जब देश में बेरोजगारी का 7.78 के रिकार्ड स्तर पर पहुँच चुका है, तब देश में बात युवा हाथों को रोजगार देने की योजनाओं पर नहीं होती है। शेयर बाजार का सूचकांक अधोगति की तरफ है और हम दंगों में मरने वालों के आंकड़ों पर उलझे होते हैं। आखिर हम जा किस दिशा में रहे हैं, हमारी दशा क्या होने वाली है? यह सवाल हर उस जेहन में उठ रहा है जो राष्ट्र उन्नति के बारे में विचार करते हैं। 
दिल्ली के दंगों में मरने वालो का आंकड़ा अब 46 पर पहुँच गया है। कई शवों को पहचाना जाना बाकी है तो कोई माँ अपने लाल को तलाश करती हुई शव गृहों के दरवाजे खटखटा रही है। देश के दिल दिल्ली की धड़कनों में असहजता बहुत ही सहज से महसूस होती है। लेकिन 48 घंटों तक दिल्ली हिंसा की आग में झुलसती रही कोई भी आग की शांत करने आगे नहीं आया। दिल्ली की सरकार हो या केंद्र की, भाजपा , कांग्रेस, आप, सपा, बसपा सहित किसी की भी जुबां नहीं खुली..? और न ही किसी पार्टी के नेता वहाँ पहुँच कर ढांढस बंधाते नजर आए..? हाँ, जब एन एस ए अजीत डोभाल वहाँ पर पहुंचने को हुए तो 48 घंटे तक जारी हिंसा पर केवल तीन घंटे में काबू पा लिया गया...। कमाल है न? डोभाल साहब का योगदान कमतर करने की चाह नहीं है लेकिन राजनीति के गलियारों में छाई खामोशी चीख चीख कर अपनी नाकामी कह रही है...। जो सत्ता में होगा जाहिर है सवाल उनसे ही पूछे जाएंगे.. कि जस्टिस मुरलीधर का रातों रात तबादला किया जाना क्या.. किसी नेता को बचाने की कोशिश थी...? शायद हाँ... तभी तो अगले दिन कोर्ट चार हफ़्तों का समय दे देती है...। 
अब जबकि बहुत कुछ खोने के बाद दिल्ली की दहशत में कुछ कमी आई है तब भी कोलकाता की गृह मंत्री की रैली में..... गोली मारों सालों को.... के नारे सुनाई देते हैं। वहाँ की पुलिस उन्हें गिरफ्तार भी कर लेती है। अपनी मुखर बयानी करने वाले देश के गृह मंत्री की अब तक की दिल्ली हिंसा पर खामोशी सवालो को जन्म देती है। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल बजट के दूसरे सत्र में हंगामा भी करते हैं लेकिन मौन छाया रहता है। कांग्रेस संसद के बाहर गृह मंत्री के इस्तीफे और प्रधानमंत्री से जवाब की मांग करते हुए नारे बाजी कर रही है लेकिन जनाब लोकतंत्र का वह उजियारा कहीं नजर नहीं आता...। जिसकी रोशनी से दुनियाँ  रोशन हुआ करती थी..। अब वहाँ अपनी स्वार्थ सिद्धि का या सत्ता पर काबिज होने का वह अंधियारा अपने पैर पसार चुका है... जिसके दूर होने के आसार ही तब दिखाई देंगे जब इस देश में भारतीयता दिखने लगेगी..। अभी तो देश में सामाजिकता की लकीर को गहरी खाई में बदलते देख कर अफसोस होता है। 
इसी अंधियार में हम किस दिशा और दशा की तरफ बढ रहे हैं...? अंदाज लगाना बहुत मुश्किल है...?
शैलेश तिवारी 
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