लेखिका
एक बड़े शहर में एक आलीशान मकान था. ऊंची दीवारें, मजबूत छत, खूबसूरत हवादार कमरे और बड़ी बड़ी खिड़कियाँ जहाँ से ताज़ी हवा आया करती थी.
उस मकान में ज़हीन, खूबसूरत और सांस्कृतिक लोग प्रेम से रहा करते थे. पूरे शहर में उस परिवार की धाक थी. दूर दूर से लोग उनका घर देखने और उनके यहाँ अपना ज्ञान बढ़ाने आया करते थे.
धीरे धीरे उस परिवार के लोगों को अपनी काबिलियत और रुतबे पर घमंड होता गया. स्वभाव में आलस और आत्ममुग्धता घर कर गई. उन्होंने अपने घर पर भी ध्यान देना बंद कर दिया। धीरे धीरे घर की हालत बिगड़ती गई. जालों ने जहाँ तहां अपना घर बना लिया, दीवारों से प्लास्टर उखड़ने लगा. पूरे घर में कीड़ों और चूहों का साम्राज्य हो गया. परिवार वाले बीमार पड़ने लगे. परन्तु घरवालों को इसकी कोई चिंता न थी वे अपनी शान में तल्लीन थे.
घर की बिगड़ती हालत देख कुछ सदस्य पलायन कर गए, उन्होंने दूसरा घर तलाश लिया, उसे सुन्दर बना लिया। परन्तु उस पुराने घर के लोगों को उसे सुधारने में कोई रूचि न थी. उन्हें उसी तरह रहने की आदत हो गई थी. आस पास से गुजरते लोग उस आलिशान घर की ऐसी हालत को देखते तो परिवार वालों को बताते, उन्हें उसे सुधारने के लिए समझाते। परन्तु अपनी झूठी शान और अतीत पर इठलाता वह परिवार मानने को तैयार न होता और समझाने वालों को ही जलील कर भगा देता।
धीरे धीरे लोगों ने वहां जाना, कुछ कहना बंद कर दिया और जर्जर होते उस आलिशान मकान की छत भी एक दिन डहडहा कर गिर पड़ी और एक शानदार घर, अपनी अकड़ में असमय ही खँडहर में तब्दील हो गया . जिसका कोई नाम लेवा भी अब न बचा था.
शिखा वार्ष्णेय, लंदन इंग्लैंड
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शिखा वार्ष्णेय, लंदन इंग्लैंड
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एक बारगी... कथानक.. कहीं कहीं भारत वर्ष का भी लगता है... जो विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित था.... उसका अपना एक रुतबा था.. समृद्धि थी... खुशहाली थी.. लेकिन माँ भारती की अपनी ही संतानों... की उपेक्षा का शिकार होती है... आत्म मुग्धता की स्थिति में जीती.. वह संतानें.. अतीत से कुछ सीखती नहीं हैं.... वर्तमान को संवारती भी नहीं है...। प्रतिभाशाली संतानें... पलायन कर.. विदेश में जा बसती हैं... समय माँ भारती के देश रूपी भवन के.. रख रखाव का आग्रह कर रहा है...। बस यहीं तक का कथानक वर्तमान राष्ट्रीय चरित्र से मेल खा रहा है...। असल कथानक में... भवन का देख रेख के अभाव में.. भरभरा कर गिर जाना.. नैतिक मूल्यों का पतन... राष्टृ हित चिंतन का अभाव..... संस्कार हीन शिक्षा का प्रसार.. आदि का द्योतक बना है...।
कथानक की रफ्तार... की सरसता पाठक को बांधे रखती है... गागर में सागर की तरह.. मिथ्या अहंकार... झूठे दंभ... वर्तमान से मुँह मोड़ कर जीना... जैसे हमारे अवगुणों की तरफ अपने पूरे सामर्थ्य से इशारा करता है...। कथानक में.. शब्दों का चयन... हर वर्ग को सहज ग्रहण हो जाने के भाव से किया गया लगता है। जो प्रशंसनीय भी है...। भाषा का प्रवाह भी अपनी सहज और सरल स्थिति में होने से.. पाठक में उत्सुकता भी जगाए रखता है....।
संदेश प्रद और अपने में अनेक भावों को समेटे कथानक के लिए.. लेखिका को बधाई.....।
शैलेश तिवारी
एक अंतहीन दास्ताँ.......
एक बड़े शहर में एक आलीशान मकान था. ऊंची दीवारें, मजबूत छत, खूबसूरत हवादार कमरे और बड़ी बड़ी खिड़कियाँ जहाँ से ताज़ी हवा आया करती थी.
उस मकान में ज़हीन, खूबसूरत और सांस्कृतिक लोग प्रेम से रहा करते थे. पूरे शहर में उस परिवार की धाक थी. दूर दूर से लोग उनका घर देखने और उनके यहाँ अपना ज्ञान बढ़ाने आया करते थे.
धीरे धीरे उस परिवार के लोगों को अपनी काबिलियत और रुतबे पर घमंड होता गया. स्वभाव में आलस और आत्ममुग्धता घर कर गई. उन्होंने अपने घर पर भी ध्यान देना बंद कर दिया। धीरे धीरे घर की हालत बिगड़ती गई. जालों ने जहाँ तहां अपना घर बना लिया, दीवारों से प्लास्टर उखड़ने लगा. पूरे घर में कीड़ों और चूहों का साम्राज्य हो गया. परिवार वाले बीमार पड़ने लगे. परन्तु घरवालों को इसकी कोई चिंता न थी वे अपनी शान में तल्लीन थे.
