अब सियासी शतरंज के मोहरे बनेंगे अफसर
अफसरों को नहीं राजनीति से लेना-देना,
कहीं प्रशासनिक सर्जरी से इन्फेक्शन ना हो जाये नई सरकार को
आखिर सवाल उठता है कि अफसर किस पार्टी के है, किस पार्टी के लिए काम करते हैं, यह ठप्पा किसने लगाया है। अफसर तो शासन के निर्देशों का पालन कर आमजन के लिए काम करते हैं। सत्ता किसी भी पार्टी की रही, इस बात से उन्हें क्याे लेना-देना होता है। सियासी शतरंज में इन्हें मोहरे बनाने का क्या महत्व है। पार्टियां तो सत्ता को चमकाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते है। शासकीय योजनाओं का लोगों को लाभ प्राप्त हो, इसमें महत्व पूर्ण जिम्मेदारी तो अफसरों की होती है। इन्हें पार्टी विशेष से जोड़कर इनकी काबिलियत और हैसियत का मजाक नही उडाना चाहिए। आने वाली सरकार कही कांग्रेस वाली गलती ना कर दे। कांग्रेस सरकार ने पुरा समय सिर्फ ट्रांसफर-पोस्टिंग पर ही ध्यान रखा 27500 से ज्यादा ट्रांसफर-पोस्टिंग हुई उक्त प्रशासनिक पद में विराजमान प्रमुख सचिव, सचिव, कलेक्ट्ररों, डी.जी.पी. और एडीआईजी 4 डीजी स्तर के अधिकारियों को जमनेे ही नही दिया जब तक काम शुरू होने लगते है तो नया ट्रांसफर आदेश आ जाता कांग्रेस ने प्रदेश के बड़े नेता जो कि संकटमोचक रहे है उन्होंने तो सार्वजनिक तौर पर यह कह दिया कि मुझे तो वह अफसर पंसद है जो मैं रात बोलु तो रात बोले।
पार्टी का ठप्पा लगाकर अफसरों का मनोबल तोड़ने की इस गलत परंपरा का अंत होना चाहिए। जनसेवा और मानवसेवा में कार्यरत अधिकारियों को अपनी-अपनी जगह पर कार्य करने की छूट देनी चाहिए और प्रदेश के विकास में काम करते रहने देना चाहिए। सरकारों को अपने हित के अलावा लोगों के कल्याण के बारे में सोचना चाहिए। जब एक उच्च अधिकारी का ट्रांसफर होता है तो कितने कार्य प्रभावित होते है। अधीनस्थ अधिकारियों में माहौल बदलता है। शासन को आर्थिक हानि भी होती है। हम देख रहे हैं कि पिछले कुछ दिनों से प्रदेश में कार्यवाहक सरकार कार्यरत है। मतलब प्रदेश को चलाने का पूरा जिम्मा अधिकारियों के जिम्मे हैं। फिर भी सभी कार्य बखूबी हो रहे है। कही भी किसी तरह की भेदभाव की स्थिति निर्मित नही हो रही है। फिर अधिकारियों पर भेदभाव पूर्ण कार्य करने का आरोप क्यों लगता है। यह नेताओं की ओछी मानसिकता का नमूना भर है। जो इन पर आरोप लगाकर अपने पद और पॉवर का गलत इस्तेमाल करते है। बेहतर होगा कि मुख्य सचिव से लेकर तहसील स्तर के अधिकारियों/कर्मचारियों को यथास्थान पर रहने देना चाहिए। और उनके अनुभव योग्यता का उपयोग करने की छूट देनी चाहिए यही सरकार के हित में है। और प्रदेश वासियों के हित में है। इस कठिन समय जहां डब्ल्यू.एच.ओ. और यूनाईटेड नेशन ने भारत को जून तक कोरोना के रेड अर्लट पर रखा है। युद्ध जैसे हालात में प्रशासनिक सर्जरी कहीं प्रदेश के लिए घातक न हो जाए। जो जहां है उन्हें ना छेड़ा जाए। इन कठिन हालात में विगत दिनों में जो काम मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेश, अपर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव, सचिव, कलेक्टर समस्त अधिकारियों कर्मचारी के लिए जगत विज़न परिवार खड़े होकर ताली बजाता है और दिल से धन्यवाद देता है।
अफसरों को नहीं राजनीति से लेना-देना,
कहीं प्रशासनिक सर्जरी से इन्फेक्शन ना हो जाये नई सरकार को
विजया पाठक
