शैलेश तिवारी 

आने को है... हँसते हुए ज़माने का मुस्कुराने का दौर.... 

एक मार्च टी 20 ... किसे ये उम्मीद थी कि.. भाग दौड़ करती जिंदगी यूँ थम जाएगी...। हवाई जहाज अपनी रफ्तार खो देंगे... ट्रेन की हमेशा धड़धड़ाने वाली पटरियां यूँ खामोश हो जाएंगी.... सड़को पर दौड़ते वाहन थम जाएंगे..। वक्त की कमी का रोना वालों के पास.... वक्त ही वक्त होगा...। डीजल पेट्रोल के धूंएं से.. प्रदूषित हो रही हवा.. को शुद्धता की सांस लेने का मौका मिलेगा...। लेकिन एक पखवाड़ा बीतने के बाद... ऐसा करने का आव्हान पीएम ने किया... और 22  मार्च को ट्रायल हो गया.... शाम पांच बजे ताली, थाली, शंख, घड़ियाल, बजाकर सब ऐसे खुश हुए कि कोरोना को हरा ही दिया... लेकिन अपना सोचा कहाँ होता है... नए संवत्सर से... इक्कीस दिन का लॉक डाउन पूरे देश मे शुरू हो गया....। थम गई जिंदगी... गुनगुनाना भूल गई... फिर तलाशे गए खुद को.. व्यस्त रखने के, खुश रखने के तरीके..। इनमें गीत संगीत का ने भी अपना मुकाम खोजा....। इसी खोज बीन में पंकज उधास की एक ग़ज़ल भी एक चाहने वाले ने एम पी मीडिया पॉइंट को भेजी...। उसका क्या उद्देश्य रहा... ये वही जाने... लेकिन हमें तो जिंदगी का.... हर हिस्सा इस ग़ज़ल में जीता हुआ लगा....। इसमें अतीत की कहानी .... वर्तमान का शोध.... और भविष्य की संभावनाएं दिखी...। आप भी मजा लीजिए... पहले हमारे दौर का... जब केवल और केवल भाग दौड़ थी.. रिश्तों के बीच खाई बढ़ती जा रही थी.. सांस लेने की फुर्सत नहीं थी... पत्नी अपने पति से कहती थी... इतनी भाग दौड़ किस लिए... पति झुंझलाकर कहता था... तुम लोगों के लिए ही तो कर रहा हूँ...। इसके लिए ग़ज़ल का एक एक शब्द क्या कहता है.. पढ़िये.. 


अब मेरा  दौर है ये  कोई नहीं किसी का हर आदमी अकेला हर चेहरा अजनबी-सा आँसूं न मुस्कराहट जीवन का हाल ऐसा अपनी खबर नहीं है माया का जाल ऐसा पैसा है  मर्तबा है इज्ज़त-विकार भी है नौकर है और चाकर बंगला है  कार भी है ज़र पास है ज़मीं है लेकिन सुकूं नहीं है पाने के वास्ते कुछ क्या-क्या पड़ा गंवाना…


ठीक यही दौर हम जी रहे थे... मार्च के पहले पखवाड़े में... न रोने की फुर्सत थी... न मुस्कान के लिए वक्त था...। बस ....
पीछे बंधे थे हाथ और शर्त था सफर... 
किससे कहते पाँव के कांटे निकाल दे..। 
जब कभी जिंदगी तन्हाई के पल हमें अता करती थी तो बचपन के वो दिन याद आते थे जब दादा दादी के दौर में... परियों की कहानी सुनते सुनते... बारिश के पानी में कागज की नाव तैरा कर खुश हो जाते ... कोई शरारती साथी.... पानी में पत्थर फेंक कर.. लहरों की हलचल तेज कर देता... और हमारी कागज की नाव लहर के एक थपेड़े में डूब जाती... साथी खुश लेकिन हम उदास हो जाते... फिर याद आता दादा जी का वह दौर भी जिसके बारे में ग़ज़ल ये गुनगुनाती है..... 


दादा हयात थे जब, मिटटी का एक घर था,चोरों का कोई खटका न डाकुओं का डर था ।खाते थे रूखी-सूखी,सोते थे नींद गहरी ,शामें  भरी-भरी थीं, आबाद थी दुपहरी…संतोष था दिलों को माथे पे बल नहीं था दिल में कपट नहीं था आँखों में  छल नहीं था थे लोग भोले-भाले लेकिन थे प्यार वाले  दुनिया से कितनी जल्दी सब हो गए रवाना…


गुजिस्तां वक्त के उन लम्हों को याद करते करते आँख भी भीग जाती... जब पिता जी के समय में घर के माहौल की याद आती...। स्कूल से लेकर कालेज तक के दिन की रंगिनियाँ झिलमिला जाती हैं आँखों के सामने.... बेडमिंटन क्रिकेट फुटबॉल खेलते खेलते... दोस्तों के साथ की मटर गश्ती में.. पिता की मेहनत की तरफ तब ध्यान नहीं गया... उस समय का घर भी ऐसा याद नहीं आया... जैसा ग़ज़ल ने अब दिलाया... 


अब्बा का वक़्त आया तालीम घर में आई तालीम साथ अपने  ताज़ा  विचार  लाई आगे रवायतों से बढ़ने का  ध्यान  आया मिटटी का घर हटा तो पक्का  मकान आया दफ्तर की नौकरी थी, तनख्वाह का सहारा मालिक पे था भरोसा हो जाता था गुज़ारा पैसा अगरचे कम था  फिर भी न कोई ग़म था कैसा भरा-पूरा था अपना  गरीब-खाना …


... यादों के झरोखों के बंद होते ही... आँख फिर आज को देखती हैं... अब जिंदगी घर में बंद है... ये दुनियाँ को पहली लड़ाई है... जो मैदान में नहीं... घरों में बंद रहकर लडी जा रही है..। यकीं है... जीत जाएंगे हम...। क्योंकि कुदरत ने हमारा चयन किया है... इस लड़ाई को लड़ने के लिए हमें काबिल पाया है... इस उम्मीद के साथ कि... काकून से भी जब रेशम का कीडा बाहर निकलता है... तो कठिनता के साथ निकल कर रेशम का निर्माण करता है... अगर वो मुश्किलों से रूबरू नहीं हो तो... रेशम नहीं बना पाएगा...। 
ऐसा ही कठिन दौर हमारे सामने भी है... प्रकृति हमें तैयार कर रही है... आने वाली पीढी को कुछ बेहतर सौंपने के लिए... यही तो ग़ज़ल के आखिरी बंद में कहा गया है... 


ए आने वाली नस्लों ए आने वाले लोगों भोगा है हमने जो कुछ वो तुम कभी न भोगो जो दुःख था साथ अपने तुम से करीब न हो पीड़ा जो हम ने भोगी तुमको नसीब न हो..जिस तरह भीड़ में हम तन्हा रहे अकेले वो जिंदगी की महफ़िल तुमसे न कोई ले ले… तुम जिस तरफ से गुजरो मेला हो रौशनी का रास आये तुमको मौसम इक्कीसवी सदी का हम तो सुकूं को तरसे तुम पर सुकून बरसे आनंद हो दिलों में जीवन लगे सुहाना…। 



विश्वास पैदा कीजिये कि आने वाली पीढी के लिए कोरोना सभी तरह की खाइयों को पाटने वाला साबित हो। उनका दुःख सुख एक हो सबका..... उनमें अपनेपन की भावना ज्यादा हो.. बेगानापन कम हो....। तभी आएगा हँसते हुए ज़माने के मुस्कुराने का दौर...।

Share To:

Post A Comment: