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तन्हाई सनम शहनाई बन जाए जहाँ पर.... 


आज जब सड़कों पर सन्नाटा है। हर दरवाजा बंद है। लेकिन यादों का झरोखा पूरी तरह खुला है। यादों के झोंकों का आना जाना वैसे भी बदस्तूर जारी रहता है लेकिन अब जब केवल तन्हाई है तब यादों की शहनाई खूब बाज रही है। उसकी हर रागिनी अपना अलग प्रकार का सुर छेड़ देती है। इसी तन्हाई ने जब यादों की शहनाई गुंजाई तो बचपन से लेकर युवावस्था की कुछ ऐसी बातें भी याद आ गई जो गाहे बगाहे भी कभी आती नहीं थी। अब जब आ गई तो उनको शब्दों में बांधकर आप से साझा करने का मन हो उठा। आइए आपको भी उनकी सैर कराता हूँ। 
पहले जब  हम साइकल से चलते थे और जब कोई ट्रक जब हमें ओवर टेक कर के आगे निकल जाता था । उसके पीछे कुछ स्लोगन लिखे रहते थे, जिन्हें पढ़ने में मजा भी आता था लेकिन मतलब की तलाश हमने उस दौर में कभी नहीं की। 
एक बहुत ही सामान्य सा स्लोगन जो आपको भी याद होगा..  ""जिंदगी रही तो फिर मिलेंगे""..।  तब यह समझ नहीं आता था कि सब कुछ अच्छा चल रहा है तो इस ट्रक वाले को इस तरह का स्लोगन लिखने की क्या जरूरत पड़ी है। लेकिन आज जब पूरी दुनिया एक लाइलाज बीमारी के चलते भय के माहौल में है तो इस स्लोगन में छुपे निहितार्थ समझ आ रहा है कि अभी तो बचो, बच गए तभी तो मिल पाएंगे। 
इसी प्रकार एक स्लोगन रहता था " सावधानी हटी दुर्घटना घटी""   कुछ कुछ समझते और समझ कर नासमझ बने रहते परंतु कोरोना ने सिखा दिया घर में रहने में ही सावधानी है, बाहर निकले तो कोरोना से मुलाकात होकर अस्पताल तक पहुंचने या उसके बाद की दुर्घटना घटने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। 
एक स्लोगन पर और गौर करें.. 
"" keep distance "" ..। वो गलबहियों वाला जमाना था। बकबास लगती थी दूरी बनाए रखने की नसीहत..।
जो बात उस समय इतनी सामान्य दिखती थी आज इस महामारी के समय जब  विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा यह कहा जा रहा है अभी इस महामारी का कुछ चिकित्सीय इलाज नहीं आ पाया परंतु सावधानी से रहकर और एक दूसरे से शारीरिक दूरी पर रहकर सतर्कता से ही इस बीमारी से बचाव किया जा सकता है । स्लोगन का अर्थ भी समझ आने लगा। 
इसी प्रकार इस समय देश की पूरी चिकित्सा व्यवस्था करोना नामक बीमारी  से मुकाबले के लिए जुटी हुई है कोई सामान्य बीमारी का मरीज पहुंचता है तो उससे कहा जाता है पहले गंभीर मामलों को देख लेने दे सामान्य चीजों को फिर देखेंगे तब"" जगह मिलने पर साइट दी जाएगी"""
  का अर्थ भी कुछ कुछ समझ आने लगा है। 
इसी प्रकार हम जब किशोरावस्था और युवावस्था में थे। तब फिल्म देखने का अपना मजा होता था तो टाकीज की संख्या भी हर शहर में उसकी जनसंख्या के हिसाब से हुआ करती थी और उस समय सिनेमाघर की बैठक व्यवस्था आज के हिसाब से कुछ  अलग होती थी। यानि जैसा टिकट खरीद सकने की हैसियत होती, उस हिसाब से बैठने की जगह तय हुआ करती। जो थोड़े सक्षम लोग होते थे  सेकंड क्लास की टिकट लेते थे। कुछ और सक्षम रहते थे वह फर्स्ट क्लास की टिकट लेते थे और जो संपन्न लोग रहते थे बालकनी में बैठकर फिल्म का आनंद लेते थे। अत्याधिक वीवीआइपी लोगों के लिए बॉक्स में स्थान रिजर्व रहता था और बाकी जो आम आदमी जिसके लिए फिल्म देखना ही विलासिता  कहलाता  था परंतु अपने मनपसंद हीरो की फिल्म देखना या जिस फिल्म के बहुत अधिक चर्चा हो उसे देखना और अपने रोजमर्रा के गम को भुलाना जब उसके लिए जरूरी हो जाता । तब वह सबसे आगे पटिंयों पर जिसे बेंच कहते थे। वहाँ की टिकट के पैसे की जुगाड़ भर कर पाता था। जिसकी टिकट  की कीमत होती थी  एक रुपिया और साठ पैसा। मेरे शाला जीवन से लेकर और कॉलेज में भी मित्र रहे। अभी भी मेरे मित्र हैं पंडित शैलेश तिवारी उनका एक डायलॉग बहुत याद आ रहा है। जब कोई आम आदमी किसी विशेष या खास काम को अंजाम देता था व  साधन  संपन्न लोगों  अपेक्षा किसी प्रतियोगिता या किसी चुनाव में विजय होता था। उनके मुंह से निकलता, इसने सब को एक साठ मे ला दिया। 
 आज जब मैं समाचार पढ़ रहा था कि इंग्लैंड के प्रिंस चार्ल्स तथा प्रधानमंत्री की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। इसी प्रकार पूरी दुनिया में बड़े-बड़े लोगों  को जब करोना 
 संक्रमित  रिपोर्ट पाई जा रही है । तब वह दिन याद आते हैं। जब भारत पोलियो या चेचक जैसी छुआछूत की बीमारी से लड़ रहा  था। विकसित देशों द्वारा कई तरह की बातें कही जाती थी। आज पूरा विश्व इस बीमारी के कारण संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। मेरे मित्र शैलेश तिवारी का डायलॉग याद  आ रहा है। जब मिलेंगे तो कहेंगे, यार जयंत  भाई, 
 इस कैरोना ने  सबको 1:60 (एक साठ ) में ला दिया। सब को एक समान कर दिया। 


जयंत शाह, सीहोर

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