खोला था . मैंने नमस्ते किया और उनके पैर छुए .
"हम आपके पडोसी हैं और होली खेलने आये हैं . अंकल जी कहाँ हैं ?" मैंने प्रश्न पूछा .
"वो अन्दर हैं . आ जाओ बेटा ." और उन्होंने सबके लिए रास्ता दे दिया . दूसरे कमरे में अंकल जी उदास से लेते हुए थे . हमें देखकर वह उठ बैठे .
"आओ बच्चो आओ . होली मुबारक हो ." वह मुस्कुराते हुए बोले .
"अंकल जी ! आप बाहर बहुत कम निकलते हैं . क्या बात है ? कोई काम हो तो आप हमें निस्संकोच बता दिया करें . आपके बच्चे ही हैं हम भी ." मैंने कहते हुए उन्हें टीका लगा दिया गुलाल का . उन्होंने मुझे बहुर कस के सीने से लगा लिया.
"ओये राजू !....." उनके मुंह से यह नाम अचानक निकला . मैं हैरान था .
"अंकल जी ! राजू कौन है ? आपका बेटा है क्या ? कहाँ रहता है ?" मैंने सवाल किया . मेरे मित्र भी शांत खड़े थे .
"हाँ, बेटा था मेरा . इन्डियन आर्मी में था . पोता भी था . उसकी शहादत के बाद बहू की शादी कर के हम यहाँ आ गए . आज बहुत मन उदास था . तुमने हमारी होली मना दी . वरना आजकल कौन किसी का ख्याल करता है . लोगों को खुद से ही फुर्सत नहीं ." वह मुझसे अलग होते हुए बोले .
"अंकल जी ! हम सब हैं न . हम हर सन्डे को पार्क में इकट्ठे होते हैं , वहाँ सफाई करते हैं और एक -दूसरे के साथ खेलते हैं . आप भी चला करें आंटी जी को लेकर . अब आप के ही हैं हम सब बच्चे . " मेरे कहते ही सब ने उन्हें और आंटी जी को रंग लगाया और पैर छोकर आशीर्वाद लिया .
"बैठो बच्चो , मैं पकौड़े बनाती हूँ ." आंटी बोली .
"बलबंत कौरे ! पकौड़े रहने दे . नमकीन दे जरा आज दो पैग लगाऊंगा इनके साथ ." अंकल जी ने चहकते हुए कहा .
"हा हा हा ...अंकल जी हम में कोई भी नहीं पीता पर नमकीन हम सब खाते है " मेरे इतना कहते ही कमरा ठहाकों से गूँज उठा .
"आइये ! आप भी चलिए ,आज सब से मिलवाते हैं आपको ." और हम अंकल जी को साथ लेकर फिर अगले घरों में घुस गए . आंटी के चेहरे की मुस्कान और आँखों के गीले कोर सिर पर लिया दुपट्टा पोंछ रहा था . आज उन्हें एक नया परिवार मिल गया था .
शब्द मसीहा
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परिचय
शब्द मसीहा केदारनाथ नई दिल्ली से हैं औरविलक्षण रचनाकार। कविता, कथा, उपन्यास व आलेख लेखन पर पूर्ण अधिकार रखते हैं।
भारतीय रेल के मुंशी प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित शब्द मसीहा केदार नाथ जी की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आप भारतीय रेल में अभियंता पद पर पदस्थ हैं।
संपादक


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