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सम्मान का सम्मान==============


दरिया गंज उतर गया था कार्यक्रम से लौटते हुए और चल पड़ा था रामलीला मैदान की तरफ़। चाय की तलब लग रही थी सो मैं राममनोहर लोहिया अस्पताल के सामने से गुजर रहा था। जी. बी. पन्त अस्पताल के सामने आखिर एक चाय वाले को बैठा देखकर मैंने चाय बनाने को कह ही दिया।
एक ओर बैठकर मैं चाय पीने लगा। ठण्ड बहुत थी और पूरे कपड़े पहनने के बाद भी शरीर में घुसी जा रही थी। सच तो ये है कि चाय का गिलास पकड़कर हाथों में कुछ गर्मी महसूस हुई थी। अभी एक दो घूंट ही पिये थे कि एक अधेड़ सी औरत ठिठुरती हुई आई और उसने गिलास आगे बढ़ाया और बोली, "भैया, इसमें चाय डाल दो। जरा जल्दी कर दो बच्चा अकेला है मेरा।"
चायवाला अपनी ही मस्ती में था। वह शायद किसी के लिए इकट्ठी चाय बना रहा था। उसने बात लगभग अनसुनी कर दी थी।
"भाई इसे पहले चाय दे दो, इसका बच्चा अकेला है।" मैंने आग्रह किया।
चायवाले ने मुझे देखा, " साहब, यहाँ तो सब घोड़े पे सवार आते हैं। अन्दर इनकी जबान जरा नहीं खुलती। तीन दिन से है यहाँ। अभी कौन-सी छुट्टी मिल रही। चाय बेचना तो मेरा काम ही है।" वह उबलती चाय को चम्मच से फेंटते हुए बोला।
"बिल्कुल है भाई, लेकिन एक चीज की कीमत नहीं होती और उसे इंसानियत कहते हैं। इस ठण्ड में खुद ही देखो इसके पास तो कुछ बचने को भी नहीं है खास। इसी चाय से एक कप दे दो क्या हर्ज है इसमें?"
"साहब! इंसानियत से ही काम नहीं चलता। गरीब हूँ, गरीबी को जानता हूँ ,मजबूरी को समझता हूँ मगर कुछ लोग इससे भी गरीब हैं, ये चाय उनके लिए बना रहा हूँ। उधर देखो साहब, गरीब लोग गाड़ी में बैठे हैं। अगर चाय नहीं दी तो मेरे भी बच्चे भूखे मरेंगे। इसके तुरंत बाद बनाता हूँ।" और वह चाय केतली में छानने लगा।
जब मेरा ध्यान उधर गया तो मैंने देखा कि कुछ पुलिसवाले गाड़ी में बैठे थे। आपस में हँसते हुए बतिया रहे थे।
उस औरत के शरीर पर गर्म कपड़े के नाम पर सिर्फ़ एक हाथ से बना स्वेटर था। किसी तरह साड़ी के पल्लू से खुद को तेज हवा से बचाने का असफल प्रयास कर रही थी।
"कहाँ से आई हो बहिन?" मैंने पूछ ही लिया उससे।
"बाबू जी! सरधने के पास है हमारा गाँव। बेटे के दिल में बीमारी है। जल्दी में हम कपड़ा-लत्ता रखना भूल गए और बेटे को लेकर भाग लिए। इसके मामा घर से आयेंगे तो कपड़े लायेंगे। साहब उसकी जान बच जाय बस। पैसा रहता तो कहीं और ईलाज करवाते। अब गरीब मार है किस्मत की सो झेल रहे हैं।"
उसकी बात में सच्चाई थी और एक माँ की मजबूरी भी साफ़ झलक रही थी। वैसे तो मैं क्या मदद करता उसकी पर तभी दिमाग में बिजली कौंधी। मैंने अपने बैग से मुझे आज सम्मान में मिली शाल निकाल ली।
"लो बहिन, इसे रख लो। तुम्हारे काम आयेगी। ठण्ड बहुत है दिल्ली में।"
उसने शाल ली और खोलकर ओढ़ ली। मैंने दस का नोट चाय वाले को दिया  और आगे बढ़ गया।
मैं उसकी मजबूरी से उपजा कोई भी शब्द सुनना नहीं चाहता था। शायद कुछ कहा भी हो उसने। मुझे आज लगा कि इस सम्मान का सही में मैंने सम्मान रख लिया हो जैसे।

शब्द मसीहा

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परिचय

नई दिल्ली के रहवासी शब्द मसीहा केदार नाथ
विलक्षण रचनाकार। कविता, कथा, उपन्यास व आलेख लेखन  पर पूर्ण अधिकार। भारतीय रेल के मुंशी प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित शब्द मसीहा केदार नाथ जी की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आप भारतीय रेल में अभियंता पद पर पदस्थ हैं।
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