गायिका
आज आपके लिए आग्रह, अनुरोध और मनुहार से भरे पूरे गीत को लेकर आए हैं। गीत में ऐसी मनुहार गाई गई है कि..... पत्थर भी पसीज कर पानी पानी हो जाए..। ये मनुहार है किसी अपने के लिए.... या जो अपना हो जाने के बाद परायों सा व्यवहार कर रहा है.... अथवा वो अपना जो रूठ गया है... उसको मनाने को कवायद का यह गीत है। इस दृश्य की कल्पना करते हुए गीतकार ने अपने मन में आए विचारों को... शब्द देकर... और उन शब्दों को गूँथ कर जो गीत तैयार होकर.... 1968 की फिल्म किस्मत में फिल्माया गया था.. उस गीत को लिखा था नूर देवासी जी ने.... गीत का हर शब्द जैसे किसी अपने के रूठ जाने पर उसको उलाहना देते हुए मनाने की कोशिश है....। जैसे सितारों में ले जाने का वादा है... तो उन बहारों का सपना भी दिखाया जा रहा है जिसे देख कर दिल झूम जाए....। गजब तो यह है कि इस प्यार भरी मनुहार के साथ.... शिकायत भी की जा रही है कि हमख्याल हो, हमराज हो.... मगर हमनजर भी बनो.... जिंदगी का सफर तय हो जाए ऐसे हमसफर भी बनो....। ऐसी प्यार भरी शिकायत सुनकर तो मुँह से वाह ही निकलेगा न....। फिर आती है मनुहार की वह पंक्तियाँ... चाहत के उजले उजले... नजारों में ले चलूँ....। गौर करें तब लगता है कि अगर जीवन में चाहत है तो उजियारा है....। मजे की बात यह है कि इस गीत को संगीत मे पिरोया था उस शख्स ने जिसने बहुत ज्यादा पढ़ाई लिखाई नहीं की... और तो और... संगीत की कोई तालीम भी नहीं ली....। ये महाशय मायानगरी मुंबई में आए थे हीरो बनने... लेकिन बना दिए गायक... लेकिन रास आना था संगीत.....तो इस लाइन में ऐसे उतरे , ऐसे उतरे कि.... अपने जमाने के सबसे ज्यादा महंगे संगीतकार बन गए....। अभी तक आप इन महोदय को पहचान नहीं पाए ... अजी हम बात कर रहे हैं... ओमकार प्रसाद नैयर की... जी हां जिन्हें दुनियाँ ओ पी नैयर के नाम से जानती है....। वही ओ पी नैयर... जिनके संगीत में घोड़ो की टॉपों जैसा संगीत भी बजा करता है....। जिद्दी गजब के थे... एक बार एक सह नायिका पर गाना गवाना था... नैयर जी की चाह थी लता मंगेशकर इस गाने को गाएं... लेकिन लता जी ने इसके लिए इंकार कर दिया... यह बात नैयर साहब को इतनी नागवार गुजरी कि पूरे फिल्मी संगीतकार जीवन में इन्होंने कभी भी लता मंगेशकर से कोई भी गाना नहीं गवाया....। बात प्रस्तुत गीत की... जिसे गाया है... आशा भोसले ने... अपनी शोख़ और नशीली संगीतमय आवाज में... गीत के बीच बीच में जब हिच्च......निकाली गई है न....सुनकर देखिये.....लगता है कलेजा मुँह को आ गया हो....साथी को मनाते मनाते.....। विश्वजीत और बबीता अभिनीत इस फिल्म में यह गाना बबीता... करिश्मा और करीना कपूर की मम्मी.... पर फिल्माया गया है...। कहानी की मांग के हिसाब से निर्देशक मनमोहन देसाई ने भले ही गीत के फिल्मांकन के लिए सुर, सुरा, सुंदरी की सजाई गई महफ़िल पर गाना फिल्माया हो.....लेकिन फिल्मांकन की पृष्ठ भूमि हटाकर... अगर इस गीत को सुना जाए... तो मन वाकई में बहारों में झूम जाता है...। दिल की किताब पर अनुरोध की वह दास्ताँ यह गीत लिख देता है कि बाँहों में बाँहें डाल कर... हजारों में चलने को मन डोल उठता है।
इस गाने को आशा जी के शोख़ और चुल्बुले से युक्त नशीले संगीत के अंदाज में हमारे लिए लेकर आई हैं... शिरोनी पालीवाल... पेशे से चार्टर्ड एकांटेंट हैं... लेकिन गाना सुनकर आपको सितारों की सैर... जैसा अहसास कराने में इनकी आवाज काफी है... तो अब देर नहीं... आइये लीजिए मजा.... आशा जी, ओपी नैयर, नूर देवासी, की त्रेवेणी... के गीत का...।
शैलेश तिवारी
-------------


Post A Comment: