डाकु मुख्तार सिंह का नाम सुना!! नहीं सुना तो फिर क्या सुना___डाकु मुख्तार सिंह वह आदमी है जो सड़कों से निकल जाता है तो कर्फ्यू लग जाता है......
(कल रविवार को निकलेगा)
फिल्म "कालिया" के अमिताभ का यह काल्पनिक डायलॉग चरितार्थ हो रहा। "कोरोना" के रुप मे,
मोदी जी के "जनता कर्फ्यू" की अपील को व्यापक समर्थन मिल रहा है। रविवार को , क्योंकि यह अपील आत्मरक्षार्थ भी है। बात यह है कि "मरता क्या नहीं करता"। सड़कों पर पसरे सन्नाटे को राजनीतिक दृष्टिकोण से न देखा जाए और ना ही सामाजिक या सांप्रदायिक दृष्टिकोण से। "जनता कर्फ्यू" की अपील सौ फीसदी सही है ।और लोगों ने उसे स्वीकारा भी, लेकिन केंद्र सरकार का अब लोगों के लिए क्या दायित्व बनता है वह भी इंतज़ार का विषय बनता जा रहा है। कुछ राहत भरी घोषणाएँ होना चाहिए। क्योंकि रोज कमाकर रोज खाने वाले परिवारों की संख्या इस देश मे कम नहीं है। फरमानों के आगे अरमानों का ध्यान जरुरी होता है।
सवाल यह उठता है कि जनता तो आपकी अपील को ऐसे स्वीकार कर रही जैसे शरीर मे देवता आने के बाद उपस्थित लोग करते हैं। "पड़ियार बा" की पूरी बात को "मन" से मान लेते हैं। लेकिन "बा साहब" का भी कहीं कर्तव्य बनता है कि भभूत का भी कोई नतीजा अनुयायियों के फायदे मे जाए।
मसलन पूरा देश कल आर्थिक रुप से "कर्फ्यूग्रस्त" हो जाएगा। जनता नुकसान सहन कर जाएगी लेकिन केंद्र सरकार एक दिन के बाद क्या अपने दायित्वों से पल्ला झाड़ लेगी। कहने और पूछने का मतलब यह है कि सरकार ने "कोराना वायरस" से निपटने को लेकर क्या योजना बनाई, क्या इंतजाम किए यह भी तो जनता को बताया जाए! सवा अरब से उपर की आबादी भयभीत है उसमे आपके इंतजाम को लेकर उत्सुकता है। वह जानना चाह रही है कि जमीनी स्तर पर कोरोना वायरस से लड़ने की तैयारी क्या है। एक दिन का "जनता कर्फ्यू" टोटल इलाज तो नहीं है।
मोदी जी क्या आप वाकिफ हैं सरकारी अस्पतालों के स्वास्थ्य से, इस देश के सरकारी अस्पतालों की हालत यह है कि डाक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के तो ताले ही नहीं खुलते। लेबोरेटरी के उपकरण बच्चों के खिलौने बन गए हैं ऐसे मे महामारी से निपटने के शासकीय इंतजाम उसी तरह के साबित हो सकते हैं जैसे सन् 1962 मे चीन से लड़ाई के दौरान थे।
आम आदमी की औकात नहीं कि वह धंधाखोर प्राइवेट अस्पतालों मे इलाज करालें। अभी तो कोरोना आया है लेकिन "वायरसों" के आने का रोग पुराना है। स्वास्थ्य सेवाएं तंदुरुस्त होनी चाहिए। क्या केरल सरकार की तरह सेनेटाइजर और मास्क का वितरण अन्य सभी प्रांतों मे वितरित किया जाना न्याय संगत नहीं होगा!! जनता कर्फ्यू की अपील के सम्मान मे एक दिन, मगर चौकीदार होने के नाते 363 दिन आपको जनता के सम्मान (रक्षार्थ) मे होना चाहिए। केरल प्रांत की तरह क्या सेनेटाइजर और मास्क की सुविधा संपूर्ण प्रांतों को नहीं मिलना चाहिए।
वैसे यह जग जाहिर है कि जन्म के साथ ही मृत्यु शुरु हो जाती है और अमर कोई नहीं होता लेकिन पूर्णायु भी तो अपना महत्व रखाती है। इस महत्व को समझना "सरकार" का कर्तव्य बनता है। "कोरोना वायरस" को लेकर एक प्रधानमंत्री का राष्ट्र को संबोधित करना साधारण नहीं है। "जनता" समझदार है पूरे हिसाब को जानती है लेकिन उसकी भी कुछ दरकार है जिसे सुनेगा कौन आपके अलावा। आप जनता को आश्वस्त करें कि आर्थिक और जनहानि के लिए सरकार "उक्त" मार्ग प्रशस्त कर चुकी है।
वरना मिर्ज़ा गालिब ने लिखा था कि