मध्यप्रदेश में सत्ता का परिवर्तन होने वाला है। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार, इस्तीफा दे चुकी है तो अब बीजेपी की सरकार बनेगी। सरकार के बनते ही सबसे पहला परिवर्तन होगा प्रशासनिक सर्जरी के रूप में। आईएएस, आईपीएस अफसरों के साथ-साथ प्रादेशिक स्तर के अधिकारियों को इधर-ऊधर किया जाऐगा। इस परंपरा को हम दशकों से देखते आ रहे है। सरकार के पदभार ग्रहण के बाद परंपरा का आगाज हो जाता है। सत्तासीन सरकार अधिकारियों को चुन-चुनकर ऐसे इधर-ऊधर करती है जैसे इन अधिकारियों ने पिछले कार्यकाल में बहुत सारे गुनाह किए हैं। अभी सुनने में आ रहा है कि बीजेपी की सरकार बनते ही नवनियुक्त मुख्य् सचिव एम.गोपाल रेड्डी और प्रदेश के डीजीपी विवेक जौहरी का हटना तय है। यह तो होना ही है क्योंकि हम देखते आ रहे है कि मुख्यमंत्री मुख्य सचिव जैसे पद पर अपने पसंद के अधिकारियों को रखना चाहता हैं। इसके साथ ही मंत्री, विधायक और सत्तासीन पार्टी के स्थानीय नेता कलेक्टरो से लेकर तहसील स्तर के अधिकारियों, कर्मचारियों को पदस्थान करवाते है।आखिर सवाल उठता है कि अफसर किस पार्टी के है, किस पार्टी के लिए काम करते हैं, यह ठप्पा किसने लगाया है। अफसर तो शासन के निर्देशों का पालन कर आमजन के लिए काम करते हैं। सत्ता किसी भी पार्टी की रही, इस बात से उन्हें क्याे लेना-देना होता है। सियासी शतरंज में इन्हें मोहरे बनाने का क्या महत्व है। पार्टियां तो सत्ता को चमकाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते है। शासकीय योजनाओं का लोगों को लाभ प्राप्त हो, इसमें महत्व पूर्ण जिम्मेदारी तो अफसरों की होती है। इन्हें पार्टी विशेष से जोड़कर इनकी काबिलियत और हैसियत का मजाक नही उडाना चाहिए। आने वाली सरकार कही कांग्रेस वाली गलती ना कर दे। कांग्रेस सरकार ने पुरा समय सिर्फ ट्रांसफर-पोस्टिंग पर ही ध्यान रखा 27500 से ज्यादा ट्रांसफर-पोस्टिंग हुई उक्त प्रशासनिक पद में विराजमान प्रमुख सचिव, सचिव, कलेक्ट्ररों, डी.जी.पी. और एडीआईजी 4 डीजी स्तर के अधिकारियों को जमनेे ही नही दिया जब तक काम शुरू होने लगते है तो नया ट्रांसफर आदेश आ जाता कांग्रेस ने प्रदेश के बड़े नेता जो कि संकटमोचक रहे है उन्होंने तो सार्वजनिक तौर पर यह कह दिया कि मुझे तो वह अफसर पंसद है जो मैं रात बोलु तो रात बोले।
पार्टी का ठप्पा लगाकर अफसरों का मनोबल तोड़ने की इस गलत परंपरा का अंत होना चाहिए। जनसेवा और मानवसेवा में कार्यरत अधिकारियों को अपनी-अपनी जगह पर कार्य करने की छूट देनी चाहिए और प्रदेश के विकास में काम करते रहने देना चाहिए। सरकारों को अपने हित के अलावा लोगों के कल्याण के बारे में सोचना चाहिए। जब एक उच्च अधिकारी का ट्रांसफर होता है तो कितने कार्य प्रभावित होते है। अधीनस्थ अधिकारियों में माहौल बदलता है। शासन को आर्थिक हानि भी होती है। हम देख रहे हैं कि पिछले कुछ दिनों से प्रदेश में कार्यवाहक सरकार कार्यरत है। मतलब प्रदेश को चलाने का पूरा जिम्मा अधिकारियों के जिम्मे हैं। फिर भी सभी कार्य बखूबी हो रहे है। कही भी किसी तरह की भेदभाव की स्थिति निर्मित नही हो रही है। फिर अधिकारियों पर भेदभाव पूर्ण कार्य करने का आरोप क्यों लगता है। यह नेताओं की ओछी मानसिकता का नमूना भर है। जो इन पर आरोप लगाकर अपने पद और पॉवर का गलत इस्तेमाल करते है। बेहतर होगा कि मुख्य सचिव से लेकर तहसील स्तर के अधिकारियों/कर्मचारियों को यथास्थान पर रहने देना चाहिए। और उनके अनुभव योग्यता का उपयोग करने की छूट देनी चाहिए यही सरकार के हित में है। और प्रदेश वासियों के हित में है। इस कठिन समय जहां डब्ल्यू.एच.ओ. और यूनाईटेड नेशन ने भारत को जून तक कोरोना के रेड अर्लट पर रखा है। युद्ध जैसे हालात में प्रशासनिक सर्जरी कहीं प्रदेश के लिए घातक न हो जाए। जो जहां है उन्हें ना छेड़ा जाए। इन कठिन हालात में विगत दिनों में जो काम मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेश, अपर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव, सचिव, कलेक्टर समस्त अधिकारियों कर्मचारी के लिए जगत विज़न परिवार खड़े होकर ताली बजाता है और दिल से धन्यवाद देता है।


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