अभी भी मंडरा रहा हैं नक्सली हमले का खतरा,
केंद्र सरकार को भी नक्सलवाद के उन्मूलन की ओर ठोस कदम उठाना होगा,
सचेत रहे छत्तीसगढ़ सरकार
धीरे-धीरे करके देश के अधिकांश राज्यों से नक्सलवाद खत्म होता जा रहा है, लेकिन छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद खत्म नहीं हो पा रहा है l आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र तेलंगाना जैसे तमाम राज्य हैं l जहां नक्सली घटनाएं ना के बराबर हैं l आखिर सवाल उठता है कि छत्तीसगढ़ से नक्सली वारदातें क्यों कम नहीं हो रही l एक समय अंतराल के बाद प्रदेश में क्यों नक्सली बड़ी वारदात को अंजाम देने में कामयाब हो जाते हैं l हाल ही में सुकमा में हुए नक्सली घटना से तो यही लगता है कि नक्सलवाद को खत्म करने में केंद्र सरकार राज्य सरकार और खुफिया तंत्र इस समस्या के खात्मे के लिए विचार ही नहीं बना पाये है l यदि नक्सलवाद की समस्या के हल के लिए ऐसे ही चलता रहा तो भविष्य में प्रदेश का पूरा आदिवासी वर्ग नक्सलवाद की राह पर चल पड़ेगा l आदिवासी प्रदेश होने के चलते सरकारों को चाहिए कि वह आदिवासियों की समस्याओं का निराकरण करें l भूपेश सरकार के पहले रमन सरकार भी 15 वर्ष में नक्सलवाद की समस्या से निजात नहीं दिला पाई l अब भूपेश बघेल सरकार को इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए और समस्या को बल पूर्वक न निपटाते हुए आपसी बातचीत से हल करने का प्रयास करना चाहिए l यदि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस समस्या को हल करने में कामयाब होते हैं तो इतिहास में अमर हो जाएंगे l इसके लिए उन्हें प्रयास जरूर करना चाहिए l हम जानते हैं कि नक्सलवादी भी समाज का हिस्सा है l नक्सलवादी भी चाहे तो मुख्यधारा में लौट सकते हैं l सरकार का हिस्सा बनकर अपनी परेशानियों से अवगत करा सकते हैं l नक्सलवादियों को हिंसा का रास्ता छोड़ राजनीति का हिस्सा बनना चाहिए और इसमें हमारी राजनैतिक पार्टियों को सहायता करना चाहिए l हम जानते हैं कि नक्सलवाद के
पैरोकार प्रदेश के नहीं बल्कि प्रदेशों के हैं जो छत्तीसगढ़ के वारदातों को अंजाम देकर भाग निकलते हैं कहीं ना कहीं यह बात प्रदेशवासियों को सोचनी चाहिए lअभी कुछ समय ही हुआ है जब सुकमा जिले के मिलपा के जंगलो मे नक्सली और डी आर जी, एसटीएफ, सीआरपीएफ के साथ मुठभेड़ हुई l इसमें शहीद हुए 17 जवान डीआरजी के शहीद हुए है देखा जाए तो डी आर जी के जवान से नक्सली खौफ खाते हैं क्योंकि डीआरजी के जवान बस्तर के आदिवासी इलाकों के मूल निवासी होते हैं जिसके चलते उन्हें नक्सलियों के स्वभाव उनके ठौर ठिकाने, जंगलों के रास्ते इत्यादि की संपूर्ण जानकारी होती है डीआरजी के जवानों का मरना कोई आसान बात नहीं है इतनी संख्या मैं जवान पहली बार मारे गए हैं जबकि सीआरपीएफ के जवानों से नक्सली बिल्कुल भी खौफ नहीं खाते हैं l 12 जवानों के हथियार गायब हैं एंबुश लगाए गए एवं ब्लास्ट किए गए जिसमें जवान फंस गए l सरकार को ध्यान देना चाहिए कि अब नक्सली तीर वाले पिछड़े हुए नहीं है आज नक्सलवादी आधुनिक हथियारों और टेक्नोलॉजी से लैस है जो सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती है l यह दुर्भाग्यपूर्ण है और कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि आने वाले समय में नक्सली फिर कोई बड़ी वारदात को अंजाम देने की फिराक मैं है l एक बार फिर इस हमले मे हमारी सरकार और खुफिया एजेंसियों की नाकामियों को उजागर किया गया l क्योंकि नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया था l हालांकि बुरकापार, चिंतागुहा और एलमागुड़ा जगह पर हमला हुआ था l वहां पर पहले से ही नक्सली घात लगाकर बैठे थे l इसकी जानकारी लेने में हमारी एजेंसी नाकाम रही और देश को एक बार फिर जवानों