घर की बिगड़ती हालत देख कुछ सदस्य पलायन कर गए, उन्होंने दूसरा घर तलाश लिया, उसे सुन्दर बना लिया। परन्तु उस पुराने घर के लोगों को उसे सुधारने में कोई रूचि न थी. उन्हें उसी तरह रहने की आदत हो गई थी. आस पास से गुजरते लोग उस आलिशान घर की ऐसी हालत को देखते तो परिवार वालों को बताते, उन्हें उसे सुधारने के लिए समझाते। परन्तु अपनी झूठी शान और अतीत पर इठलाता वह परिवार मानने को तैयार न होता और समझाने वालों को ही जलील कर भगा देता।
धीरे धीरे लोगों ने वहां जाना, कुछ कहना बंद कर दिया और जर्जर होते उस आलिशान मकान की छत भी एक दिन डहडहा कर गिर पड़ी और एक शानदार घर, अपनी अकड़ में असमय ही खँडहर में तब्दील हो गया . जिसका कोई नाम लेवा भी अब न बचा था.
शिखा वार्ष्णेय, लंदन इंग्लैंड
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परिचय
अपने बारे में कुछ कहना कुछ लोगों के लिए बहुत आसान होता है, तो कुछ के लिए बहुत ही मुश्किल और मेरे जैसों के लिए तो नामुमकिन फिर भी अब यहाँ कुछ न कुछ तो लिखना ही पड़ेगा न. तो सुनिए. मैं एक जर्नलिस्ट हूँ मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी से गोल्ड मैडल के साथ टीवी जर्नलिज्म में मास्टर्स करने के बाद कुछ समय एक टीवी चैनल में न्यूज़ प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया, हिंदी भाषा के साथ ही अंग्रेज़ी,और रूसी भाषा पर भी समान अधिकार है परन्तु खास लगाव अपनी मातृभाषा से ही है.अब लन्दन में निवास है और लिखने का जुनून है।शिखा वार्ष्णेय, लंदन इंग्लैंड
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समीक्षा
बोलते पत्थर... वीराना खंडहर... सन्नाटा... आदि कई शीर्षक वाले कथानकों में भी... शीर्ष भूमिका का निर्वाह मानव के जिम्में ही आया है....। दादा माखन लाल चतुर्वेदी ने भी जब.... फूलों की भाषा को समझा... तब पुष्प की अभिलाषा को रचा... लेकिन यहाँ भी नायक की भूमिका निभाने वाला... पुष्प प्रकृति का चैतन्य... अंग है...। लेकिन लेखिका ने.. "एक अंत हीन दास्ताँ".... नामक कथानक में नायक की भूमिका का निर्वाह एक इमारत से कराया है....। जो समय के बदलाव की साक्षी बन जाती है...। अपने गौरव और पतन... दोनो स्थितियों का साक्षी भाव लिए... धराशाई हो जाती है...। उसके नेस्तानाबूत हो जाने में... हालांकि किरदार मानव ही बताए गए हैं... जो जीते हैं.. स्थापित प्रतिष्ठा के झूठे दंभ में... हकीकत से मुँह मोड़ कर....। कुछ तथाकथित जागृत... का पलायन भी होता है..। जो नए स्थान पर... नए भवन का निर्माण... कर सुख की तलाश कर लेते हैं... वगैर अपने अतीत को संवारने का स्मरण किए....।एक बारगी... कथानक.. कहीं कहीं भारत वर्ष का भी लगता है... जो विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित था.... उसका अपना एक रुतबा था.. समृद्धि थी... खुशहाली थी.. लेकिन माँ भारती की अपनी ही संतानों... की उपेक्षा का शिकार होती है... आत्म मुग्धता की स्थिति में जीती.. वह संतानें.. अतीत से कुछ सीखती नहीं हैं.... वर्तमान को संवारती भी नहीं है...। प्रतिभाशाली संतानें... पलायन कर.. विदेश में जा बसती हैं... समय माँ भारती के देश रूपी भवन के.. रख रखाव का आग्रह कर रहा है...। बस यहीं तक का कथानक वर्तमान राष्ट्रीय चरित्र से मेल खा रहा है...। असल कथानक में... भवन का देख रेख के अभाव में.. भरभरा कर गिर जाना.. नैतिक मूल्यों का पतन... राष्टृ हित चिंतन का अभाव..... संस्कार हीन शिक्षा का प्रसार.. आदि का द्योतक बना है...।
कथानक की रफ्तार... की सरसता पाठक को बांधे रखती है... गागर में सागर की तरह.. मिथ्या अहंकार... झूठे दंभ... वर्तमान से मुँह मोड़ कर जीना... जैसे हमारे अवगुणों की तरफ अपने पूरे सामर्थ्य से इशारा करता है...। कथानक में.. शब्दों का चयन... हर वर्ग को सहज ग्रहण हो जाने के भाव से किया गया लगता है। जो प्रशंसनीय भी है...। भाषा का प्रवाह भी अपनी सहज और सरल स्थिति में होने से.. पाठक में उत्सुकता भी जगाए रखता है....।
संदेश प्रद और अपने में अनेक भावों को समेटे कथानक के लिए.. लेखिका को बधाई.....।
शैलेश तिवारी


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