सिंधिया ने छोड़ी कांग्रेस 
प्रदेश में कांग्रेस का भविष्य खत्म 
अहंकार पर स्वाभिमान की जीत 

विजया पाठक 

तमाम प्रयासों के बाद आखिरकार कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से तौबा कर ली। अब सिंधिया भाजपा के हो गए हैं। शील, शालीन और सौम्य व्यक्तित्व के सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने से आज भले ही कांग्रेस को नुकसान नहीं दिख रहा हो लेकिन आने वाले वक्त में कांग्रेस को भारी कीमत चुकानी होगी। मध्यप्रदेश की राजनीति में सिंधिया का बहुत बड़ा कद है। सिंधिया के जाने से प्रदेश में कांग्रेस का भविष्य ही खत्म हो गया है, क्योंकि सिंधिया की वजह से कांग्रेस का भविष्य सुरक्षित होता पर आप बहुत देर हो चुकी है। कांग्रेस में रहकर सिंधिया मान, सम्मान और स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहे थे पर कांग्रेस के मौजूदा प्रादेशिक नेतृत्व के अहंकार के चलते सिंधिया की उपेक्षा होती जा रही थी। पिछले सवा साल से सिंधिया ने अपमान के कई घुट पिए। जिसका ही नतीजा है कि आज उन्होंने इतना बड़ा कदम उठाया। उनके इस कदम से कांग्रेस को सत्ता बचाना भी मुश्किल हो गया है। सिंधिया की अहमियत ने जानकर कांग्रेस नेताओं ने बहुत बड़ी गलती की। सरकार को तो संकट में डाला ही साथ ही कांग्रेस के अस्तित्व को भी खतरे में डाल दिया। हालांकि यह भी नहीं है कि सिंधिया ने कांग्रेस को संभलने का मौका नहीं दिया। ऐसे कई अफसर आए थे जब कांग्रेस चाहती तो उन्हें संभाल सकती थी लेकिन प्रदेश के कद्दावर नेताओं ने सिंधिया को बहुत हल्के में ले लिया। सीएम कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने अपने हितों को साधने के लिए पार्टी की ही तिरांजलि दे दी। इन दोनों नेताओं ने समझा कि प्रदेश में सरकार हमारे द्वारा चल रही है। बड़े ताज्जुब की और हैरान करने वाली बात है कि राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले नेता अनुमान ही नहीं लगा पाए कि सरकार पर इनका बड़ा संकट आने वाला है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने अपने बेटों की खातिर सिंधिया को हमेशा आगे ब़ड़ने से रोका। सिंधिया के कद की कद्र ही नहीं की।
मैं मानती हूं कि कमलनाथ सरकार यदि गिरती है तो यह कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की गलती और अहंकार के कारण हो होगा। जिन्होंने हमेशा अपने हितों को प्राथमिकता में रखा। सरकार के अंदर और सरकार के बाहर क्या हो रहा है, इससे उन्होंने वास्ता ही नहीं रखा। सीएम कमलनाथ में सबसे बड़ी गलती यह की कि इन्होंने सीएम और प्रदेश अध्यक्ष का पद अपने पास रखा। यदि कमलनाथ सीएम बन गए थे तो कम से कम प्रदेश अध्यक्ष का पद सिंधिया को दे देते। यदि ऐसा होता तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती। उसके बाद भी सिंधिया चुपचाप रहे। हद तो तब और हो गई जब राज्यसभा चुनाव में भी उनका पत्ता साफ कर दिया गया। आखिर कब तक सिंधिया अपने आप को सब्र में रख पाते। उनके सब्र का बांध टूट गया और ऐसा फैसला लिया जिससे सरकार और कांग्रेसी नेताओं का अहंकार और महत्वाकांक्षाएं चकनाचूर हो गई। मेरा मानना है कि सिंधिया के जाने से कांग्रेस को बहुत बड़ी क्षति हुई है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी। बीजेपी में शामिल होने के बाद सिंधिया पहली बार भोपाल आए तो क्या भव्य स्वागत हुआ देखते ही बनता था। बीजेपी ने स्वागत में पलक पावड़े बिछा दिए। यह स्वागत कांग्रेस के लिए सबक है। जिस पार्टी ने उनका अपमान किया उसी का दूसरी पार्टी ने ऐसा स्वागत। आज कांग्रेस उनकी अहमियत को एहसास कर रही होगी।
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परिचय

लेखिका भोपाल से हैं और समसामयिक मुद्दों पर तीखी नज़र रखती हैं। आप मप्र की  ख्यातनाम पत्रकार हैं। प्रजातंत्र के चौथे पाये को आपने जिस शिद्दत के साथ संभाले रखा वह आदरणीय है।
संपादक 
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