लेखक 
जुल्मतों में आईना खुद को दिखाना चाहिए 
सब्र को भी मुश्किलों में आजमाना चाहिए

लोग हैं गुमराह क्यों कर साजिशों के फेर में 
लग रही है आग जो मिलकर बुझाना चाहिए

बेसबब भड़के जो दंगे बढ़ गयी दुश्वारियां
मर रही इंसानियत को अब बचाना चाहिए

सेकते हैं रोटियाँ जो भी सियासत के लिए
इक सबक उन रहनुमाओं को सिखाना चाहिए

कौन सा मजहब सिखाता बात नफरत की यहाँ
शर्म से खुद अहमकों को डूब जाना चाहिए

खून के प्यासे दरिंदों घूमते हैं हर जगह 
अम्न की खातिर इन्हें काबू में लाना चाहिए

हिंद की अस्मत लगी है दांव पर अब दोस्तों
इस सदी अब मुल्क को जन्नत बनाना चाहिए


विनीत मोहन औदिच्यसागर, मध्य प्रदेश

---------------

परिचय


 विनीत मोहन औदिच्य सागर, मध्य प्रदेश के निवासी हैं। हिंदी उर्दू व अंग्रेजी भाषाओं में क्रमश:कविता, ग़ज़ल व आलेख लेखन करते हैं। आपकी ग़ज़ल संग्रह -#खुशबू ए सुखन(2014)कविता संग्रह - #काव्य प्रवाह(2015) #भाव स्रोतस्विनी (2019) #कारवां ए ग़ज़ल (2020)साझा संग्रह -
(साहित्य_दीप) काव्य पुंज, नीहारिका(शीर्षक साहित्य) - शब्द कलश ( सोपान) - शिखर की ओर पहला कदम नवोदित साहित्यकार मंच - शुभमस्तु - 6 (साहित्य सागर) - 'रोशनी की कतारें' व ',' ग़ज़ल सागर' प्रकाशित हो चुके हैं। 
आपको काव्य शिखर सम्मान (काव्यांचल) 
शब्द कुंज व शब्द सारथी सम्मान (शीर्षक साहित्य परिषद्) विशिष्ट साहित्यकार सम्मान (सोपान) साहित्य दीप शलाका सम्मान (साहित्य दीप) 2018 व 2019 माँ शारदे सम्मान व काव्य सागर सम्मान (#साहित्य_सागर) एवं विभिन्न समूहों द्वारा सर्वश्रेष्ठ रचनाकार सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। विनीत जी शीर्षक साहित्य परिषद् में आयोजन संचालक सहित विभिन्न साहित्य समूहों में लेखक एवं पदाधिकारी के रूप में सक्रिय हैं। 

*सम्प्रति -* उच्च शिक्षा विभाग, म. प्र. शासन के अंतर्गत शासकीय महाविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य व भाषा का अध्यापन।
----------------------

समीक्षा

बात विनीत जी की ग़ज़ल की..... 
आज जब कोरोना का कहर दुनिया भर में फैला हुआ है.. हर जुबां जब इसकी ही चर्चा  है.... इसको रोकने का कोई वेक्सिन भी मेडिकल साइंस के पास नहीं है...। तब इसके खिलाफ जंग में एक बात है .....सतर्कता ...जो इस वायरस को फैलने से रोकेगी... और दूसरी है हिम्मत या वो जज्बा जो हमें इससे लड़ने की ताकत देगा....। 
विनीत मोहन जी की यह ग़ज़ल कुछ ऐसे ही भाव अपने अंदर समाए हुए है... जो इन्हीं बातों को हमारे अंदर पैदा करती है जैसे दुनियाँ देखने वालों को वह कहते हैं आईना भी कभी खुद को दिखाना चाहिए.... यानि खुद अगर जिंदा रहे.. सतर्कता अपना कर... तभी तो आप किसी का जीवन बचा सकेंगे। इसी शेर की दूसरी लाइन में वह सब्र के इम्तिहान जैसी बात करते हैं। आज वास्तव में पूरे देश के लिए मुश्किल के हालात हैं और हमने संयम खो दिया तो.. हालात और मुश्किल होंगे...।  इसी दौर में अफवाहें फैल रही हैं... ऐसी साजिश (अफवाह) से हमें गुमराह होने की जरूरत नहीं है बल्कि कोरोना से जो आग लग रही है पूरे देश में... उस को बुझाने के हमे एक जुटता दिखाने की जरूरत है...। ऐसा लगता है जैसे ये ग़ज़ल इसी माहौल के लिए लिखी गई है। बढ़ती सामाजिक खाइयों की वजह से जो मुश्किलें बढ़ी हैं, उन खाइयों को पाटते हुए इंसानियत को जिंदा किये जाने की जरूरत पर जोर दिया है। तो अगले कदम पर शायर ने ऐसे नाजुक वक्त पर भी सियासत करने वालो को बेनकाब करने की अपील सी की है। इसी तरह से उन्होंने आगाह भी किया है कि सब भूलकर केवल अच्छे नागरिक होने का परिचय दें और यह आग्रह भी किया है कि इस समय देश की इज्जत इस वजह से दांव पर लगी है कि भारत अपने सीमित संसाधनों से कोरोना से कैसे लड़ पाएगा... यही जंग हमें जीतकर इस सदी में भारत को विकसित देशों की सूची में शामिल कर इसे स्वर्ग से सुंदर बनाने के संकल्प पर काम करना चाहिए...। इतनी मौके की रचना के लिए विनीत जी और उनकी लेखनी दोनों को प्रणाम.....। 
इकबाल साजिद के इस शेर के साथ.... 
प्यासे रहो न दश्त में बारिश के मुंतज़िर 
मारो ज़मीं पे पाँव कि पानी निकल पड़े 
शैलेश तिवारी
Share To:

Post A Comment: