लेखिका 


"अख़बार....."


अख़बार
सुर्खियों में नहीं है
फिर भी नज़रों में है,
मौन है
फिर भी बड़बोला है,
श्वेत श्याम सा
पर खबरों में रंगीन है,
समाज को उघेड़ता
सियासत हेतु बिकता व खरीदा जाता,
यदि मानसिक उत्पीड़न देता
तो एकांतवास का सहारा भी बन जाता है
क्योंकि अख़बार नीरवता को दूर करता है।

हर घर में
सुबह की चाय के साथ
पढ़ा जाने वाला
दोपहर बाद रद्दी के लिए
सहेजा जाने वाला,
एकमात्र ऐसा कागज़ है
जो अनेक तरह से 
प्रयोग किया जाता है,
ज्ञान से लेकर
कमाई का ज़रिया भी बनता है,
चटपटी खबरों से लेकर
मौसम की जानकारी देता
खेल-कूद से लेकर राजनीति तक
धर्म से लेकर समाज तक
दुनिया की सैर करा देता है,
गरीब की थाली से लेकर
जूठन और गंदगी भी समेटता,
कभी पुस्तक पर जिल्द सा सजता
कभी चने मुरमुरे का स्वाद दे जाता है,
धूल भरी मुंडेर पर बिछा
बना देता साफ़-सुथरी जगह
और हो यदि हालत गर्मी से बेहाल
तू बन जाता हाथ का पंखा है।

मिल जाता तो कद्र नहीं
न मिलता तो इंतज़ार में 
बेताबी से टहलते 
राह तकते लोग,
कभी छज्जों पर फेंका जाता
कभी हवा में उछाला जाता
कभी दरवाज़े पर पड़ा
सिसकता रहता,
ज़िन्दगी के सफ़र में
हमराह बन
सच्चा औ' पक्का साथी
हमारा प्यारा, दुलारा अख़बार।


 नीरजा मेहता 'कमलिनी'

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परिचय

नीरजा मेहता कमलिनी... गाजियाबाद की निवासी हैं। उच्च शिक्षित सेवा निवृत संस्कृत की व्याख्याता हैं। काव्य मंजरी समूह की संस्थापिका हैं। एमपी मीडिया पॉइंट के लिए अपनी रचनाओं को प्रेषित करती आ रही हैं। बहुत बहुत आभार...।
संपादक
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