की शहादत देखनी पड़ी l यह बात सच है कि पिछले कई दशकों से छत्तीसगढ़ नक्सलवाद की समस्या से जूझ रहा है l एक अंतराल के बाद राज्य में नक्सली बड़ी वारदात को अंजाम देकर इस समस्या को जिन्दा कर देते हैं l यहां एक बात का जिक्र करना भी जरूरी है l कि कुछ महीने पहले नक्सलियों का साहित्य प्राप्त हुआ था l इस साहित्य में हथियारों की कमी का जिक्र था और उल्लेख था कि नक्सलियों को विदेशों से आर्थिक सहायता प्राप्त हो रही है l जब सरकार को नक्सलियों का साहित्य मिल गया था तो सरकार को प्रभावी कदम उठाने चाहिए थे l हमारी व्यवस्था से चूक तो हुई है लेकिन इस चूक से सबक लेना होगा l इस समस्या से निपटने के लिए पक्ष और विपक्ष दोनों को साथ आना होगा l एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने से बचना होगा l
नक्सली किसी पार्टी विशेष से नहीं होते l व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाते हैं और गलत रास्ता चुनकर सरकार को चुनौती देते हैं l सरकार किसी भी पार्टी की हो सबको अपनी रणनीति में बदलाव लाना होगा l राज्य शासन सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों को साथ मिलकर स्थायी समाधान पर विचार करना होगा l यह बात भी सच है कि भूपेश बघेल के 15 माह के शासन में पहली बार इतना बड़ा हमला हुआ है जिससे 17 जवान शहीद हुए हैं l लेकिन यह समय आरोप लगाने का बिल्कुल नहीं है बल्कि नक्सलियों की मानसिकता को बदलने के लिए प्रयास करना होगा l यह नक्सली बाहर के नहीं है बल्कि इन्हीं क्षेत्रों के भटके और गुमराह नौजवान हैं l जो कहीं ना कहीं शासन की नीतियों से खफा हैं l अब नक्सली भी आधुनिक हथियारों से लैस होते हैं l उन्हें बाहरी मदद मिलती है सरकार को इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है l नक्सली क्षेत्रों में कार्य कर रही पर कहीं ना कहीं कोई कमी है जिस पर और आगे बढ़ने की आवश्यकता है l
अब समय आ गया है जब केंद्र सरकार को भी नक्सलवाद के उन्मूलन की ओर ठोस कदम उठाना होगा वैसा ही कदम जैसा केंद्र ने कश्मीर पर उठाया, बात यहाँ बाहरी मदद की है जैसे पैसे, हथियार, टेक्नोलॉजी की मदद विदेश से आ रही है नक्सलियों के शीर्षस्थ नेता भी छत्तीसगढ़िया आदिवासी नहीं है इसमें केंद्र सरकार सक्षम है जो इस कॉकस को तोड़ सकती है क्योंकि समस्या की मूल जड़ छ.ग. की सीमा के परे है फिर राज्य सरकार और केंद्र मिलकर इस क्षेत्र को साफ करें और आदिवासी को इस भृम जाल से मुक्त करा दें क्योंकि केंद्र सरकार के माध्यम से ही नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आर्थिक सहायता पहुंचाई जाती है आज छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद एक बहुत बड़ी समस्या है अतः राज्य सरकार के साथ मिलकर केंद्र सरकार को भी नक्सली समस्या के उन्मूलन के लिए बातचीत का रास्ता छोड़ कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए अगर ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले समय में नक्सलियों के हौसले बुलंद होंगे और इसी तरह नक्सली हमले होते रहेंगे और जल्दी केंद्र और राज्य सरकारें एकजुट नहीं हुई तो आने वाले समय में छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के वजूद पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाएगा जो अभी भी हांशिये पर है
केंद्र सरकार को भी नक्सलवाद के उन्मूलन की ओर ठोस कदम उठाना होगा,
सचेत रहे छत्तीसगढ़ सरकार
विजया पाठक
