लेखक
यदि थोड़ा सा प्रेम निभाती |
मुझे राह में छोड़ न जाती |
विरह रात में हाथ थामती |
मेरे मन की बात जानती |
मेरे दिल को चीर दिया था |
यदि थोड़ी सी कोशिश करती,
दिल का दर्द मिटा दे ऐसा नश्तर भी बन सकती थी |
तुम मेरे गीतों का पहला अक्षर भी बन सकती थी |
अब बस वीराने लिखता हूँ |
सबको मौन सदा दिखता हूँ |
आगे - पीछे बस यादें हैं |
घुटी - घुटी सी फरियादें हैं |
सिवा तुम्हारे और भीड़ की |
चाह न मुझको कभी रही थी |
तुम तो मेरे तन्हा पथ का लश्कर भी बन सकती थी |
तुम मेरे गीतों का पहला अक्षर भी बन सकती थी |
अब पतझड़ प्यारा लगता है |
मैं सोता हूँ मन जगता है |
चाँद अकेला लगे रात में |
हृदय विकल हो बात-बात में |
पतझड़, सहरा, बंजर सपने,
मेरे मन में बसे हुए हैं |
तुम जीवन में मधुर बसंती मंजर भी बन सकती थी |
तुम मेरे गीतों का पहला अक्षर भी बन सकती थी |
तुम मेरे गीतों का पहला अक्षर भी बन सकती थी।
यदि थोड़ा सा प्रेम निभाती |
मुझे राह में छोड़ न जाती |
विरह रात में हाथ थामती |
मेरे मन की बात जानती |
मेरे दिल को चीर दिया था |
यदि थोड़ी सी कोशिश करती,
दिल का दर्द मिटा दे ऐसा नश्तर भी बन सकती थी |
तुम मेरे गीतों का पहला अक्षर भी बन सकती थी |
अब बस वीराने लिखता हूँ |
सबको मौन सदा दिखता हूँ |
आगे - पीछे बस यादें हैं |
घुटी - घुटी सी फरियादें हैं |
सिवा तुम्हारे और भीड़ की |
चाह न मुझको कभी रही थी |
तुम तो मेरे तन्हा पथ का लश्कर भी बन सकती थी |
तुम मेरे गीतों का पहला अक्षर भी बन सकती थी |
अब पतझड़ प्यारा लगता है |
मैं सोता हूँ मन जगता है |
चाँद अकेला लगे रात में |
हृदय विकल हो बात-बात में |
पतझड़, सहरा, बंजर सपने,
मेरे मन में बसे हुए हैं |
तुम जीवन में मधुर बसंती मंजर भी बन सकती थी |
तुम मेरे गीतों का पहला अक्षर भी बन सकती थी |


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