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चुटकी भर धूप〰️〰️〰️〰️〰️〰️
गीताभवन का चप्पा-चप्पा आह्लादित और उत्साहित नज़र आ रहा है। अन्दर हॉल मंगला चाची के कब्जे में है जहाँ विवाह के मांगलिक पल समय के पन्नों से निकलकर मौली की आँखों में आने वाले कल की सूरत में समा रहे हैं।"ओफ्फोह! लड़कियों... अरे मेंहदी में ही अगर दोपहर कर दोगी तो हल्दी कब लगेगी बन्नो को" ।
मंगला चाची लाख व्यस्त हों मगर घड़ी की सुई का हर कदम आज उनकी साड़ी के पल्ले में बँधा है जैसे।
"काये बरेली बाली। लड़की की सगी बुआ हो सौतेली मामी नहीं... अरे लगे तो ऐसा। बैठी हो हाथ पे हाथ धरे। तनक ढोलक उठा लेओ। जे भी निऊरी बैठी हैं सारी, कछु सगुन की बन्नी गा लेओ। मोड़ी की मेंहदी हो रही है...."
और जमना बुआ ढोलक पर थाप लगा छेड़ देती हैं अपने जमाने की मेंहदी का गीत "सखी तुम नहीं सताओ जी... मत लिखो पिया का नाम, ननंदिया देखेगी.... बन्नी शरमाएगी... " और जम जाता है हुजूम बुआ के पास और ढोलक, मंजीरे की धुन में मेंहदी की ख़ुशबू और रंग गहराने लगते हैं।
बाहर मैदान कनातों से घेरकर आँगन बना लिया है सत्तू कक्का ने। बल्लू महाराज के सिर पर सवार हैं कक्का और रहेंगे जब तक डोली न उठ जाये मोली की खुशी-खुशी।
हजार हों के पाँच हजार जीमने वाले, बल्लू हलवाई के माथे पर कभी शिकन नहीं आती। पर सत्तू कक्का जगत कक्का ऐसेई नहीं हैं। जब ले ली जिम्मेदारी तो ले ली। मजाल कोई कह दे मक्खन बड़ा खस्ता नहीं है या कचौड़ी में हींग कम है।
बूँदी के लड्डू बने तो अपने हाथ से घोंटी थी केसर समधियाने की डलिया के लड्डुओं के लिए।
"अरे तुम ओरे छील रहे हो के खा ही रहे हो बटला.... जरा टैम देखो, अभई खाने की पुकार होने लगेगी। जल्दी हाथ चलाओ।
महाराज तुम भूनो मसाला और पनीर तलो, हम ला रहे मटर। आज सब्जी में मजा आनो चहिये...."
किसी के जिम्मे टेंट हाउस का सामान किसी को जनवासे की तैयारियाँ। हर काम व्यवस्थित। कहीं कोई हड़बड़ी नहीं। बस सहजता से हर काम हो रहा है।
क्यों न हो, मोली की शादी है। कल तक जो रामदीन की बेटी थी। उस हादसे के बाद अब सारे शहर की बेटी हो गई है।
गेट के पास गुलमोहर के नीचे चबूतरे पर बैठी मोली की नानी, मंडप में रखने वाले कलश पर मांडने बनाते हुए बार-बार भीगती आँखों को आँचल से सुखाती जा रही थीं।
सोचा भी नहीं था कि अब हाथ पीले होंगे मोली के। सब तो स्वाहा हो गया था उस आग में। दान-दहेज से लेकर कपड़ा-लत्ता और जमा की नगदी..... कुछ नहीं बचा था जमाई के पास। सगे-संबंधियों ने किनारा कर लिया था विपदा आई देख।
जिस घर में शहनाई बजना थी एक दिन बाद वहाँ मातम हो रहा था।
देवनगर के उस छोटे से घर में जगह तो पहले से कम थी। उस पर नाते-रिश्तेदारों और सामान से कोई कोना खाली नहीं था।
एक कमरे में दहेज का सामान, दुल्हन के कपड़े और रुपया पैसा वाली अलमारी रखी थी। सामने आले में पूजा का कलश और दीपक रखा था।
पता नहीं कौन चला तो गैस के सिलेंडर भी रख आया वहीं। भगवान जाने कैसे उसमें से एक सिलेंडर से गैस निकलने लगी।
किसी ने रामदीन से रुपये माँगे। वो तेजी से उस कमरे में गया और पैसे निकालने लगा। तभी नजर गई दीपक तो बुझा था किसी ने देखा भी नहीं। माचिस उठाई और तीली सुलगाई दीपक जलाने को मगर सुलग उठा पूरा कमरा।
भक्क से लपटें उठीं और हाहाकार मच गया। दौड़े सब रामदीन को लाये बाहर। कोई पानी ढूँढ रहा था कोई कह रहा था फायरब्रिगेड बुलाओ तब तक एक और धमाका हुआ।
पास रखा दूसरा सिलेंडर भी फट गया था। पीछे की दीवार ढह गई थी और ढह गया था मोली की शादी का सपना।
अध जला पिता अस्पताल में था और महीनों की तैयारी शादी की पूरी तरह खाक हो गई थी। मोली ने सोच लिया था सामान के साथ जल गया हर अरमान।
शहर में आग की तरह फैली यह आग की खबर। जिसने भी सुना सुनकर दो शब्द अफसोस के कहे, किसी ने एक आँसू भी छलका दिया।
एक शख्स था जिसने जब सुना तो उसके अन्दर का इंसान छटपटा उठा। पहले भी जब कभी मानवता पर आँच आई, उसने भरसक कोशिश की और हर तरह से मदद के लिए प्रयास किए थे। अस्पताल में खून की जरूरत हो किसी को या पूस की रात में कोई काँप रहा हो सर्दी से, लोकेश उपाध्याय ने कसर न रखी। रक्तदान के साथ कम्बल दान जैसे अनेक सेवाभावी काम दर्ज हैं उसके सामाजिक ग्रुप उँगली. कॉम और उसकी सहयोगी टीम संडे का सुकून के खाते में।
आज जब पत्रकार का नाम सुनते ही गोदी पत्रकारिता और चाटुकारिता जैसे शब्द मस्तिष्क में चमकने लगते हैं, लोकेश ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अपने कंधे का सहारा देकर गिरने से बचा रखा है।
रहा नहीं गया मानवता के इस पुजारी से और खनकने लगे फोन। सक्रिय हो गया वाट्स और मैसेंजर तंत्र।
इस काम को करेंगे कैसे दादा.... लड़की की शादी का मतलब बहुत खर्चा। पैसा कहाँ से आयेगा.... पूछा टीम के सदस्यों ने।
लोकेश ने जैसे सब सोच लिया था। बोला यह होगा "मिशन चुटकी भर धूप"।
रामदीन के परिवार में जो अँधेरा छाया है उसे हटाना है। अब हर किसी को देनी होगी एक चुटकी धूप। हम सूरज नहीं ला सकते लेकिन एक एक चुटकी कर इतनी धूप तो ला सकते हैं एक बच्ची के भविष्य पर छाये अँधेरे को हरा सकें।
समझ आई बात और सक्रिय हो गये सारे। ज्योत से ज्योत जलाते चलो और साथी हाथ बँटाना साथी रे के आवाह्न ने असर दिखाया।
हैसियत और संसाधन के मुताबिक हर कोई बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगा मोली के विवाह में।
नई तारीख तय हुई ससुराल वालों से मंत्रणा करके।
इस बार दुल्हन का पिता अकेला नहीं है। नगर है घराती और प्रतीक्षा है आयें बाराती.... विदा हो धूमधाम व पूरे अरमानों के साथ एक बेटी...
सार्थक कर दिया है सिद्धपुर का नाम। लोकेश तेरे जज्बे को सलाम.... याद रखेगा जमाना तेरे काम और नाम.......
मुकेश दुबे
------------------------परिचय
मुकेश दुबे साहित्यकारइनके कई कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। नियमित और समसामयिक कहानी लेखन में सिद्धहस्त हैं। आप सीहोर के शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल मे व्याख्याता पद पर अपनी सेवा दे रहे हैं।
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समीक्षा
चुटकी भर धूप..... शीर्षक वाली कहानी के माध्यम से लेखक मुकेश दुबे जी ने उस घर की खुशियों को शहर के लोगों से वापस लौटाया है। जिस घर की ढोलक की थाप पर थिरकती जिंदगी को आग की लपटों ने निगल लिया था। यह कथानक इस समय ज्यादा प्रसांगिक इस लिए और लगता है जब देश में सांप्रदायिकता की लकीर गहरी खाई में तब्दील हो रही है। आपसी प्रेम, सौहाद्र और भाई चारा जमींदोज हुआ जा रहा है। उस वक्त में कथानक एक छोटे से हादसे के माध्यम से वो बड़ी बात कह रहा है जो हमारे राजनीति के रहनुमाओं को देश में करना चाहिए। कथानक में किस तरह मीडिया कर्मी अपनी भूमिका एक कस्बाई मानसिकता के शहर में तय करके एक परिवार को उसकी खोई हुई खुशियाँ लौटाने में मददगार साबित हो रहा है। यह कथानक शहर में घटी घटना से भी मेल खाता है और पूरे देश को आपसी प्यार, सद्भाव और सामाजिक एकता का वह संदेश भी दे रहा है। जिसकी जरूरत आज समाज और राष्ट्र दोनों को है। मुकेश दुबे जी की लेखनी से सम सामयिक कथानक बहुत ही सहजता और सरलता से शब्द के वाक्य बनकर एक कहानी की शक्ल ले लेते हैं और संदेश दे जाते हैं खुशियो का... आपसी मेलजोल को जिंदा रखने का..। कहानी का प्रवाह किसी फिल्म की तरह पाठक की आँखों के सामने चलाये रखने वाली कलम को प्रणाम.....।
संपादक- शैलेश तिवारी


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