शैलेश तिवारी
देश के साथ साथ प्रदेश सरकार ने भी कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए सभी शिक्षण संस्थाओं को आगामी आदेश तक के लिए बंद कर दिया गया है। वहीं बाबा गरीबनाथ के समाधि स्थल पर उनके आश्रित भक्तों की भारी भीड़ ने कोरोना वायरस से बेखौफ कर रखा है।
जब हमारी कार ने आष्टा- शुजालपुर मार्ग पर चलने के बाद बाएँ हाथ पर अवंतीपुर बड़ौदिया जाने के लिए मुड़ी.... तब खेतों में कटती गेहूं की फसल ...पलाश के दहकते लाल फूलों की छटा ... पीले पीले संतरों के लुभावने बाग.. तो आम के पेड़ बोरों से लदे ..... बसंतोत्सव के समापन की सूचना दे रहे थे....। अवंतीपुर में प्रवेश करने के साथ ही अहसास होने लगा कि... बाबा गरीबनाथ की तपोस्थली की रज रज में आज भी भक्ति, आस्था, श्रद्धा की त्रेवेणी गतिमान है..। दुकानों के आगे लगे शामियाने यह बताने के लिए काफी थे कि मेले की शुरुआत हो चुकी है। काफी दूर कार पार्क करने के बाद पैदल चलकर पहुंचना था बाबा के समाधि स्थल तक। गाँव के कुछ मकान अपनी प्राचीन विरासत को संभाले हुए अपनी वृद्धावस्था की वजह से हांफ रहे थे..। तो कुछ आशियाने अपने जीर्णोद्धार के बाद की नवीनता पर इठला रहे थे...। कमाल इस बात का ज्यादा दिख रहा था कि हर घर में चहल पहल नजर आ रही थी। कारण साथी अरुण व्यास जी ने स्पष्ट किया.. भैया आज गाँव के हर घर में मेहमान आये हुए हैं..। यह जानकर कुछ आश्चर्य हुआ तो भी एक संतोष उभरा कि... भाग दौड़ भरी जिंदगी में रिश्तों को जी भर कर जिया जा रहा है...।
आगे बढे तो गाँव के लोग जिस आत्मीयता के साथ अभिवादन कर रहे थे... वो हम लोगों को अविभूत कर रहा था... गाँव में ज्वेलर्स की इतनी दुकानें देख कर अचरज भी हुआ... मालूम हुआ यह तो पीढीयों से चल रही दुकाने हैं...। उन्हीं सड़क नुमा गलियों के फुटपाथ पर नारियल, पान और खडा नमक बेचा जा रहा था...। दुकान वालों के आग्रहभरी आवाजों के बीच यह जानकारी भी मिली कि... यही सामान समाधि पर चढ़ाया जाता है..। बताया गया कि विक्रम संवत 1246 में बाबा गरीबनाथ अपने गुरु श्री श्री 108 हरि गिरी दास जी से दीक्षा लेने के बाद भ्रमण करते हुए यहाँ पहुंचे.... नेवज नदी की लहरों ने उन्हें इतना मुग्ध कर लिया कि उन्होंने अपना धूना यहीं लगा लिया.... अपनी आराध्य देवी माँ अन्नपूर्णा की साधना करते रहे....। संवत 1342 में उन्होंने जीवित समाधि ले ली। संवत 1343 में जब तीर्थ यात्रियों का दल गंगा घाट पर पहुंचा, वहाँ बाबा ने उन्हें दर्शन दिए और आग्रह किया कि नौ नौ हाथ की नौ लकड़ियों के नौ पाट का निशान समाधि स्थल पर हर साल रंग पंचमी को चढ़ाओ तो आपके गाँव की रक्षा करता रहूँगा। आज जब हम संवत 2076 की रंग पंचमी को समाधि स्थल पहुंचे, तब एक बड़ा सा गड्ढा कर उनके निशान को उतारा जा चुका था। दो पाट बदले जा रहे थे। पूरे गांव के लोग अपने अपने जिम्मे के काम को अंजाम दे रहे थे। श्रद्धा और आस्था से लबरेज भक्त उनकी समाधि पर पान, नारियल और खड़ा नमक जयघोष के साथ चढ़ा रहे थे। भारी भीड़ के बीच हमने भी इस प्रक्रिया को पूरा किया। मंदिर के अंदर माँ अन्नपूर्णा के दर्शन को पहुंचे तो वहाँ निशान के ऊपर लगाए जाने वाले शिखर की तैयारियां कुछ बुजुर्ग हाथ सधे सधाये अंदाज में कर रहे थे। तीन नेपाली शैली जैसी गुंबद बांस की पिन्चियों से तैयार की जा रही थी। बताया गया उनके ऊपर लाल, सफेद और नीले रंग के कपडे लपेट कर उन्हें सजाया जाएगा। उसके ऊपर मोर पंख बाँधेंगे और सबसे ऊपर एक सोने की कलगी लगाई जाएगी। उनकी