"थी खबर गर्म कि, गा़लिब के उड़ेंगे पुर्जे। देखने हम भी गए थे, पै तमाशा न हुआ।"
(कल रविवार को निकलेगा)
फिल्म "कालिया" के अमिताभ का यह काल्पनिक डायलॉग चरितार्थ हो रहा। "कोरोना" के रुप मे,
मोदी जी के "जनता कर्फ्यू" की अपील को व्यापक समर्थन मिल रहा है। रविवार को , क्योंकि यह अपील आत्मरक्षार्थ भी है। बात यह है कि "मरता क्या नहीं करता"। सड़कों पर पसरे सन्नाटे को राजनीतिक दृष्टिकोण से न देखा जाए और ना ही सामाजिक या सांप्रदायिक दृष्टिकोण से। "जनता कर्फ्यू" की अपील सौ फीसदी सही है ।और लोगों ने उसे स्वीकारा भी, लेकिन केंद्र सरकार का अब लोगों के लिए क्या दायित्व बनता है वह भी इंतज़ार का विषय बनता जा रहा है। कुछ राहत भरी घोषणाएँ होना चाहिए। क्योंकि रोज कमाकर रोज खाने वाले परिवारों की संख्या इस देश मे कम नहीं है। फरमानों के आगे अरमानों का ध्यान जरुरी होता है।
सवाल यह उठता है कि जनता तो आपकी अपील को ऐसे स्वीकार कर रही जैसे शरीर मे देवता आने के बाद उपस्थित लोग करते हैं। "पड़ियार बा" की पूरी बात को "मन" से मान लेते हैं। लेकिन "बा साहब" का भी कहीं कर्तव्य बनता है कि भभूत का भी कोई नतीजा अनुयायियों के फायदे मे जाए।
मसलन पूरा देश कल आर्थिक रुप से "कर्फ्यूग्रस्त" हो जाएगा। जनता नुकसान सहन कर जाएगी लेकिन केंद्र सरकार एक दिन के बाद क्या अपने दायित्वों से पल्ला झाड़ लेगी। कहने और पूछने का मतलब यह है कि सरकार ने "कोराना वायरस" से निपटने को लेकर क्या योजना बनाई, क्या इंतजाम किए यह भी तो जनता को बताया जाए! सवा अरब से उपर की आबादी भयभीत है उसमे आपके इंतजाम को लेकर उत्सुकता है। वह जानना चाह रही है कि जमीनी स्तर पर कोरोना वायरस से लड़ने की तैयारी क्या है। एक दिन का "जनता कर्फ्यू" टोटल इलाज तो नहीं है।
मोदी जी क्या आप वाकिफ हैं सरकारी अस्पतालों के स्वास्थ्य से, इस देश के सरकारी अस्पतालों की हालत यह है कि डाक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के तो ताले ही नहीं खुलते। लेबोरेटरी के उपकरण बच्चों के खिलौने बन गए हैं ऐसे मे महामारी से निपटने के शासकीय इंतजाम उसी तरह के साबित हो सकते हैं जैसे सन् 1962 मे चीन से लड़ाई के दौरान थे।
आम आदमी की औकात नहीं कि वह धंधाखोर प्राइवेट अस्पतालों मे इलाज करालें। अभी तो कोरोना आया है लेकिन "वायरसों" के आने का रोग पुराना है। स्वास्थ्य सेवाएं तंदुरुस्त होनी चाहिए। क्या केरल सरकार की तरह सेनेटाइजर और मास्क का वितरण अन्य सभी प्रांतों मे वितरित किया जाना न्याय संगत नहीं होगा!! जनता कर्फ्यू की अपील के सम्मान मे एक दिन, मगर चौकीदार होने के नाते 363 दिन आपको जनता के सम्मान (रक्षार्थ) मे होना चाहिए। केरल प्रांत की तरह क्या सेनेटाइजर और मास्क की सुविधा संपूर्ण प्रांतों को नहीं मिलना चाहिए।
वैसे यह जग जाहिर है कि जन्म के साथ ही मृत्यु शुरु हो जाती है और अमर कोई नहीं होता लेकिन पूर्णायु भी तो अपना महत्व रखाती है। इस महत्व को समझना "सरकार" का कर्तव्य बनता है। "कोरोना वायरस" को लेकर एक प्रधानमंत्री का राष्ट्र को संबोधित करना साधारण नहीं है। "जनता" समझदार है पूरे हिसाब को जानती है लेकिन उसकी भी कुछ दरकार है जिसे सुनेगा कौन आपके अलावा। आप जनता को आश्वस्त करें कि आर्थिक और जनहानि के लिए सरकार "उक्त" मार्ग प्रशस्त कर चुकी है।
वरना मिर्ज़ा गालिब ने लिखा था कि
"थी खबर गर्म कि, गा़लिब के उड़ेंगे पुर्जे। देखने हम भी गए थे, पै तमाशा न हुआ।"


Post A Comment: