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तुम मेरे गीतों का पहला अक्षर भी बन सकती थी।


यदि  थोड़ा  सा  प्रेम निभाती |
मुझे   राह  में  छोड़  न जाती |
विरह  रात  में   हाथ  थामती |
मेरे   मन   की   बात  जानती |
मेरे  दिल  को  चीर  दिया था |
यदि थोड़ी सी  कोशिश करती,
दिल का दर्द मिटा दे ऐसा नश्तर भी बन सकती थी |
तुम मेरे गीतों  का पहला  अक्षर भी बन सकती थी |

अब बस  वीराने  लिखता हूँ |
सबको मौन सदा दिखता हूँ |
आगे -  पीछे   बस  यादें   हैं |
घुटी - घुटी  सी  फरियादें  हैं |
सिवा  तुम्हारे  और भीड़ की |
चाह न मुझको कभी रही थी |
तुम तो मेरे तन्हा पथ का लश्कर भी बन सकती थी |
तुम मेरे गीतों  का पहला  अक्षर भी बन सकती थी |

अब पतझड़  प्यारा लगता है |
मैं   सोता  हूँ  मन  जगता  है |
चाँद  अकेला   लगे   रात  में |
हृदय विकल हो बात-बात में |
पतझड़,  सहरा,  बंजर सपने,
मेरे  मन   में   बसे   हुए    हैं |
तुम जीवन में मधुर बसंती मंजर भी बन सकती थी |
तुम मेरे गीतों  का पहला  अक्षर भी बन सकती थी |

अमित हिंदुस्तानी लखीमपुर खीरी 


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