आने वाली पीढ़ियों के लिए... उदाहरण बनने का समय
हम मौत से डरकर घर नहीं बैठे हैं...
--------------कोरोना जीव वैश्विक महामारी घोषित है। हमारे देश में भी इसने पांव पसारना शुरू कर दिया है। स्थिति भयावह न हो जाए, इसके लिये हमारी तैयारी भी जरूरी है। मार्च का महीना अमूमन परीक्षाओं के दौर के लिए जाना जाता है। आज पूरे देश और उसके हर नागरिक के सामने इम्तिहान की घडी है।
परीक्षा की घडी में गंभीरता , सतर्कता, सावधानी, सजगता और लक्ष्य पर निगाह टिकाए रखना जरूरी है। अन्यथा परीक्षा परिणाम बिगड़ने का खतरा मंडराता रहता है। वैसा ही खतरा हम पर मंडराने लगा है, हम गंभीर होने के बजाए सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर मसखरी में व्यस्त हैं। छींटाकशी में मशगूल हैं। इसको बंद होना चाहिए, राष्ट्र जब संकट मे हो तो मजाकिया स्टाइल और पति-पत्नी को लेकर बेहूदा लतीफे दिमागी दीवालिएपन की निशानी मानी जा सकती है।
मजाक करना बुरा नहीं मगर मजाउड़ाते रहना बुरा है । अपने निकटस्थ दोस्तों के साथ हर तरीके के विचार साझा किए जा सकते हैं इसमे कोई हर्ज नहीं लेकिन सार्वजनिक रुप से अपनी मजाको को शेयर करना कहां तक उचित है।
घर मे रहकर फ्री समय मे अच्छी पुस्तकें ,धार्मिक ग्रंथ पढ़े जा सकते हैं और खासबात की बुजुर्गों के साथ समय गुजारकर उनके अनुभवों का लाभ भी लिया जा सकता है वहीं एक फायदा यह भी होगा कि बुजुर्गों का अकेलापन भी समाप्त होगा। बच्चों के साथ बैठकर उनके साथ गेम खेलना और उनके टीचर बन जाना सोने पर सुहागा साबित हो जाएगा।
"कोरोना" को शुरुआत मे गंभीरतापूर्वक नहीं लिया जाना हमारी लापरवाही और मजाक दोनों को ही उजागर करता है। उस समय गंभीर हो जाते तो शायद यह नौबत नहीं आती। लॉक डाउन में काफी कोशिश के बावजूद लोग घरों मे तो दुबके लेकिन घरों से ही व्यवस्था का मजाक उड़ा रहे हैं।
याद करें हम लड़े हैं आजादी के लिए जंगें-लड़ाईयां लेकिन उस समय जंग जीतने देश का बच्चा-बच्चा घर से निकला था। तब दुश्मन सामने था, लड़ाई आसान थी। जंग तब भी लड़ी,जंग अब भी लड़ रहे हैं लेकिन अब घर मे दुबककर। हम कोई साधारण लड़ाई नहीं लड़ रहे। घर मे दुबकने का अर्थ कदापि यह नहीं है कि हम दब्बू है, वरन यह हमारी वीरता है जिसे सबसे बड़ी निशानी के रुप मे सदियों तक जाना जाएगा क्योंकि सहनशीलता और अनुशासन भी वीरों के आभूषण और निशानी है। अवसर आया फिर एक बार फिर हमे विश्व के नक्शे मे ताकतवर राष्ट्र के रुप मे उभरने का, आज महामारी से लड़ इसीलिए रहे हैं कि हम बताना चाह रहे हैं समूचे विश्व को कि, आखिर भारत वर्ष है क्या। हम मौत से डरकर घर नहीं बैठे हैं बल्कि राष्ट्र की शक्ति बड़ाने और कोरोना जैसे विदेशी "वायरसों" को हराने का संकल्प लिए बैठे हैं।
कुछ ही समय मे सबकुछ जवाब विश्व को मिल जाएगा कि आखिर इंडिया ,भारत, हिंदुस्तान है क्या......इस जंग को जीतने के पश्चात विश्व के दादाओं को खुद-ब-खुद हमसे आंख मिलाने मे दस बार सोचना होगा।
फिर लिखने मे आ रहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पिछले कुछ दिनों से वीडियो,आडियो,फोटोग्राफ और मजाकिया स्टाइल के कार्टून डालकर जो नासमझी का परिचय दिया जा रहा वह थमना चाहिए। देश के हर व्यक्ति को राष्ट्रहित मे अपना दायित्व समझना चाहिए। हमारी आर्मी ही देश रक्षक नहीं ,हम भी राष्ट्रभक्त हैं और राष्ट्र की रक्षा लिए जरुरत पड़ी तो दो जून की रोटी,महत्वाकांक्षा ,स्वार्थ,लाभ-हानि को छोड़कर हमे हालातों से जूझने का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
फेसबुकियाओं और वाट्सअपियाओं को मजाक और ज्ञान परोसना बंद करना होगा। खुद को कोरोनावाहक बनने से रोकना होगा। कितनी अबौद्धिक बात है कि हम हर समस्या का हल राजनितिज्ञ और सरकार से चाहते हैं जबकि राजनितिज्ञ केवल समस्याएं उत्पन्न करना चाहता है और गलियारों से लेकर एक्सप्रेस हाईवे तक अपनी रोटी सेंकना चाहता है। हम क्यों न समझने कि उन्होंने राजनीति ने लोक कल्याण के नाम पर हमारा आत्मबल,हमारा आत्म विश्वास,और यहां तक कि हमारी अपने प्रति जिम्मेदारी की भावना भी छीन ली , लेकिन आज वक्त आया है कि हम राजनीति से परे होकर "देश भक्ति " के जज्बे को संसार के सामने उस अंदाज मे प्रस्तुत करें कि जिसके बाद कई दशकों तक संसार की माताएँ बच्चों को हमारे उदाहरण देकर मार्गदर्शन करती रहें।


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