तैयारियों को देखते हुए हम उस भीड़ का हिस्सा बन गए जहाँ माँ के दर्शन की लाइन लगी थी। बाबा की आराध्या तो पिंडी स्वरूप में हैं जो नीचे की तरफ विराजित हैं। ऊपर संगमरमर की श्रंगारित मूर्ति प्रतिष्ठित की गई है। परिक्रमा के बाद हैं निकले नेवज नदी की तरफ... जिसकी धारा लुप्त हो जाने के बाद खाली पड़े रेतीले मैदान में मेला लगा था...। अब बच्चों के खेल खिलौने की दुकाने बाल मन को आकर्षित कर रही थी तो आइस क्रीम के ठेले पर युवाओं का जमावड़ा था। आगे बड़े तो हंसिया, खुरपी, हथौड़ा, कुल्हाड़ी, ताला आदि की दुकान भी करीने से लगी थी। ताजी बनती जलेबियों की खुशबू फैल रही थी तो समोसो के घान पर घान उतर रहे थे। भेल पूरी के खोमचों से चटनी की सुगंध वातावरण में तैर रही थी....। कुछ खाने पीने में मेले का मजा ले रहे थे। आगे हरियाणा से आई डांस पार्टियों के पंडाल में प्रवेश के टिकट पाने को युवाओं की लंबी लाइन.....। अंदर से आधुनिक गीत संगीत की आती आवाज.... शो की लोकप्रियता बता रही थी... वहीं जादूगर के पंडाल में लोग... दांतों तले ऊँगली दबाने को विवश हो रहे थे...। वहीं मुलाकात हुई शुजालपुर से आए किन्नर छाया बाई और उनके साथियों से... जो दुकान दर दुकान जाकर अपनी बख्शीश उगा रहे थे....। आगे झूलों ने मैदान के बड़े हिस्से पर कब्जा जमा रख था... बच्चों के झूले से लेकर आसमान को छूते गगनचुंबी झूलों में बैठने के लिए भी काफी लंबी लाइन लगी हुई थी...। और मौत के कुंए का करतब देखने वाले युवक युवतियां अपने मुँह से किलकारी निकाल कर... उसके रोमांच का पूरा मजा... बाहर वालों को दे रहे थे। घडी पर नजर गई तब लगा निशान चढ़ाने का समय नजदीक आता जा रहा है...। हमारे कदम वापस बाबा के मंदिर की तरफ मुड़ गए....। भीड़ में से अपना रास्ता मुश्किलों के साथ बनाते हुए....मंदिर के करीब आये तो आयोजक सदस्यों ने हमें मंदिर की छत पर पहुंचा दिया। वहाँ से भीड़ का अद्भुत नजारा दिखा.... आस्था, श्रद्धा और विश्वास की त्रेवेणी पर भक्त हिलोर ले ले कर.... बाबा गरीबनाथ की जयघोष कर रहे थे... तो कार्यकर्ता अपने अपने काम वाले पॉइंट पर... मुस्तैदी से तैनात थे...। उद्घोषक अपनी अपीलीय आवाज में जनता जनार्दन को संयम बरतने की सलाह देते हुए... बाबा के गुणगान करते हुए... काम करने वालों की हौसला हफजाइ करने के लिए... जयकारों का टॉनिक दे रहे थे...। आ पहुंचा... वह समय.. जिसका हमें था... इंतजार...। बाबा की आरती होने के साथ ही... भक्तों के हाथ के मोबाइल की टार्च... जुगनुओं सी जगमगा उठी... और एक बार फिर जयकारा हुआ... बाबा का.. विशालकाय निशान का ऊपर उठना शुरू हुआ..। चारों तरफ से मोटे रस्सों से ऊपर खिंचते निशान को.... नीचे से टेकियों के सहारे... धीरे धीरे ऊपर उठाया जा रहा था... जयकारों की आवाजें चारों तरफ से आ रही थी....। नीचे मैदान में तिल भर जगह नही थी... तो आसपास की घरों की छतें भी जनसमुदाय से अटी पड़ी थी...। कुछ मिनटों की मेहनत... और जयघोष के साथ.. निशान.. खडा हो गया... लहराने लगे उस पर लगे मोर पंख.... और बांधे जाने लगे... चौतरफा के रस्सों को... बड़े बड़े खूंटों से...। आसमान गूँज उठा... जय... बाबा... गरीबनाथ... के नारों से...। उतर आये हैं छत से... बोलते हुए... जय बाबा की... आँखों में समा चुका था... अवंतीपुर बड़ौदिया का... वह अद्भुत मंजर... जो कभी नहीं भूलने वाला था...। जीत गई थी हजारों की आस्था.... हार गया था कोरोना...।
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