लेखक 


आँखें

जब जन्म हुआ मेरा दुनिया में, पहली बार खुलीं आँखें।
मैंने जग के परिदृश्य, इन्हीं नयनों की खिड़की से झाँके।।

मेरी आँखों में आँख डाल, माँ ने मुझको दुलराया था।
बाँहों के झूले में भरकर ममता ने दूध पिलाया था।।

मां एक दिठौना आंखों के काजल से मुझे लगाती थी।
दुनिया की बुरी नजर से वह मुझको इस तरह बचाती थी।।

मैं रोता था, वह रोती थी, मैं हँसता था, माँ हँसती थी।
मेरी मूरत, मेरी सूरत उसकी आँखों में बसती थी।।

मुझको पल भर अपनी आँखों से दूर नहीं रख पाती थी।
मुझको यदि किंचित चोट लगी, माँ की आँखें भर आती थीं।।

मैं घर भर का प्यारा, दादा-दादी का राजदुलारा था।
मम्मी की पुतली था, पापा की आँखों का मैं तारा था।।

दो आँखों को रोशनी मिली, इसलिए प्राप्त हर अनुभव था।
चलना, फिरना, पढ़ना, लिखना, आँखों के बिना न संभव था।।

मैं युवा हुआ, इन आँखों ने ही सपने नए सँजोए थे।
आँखों से आँखें चार हुईं थीं, बीज प्यार के बोए थे।।

उस प्रथम दृष्टि का प्रथम प्यार जीवन भर अपने साथ रहा।
जो कुछ, जैसा मैं बन पाया, उनमें आँखों का हाथ रहा।।

हैं अब भी याद विरह वियोग वाली दो भरी-भरी आँखें।
हैं अब भी स्मरण, समाज और घर की वे डरी-डरी आँखें।।

वे आँखें थीं या ज्वार और भाटा से भरा समंदर थीं।
सच कहता हूँ, रेखा-ऐश्वर्या की आँखों से सुंदर थीं।।

कजरारी और कटीली आँखों का वह मोहक सम्मोहन।
है बसा आज भी आंखों में, वह मदमादक मोहक यौवन।।

उन आँखों की गहराई ने मुझको कुछ ऐसा फ़ना किया।
कवि रूप दिया,इस अदना से ज़र्रे को पर्वत बना दिया।।

वाल्मीकि क्रौंचवध देख नहीं यदि पाते, डाकू रह जाते।
वह रामायण के छंद अनुष्टप जीवन में कैसे गाते।।

यदि रत्नावलि की दो आँखें तुलसी को राह न दिखलातीं।
तो भक्ति हमारी रामचरितमानस से वंचित रह जाती।।

थे दृष्टिहीन वह सूरदास, पद-बालरूप गोपाल बसे।
आँखों के चलते ही मीरा के नयनों में नंदलाल बसे।।

आँसू की दो बूँदें करुणा का रूप, सत्य का दर्शन हैं।
वह नहीं सृष्टि में कहीं कि जो दो नयनों में आकर्षण हैं।।

इनके समक्ष नभजल, भूजल या उदधि-किलोल नहीं होता। 
आँखों के पानी का यारो, दुनिया में मोल नहीं होता।।

गायक, लेखक, चिंतक बन अंतरदृष्टि महत्ता सिखा गए।
कितने जन्मान्ध हुए हैं जो, दुनिया को राहें दिखा गए।।

प्यारी होती हैं ये आँखें, अपनी आँखों से प्यार करो।
कानों का सुना न मानो पर, इन आँखों पर एतबार करो।।

मैंने भी खुली रखीं आँखें, जो देखा वही सही पाया।
पर अनाचार देखे मैंने, यह आँखें मूँद नहीं पाया।।

अन्याय देखता हूँ जब, अंदर दावानल भर जाता है।
कैसे होंगे वे, जिनकी आँखों का पानी मर जाता है।।

कुछ आँख दिखा कर बने काम, कुछ आँख बचा कर बने काम।
जो आंख लड़ाकर बने काम, क्यों भला बताएं सरेआम।।

जब छड़ी सफ़ेद पकड़ चलते कुछ दृष्टिबाधितों को देखा।
फिर लगा सोचने, माथे पर खिंच आई चिंता की रेखा।।

तब गया एक दिन, नेत्र बैंक में दृष्टि दान मैं कर आया।
कुछ घंटों में चारों धामों के पुण्य कमाकर घर आया।।

ईश्वर ने दो उपहार दिए, ये दीए न यूँ ही फेंकूँगा।
मर कर भी मैं इस दुनिया को, अपनी आँखों से देखूँगा।।

दृग, लोचन, नयन, अक्षि, अम्बक, तुम चक्षु, नेत्र या चश्म कहो।
जब तक है नजर, नज़ारे हैं, इनके रक्षण में निरत रहो।।

जो नेत्रों की रक्षा करते, देते उपचार, ज्योति जीवन।
उनके श्री चरणों में कवि के शत नमन और शत वंदन।।
----------------------
सूर्य कुमार पांडेय
538क/ 514, त्रिवेणी नगर द्वितीय, लखनऊ-226020


परिचय 

सूर्य कुमार पांडेय, लखनऊ उत्तरप्रदेश के निवासी हैं। देश विदेश के कवि सम्मेलनों के मंच पर आपकी उपस्थिति ही ठहाकों की गारंटी मानी जाती है। हास्य और व्यंग्य के प्रसिद्ध हस्ताक्षर दादा पांडेय जी सब टीवी के "वाह वाह क्या बात है" .... सहित अन्य काव्य आधारित कार्यक्रमों में अपने हंसगुल्ले परोस चुके हैं। हिंदी के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं। यू ट्यूब पर आपकी रचनाएँ उपलब्ध हैं। आपकी कई रचनाओं को अन्य ने आवाज भी है। आज के युग का प्रसिद्ध मोबाइल के "टिक टॉक " में आपकी ही आवाज में कुछ हास्य दृश्य वायरल हो रहे हैं। हास्य व्यंग्य के क्षेत्र के नव हस्ताक्षर कवियों के आप  आदर्श हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
_ संपादक
Share To:

Post A Comment: