लेखिका
‘दृढ़ निश्चय’
एक बड़ी सी काली पन्नी में, कूड़े के ढेर में से प्लास्टिक, काग़ज़, गत्ता, बोतल बीनती लाली, दोबारा से स्कूल जाने के सपने देखा करती और फिर अपने सपनों को पंख देने के लिए, सारे कबाड़ को ठेले पर लाद, चल देती सेठ के पास उसे बेचने। सेठ उसे मजबूर और नासमझ जान, पूरे तोल की क़ीमत में कटोती करके, शेष रकम उसकी नन्ही हथेलियों पर रख देता |
घर के लिए राशन, बाबा की दवाई और छोटे भाई के लिए दूध लेने के पश्चात, चाहकर भी वह किताबों के लिए पैसे नहीं बचा पाती थी|
उसकी मजबूरी उसके सपनों के आड़े आ रही थी। बीमार बाबा की देख रेख और छोटे भाई के भरण पोषण का भार उस के नाज़ुक कंधों पर आन पड़ा था |
माँ तो छोटू को जन्म देते ही दूसरे लोक जा बसी थी और फिर बाबा अकेले ही लोगों के घरों से कचरा इकट्ठा कर, उसे बीनने का काम करते और उसे बेच जो कुछ हाथ में आता , उससे दोनों बच्चों समेत जीने की जद्दोजहद में लगे रहते | हाँ, लाली को स्कूल भेजना कभी न भूलते और इसी के चलते लाली भी पढ़-लिख कर एक ऊँची उड़ान भरने के सपने देखने लगी थी |
मगर अब गत कुछ दिनों से बाबा बीमार चल रहे थे | शारीरिक कमज़ोरी के चलते चलने-फिरने में लाचार, उनका काम करना बंद हो गया था |
इंसान के लिए रोज़ी-रोटी पहली प्राथमिकता होती है, इस फ़लसफ़े को समझते हुए लाली आज भी निकल पड़ी है अपने बाबा का ठेला उठा और संग में चल पड़ा है उसका छोटा भाई राजू भी |
सड़क पर स्कूली बच्चों का रिक्शा, अपने ठेले के साइड से निकलते देख, लाली पल भर के लिए वहीं ठिठक गई |
“अरे दीदी, सीधे से चलाओ ना | यह क्या पीछे मुड़ मुड़कर देख रही हो ?” राजू ने पूछा |
“कुछ नहीं राजू, इन स्कूली बच्चों के माध्यम से, हम दोनों का सुनहरा भविष्य देख रही हूँ |” लाली ने उत्साहित होते हुए कहा |
“मगर हम तो स्कूल भी नहीं जाते | शायद बाबा सही कहते हैं..ग़रीब की क़िस्मत कचरे के माफ़िक़ ही रहती है – गंदी, बदबूदार और सड़ी हुई |
“राजू, कचरा साफ़ करने से ही साफ़ होता है | बाबा यह भी तो कहते हैं कि मेहनत व लगन से कहीं पर भी पड़े, कैसे भी कचरे को साफ़ किया जा सकता है |”
राजू को समझाते व नाजुक पैरों से ठेला खींचते, लाली ने कूड़ाघर के पास पहुँच कर ही दम लिया | आज दोनों ने मिलकर कचड़ा बीना और फिर सेठ की दुकान पर चल दिए |
“ये लो पैसे |” सेठ ने कबाड़ के पैसे लाली को देते हुए कहा |
“तोल से कम पैसे दे रहे हो सेठ |”
“अच्छा तो तुम हिसाब जानती हो !”
“अनपढ़ तो नहीं हूँ..पांच जमात तो पढ़ी हूँ और अब आगे भी पढ़ना है |”
सेठ ने फिर से गल्ले की ओर हाथ बढ़ाया |
“ सेठ, घर जाकर हिसाब लगाया था मैंने। 30 रूपये कल के कबाड़ में कम दिए थे आपने .. आज वो भी पूरे कर देना |” आत्मविश्वास भरे लहजे में लाली ने कहा |
सेठ ने उसे तिरछी नजरों से देखा और अगले ही पल, गल्ले से निकल उसका पूरा मेहनतनामा उसकी सख्त हथेलियों
पर था |
दोनों बहन-भाई दृढ़ निश्चय कर चुके थे कि वे अपनी मेहनत व लगन से अपनी क़िस्मत पर पड़े हर कचरे को साफ़ कर, उसे अवश्य चमकाएँगे |
लक्ष्मी मित्तल
---------------परिचय:
लक्ष्मी मित्तल ..द्वारका, नई दिल्ली की रहने वाली हैं।
लेखन विधा में कहानी, लघुकथा, कविता आदि में आप सिद्धहस्त हैं। आपका एक सांझा संग्रह मातृ-पितृ विशेषांक' , 'पिता' प्रकाशित हो चुका है। एमपी मीडिया पॉइंट में आपका स्वागत है।
संपादक
-------- "लाली और राजूओं" के लिए लिखा यह साहित्य लेखिका को क्षितिज पर पहुंचाने वाला है। साथ ही व्यवस्था पर जबरदस्त प्रहार भी।---संपादक


Post A Comment: