मुझे जिंदा जलाकर होली तापो
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राजेश शर्मा 

अगर मै मर जाता तो सब आते_     दोस्त,रिश्तेदार,प्रापर्टी के हिस्सेदार,बकायादार आदि-आदि । रोना,पीटना,चीखना भी मचाते मगर मुद्दे की बात यह है कि मुझे मालूम पड़ता क्या कि किसने मेरे प्रति कितना स्नेह प्रकट किया!
तब मेरे भेजे मे बात आई कि मरकर मरने से ज्यादा उम्दा है जीकर मरना। जीते-जी मरो ताकि पता तो चले कि कौन कैसा। मेरी शव यात्रा का शुभारंभ  उसी तरीके से हो जैसे मेने कई सेठों की अटेंड की हैं। बाजे-गाजे के बीच रोता-बिलखता परिवार छोड़ने का दृश्य भी हरकोई नहीं देख सकता।
फिर रास्ते मे राम नाम सत्यता के नारे मरने वाले किसी महानुभावों ने सुने क्या आजतक
लेकिन इस सौभाग्य प्राप्ति का मैं अकेला धनी होऊंगा। अब पहुंचे श्मशान तो वहा लकड़ी-कंडे भी देख सकूंगा, कि कम है की ज्यादा। लकड़ी कौन-कौन से ब्रांड की है!! कंडों मे मिलावट तो नहीं ! पूरे चेकअप के बाद जिंदा इसीलिए जल जाऊंगा कि साहब जिन्दगी मे मुझे पता नहीं वह दिन, जब मैं जिंदा न जल‍ा।
मै कभी इससे जला, कभी उससे जला, कभी जला तो कभी जलाया गया। ऐसा जला कि दिल मे दाग और धब्बों ने ढेर लगा लिया। जलन तो ऐसे हो गई जैसे सात फेरे उस ही के साथ लिए हों। मेरे जलने की आंच से पड़ोसी भी झूलसे। उनको मेरे रिश्तेदारों ने बातों का "बरनाल" लगाकर जैसे-तेसे शांत किया।
मुझे जलाया या मैं खुद जला लेकिन भाग्य भी ऐसा रुठा आजतलक पूरा नहीं जल पाया। आधुनिक आधा-अधुरा प्रहलाद बनकर रह गया।            
 (बुरा ना मानो होली है)
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