धीरे-धीरे करके देश के अधिकांश राज्यों से नक्सलवाद खत्म होता जा रहा है, लेकिन छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद खत्म नहीं हो पा रहा है l आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र तेलंगाना जैसे तमाम राज्य हैं l जहां नक्सली घटनाएं ना के बराबर हैं l आखिर सवाल उठता है कि छत्तीसगढ़ से नक्सली वारदातें क्यों कम नहीं हो रही l एक समय अंतराल के बाद प्रदेश में क्यों नक्सली बड़ी वारदात को अंजाम देने में कामयाब हो जाते हैं l हाल ही में सुकमा में हुए नक्सली घटना से तो यही लगता है कि नक्सलवाद को खत्म करने में केंद्र सरकार राज्य सरकार और खुफिया तंत्र इस समस्या के खात्मे के लिए विचार ही नहीं बना पाये है l यदि नक्सलवाद की समस्या के हल के लिए ऐसे ही चलता रहा तो भविष्य में प्रदेश का पूरा आदिवासी वर्ग नक्सलवाद की राह पर चल पड़ेगा l आदिवासी प्रदेश होने के चलते सरकारों को चाहिए कि वह आदिवासियों की समस्याओं का निराकरण करें l भूपेश सरकार के पहले रमन सरकार भी 15 वर्ष में नक्सलवाद की समस्या से निजात नहीं दिला पाई l अब भूपेश बघेल सरकार को इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए और समस्या को बल पूर्वक न निपटाते हुए आपसी बातचीत से हल करने का प्रयास करना चाहिए l यदि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस समस्या को हल करने में कामयाब होते हैं तो इतिहास में अमर हो जाएंगे l इसके लिए उन्हें प्रयास जरूर करना चाहिए l हम जानते हैं कि नक्सलवादी भी समाज का हिस्सा है l नक्सलवादी भी चाहे तो मुख्यधारा में लौट सकते हैं l सरकार का हिस्सा बनकर अपनी परेशानियों से अवगत करा सकते हैं l नक्सलवादियों को हिंसा का रास्ता छोड़ राजनीति का हिस्सा बनना चाहिए और इसमें हमारी राजनैतिक पार्टियों को सहायता करना चाहिए l हम जानते हैं कि नक्सलवाद के
पैरोकार प्रदेश के नहीं बल्कि प्रदेशों के हैं जो छत्तीसगढ़ के वारदातों को अंजाम देकर भाग निकलते हैं कहीं ना कहीं यह बात प्रदेशवासियों को सोचनी चाहिए lअभी कुछ समय ही हुआ है जब सुकमा जिले के मिलपा के जंगलो मे नक्सली और डी आर जी, एसटीएफ, सीआरपीएफ के साथ मुठभेड़ हुई l इसमें शहीद हुए 17 जवान डीआरजी के शहीद हुए है देखा जाए तो डी आर जी के जवान से नक्सली खौफ खाते हैं क्योंकि डीआरजी के जवान बस्तर के आदिवासी इलाकों के मूल निवासी होते हैं जिसके चलते उन्हें नक्सलियों के स्वभाव उनके ठौर ठिकाने, जंगलों के रास्ते इत्यादि की संपूर्ण जानकारी होती है डीआरजी के जवानों का मरना कोई आसान बात नहीं है इतनी संख्या मैं जवान पहली बार मारे गए हैं जबकि सीआरपीएफ के जवानों से नक्सली बिल्कुल भी खौफ नहीं खाते हैं l 12 जवानों के हथियार गायब हैं एंबुश लगाए गए एवं ब्लास्ट किए गए जिसमें जवान फंस गए l सरकार को ध्यान देना चाहिए कि अब नक्सली तीर वाले पिछड़े हुए नहीं है आज नक्सलवादी आधुनिक हथियारों और टेक्नोलॉजी से लैस है जो सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती है l यह दुर्भाग्यपूर्ण है और कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि आने वाले समय में नक्सली फिर कोई बड़ी वारदात को अंजाम देने की फिराक मैं है l एक बार फिर इस हमले मे हमारी सरकार और खुफिया एजेंसियों की नाकामियों को उजागर किया गया l क्योंकि नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया था l हालांकि बुरकापार, चिंतागुहा और एलमागुड़ा जगह पर हमला हुआ था l वहां पर पहले से ही नक्सली घात लगाकर बैठे थे l इसकी जानकारी लेने में हमारी एजेंसी नाकाम रही और देश को एक बार फिर जवानों की शहादत देखनी पड़ी l यह बात सच है कि पिछले कई दशकों से छत्तीसगढ़ नक्सलवाद की समस्या से जूझ रहा है l एक अंतराल के बाद राज्य में नक्सली बड़ी वारदात को अंजाम देकर इस समस्या को जिन्दा कर देते हैं l यहां एक बात का जिक्र करना भी जरूरी है l कि कुछ महीने पहले नक्सलियों का साहित्य प्राप्त हुआ था l इस साहित्य में हथियारों की कमी का जिक्र था और उल्लेख था कि नक्सलियों को विदेशों से आर्थिक सहायता प्राप्त हो रही है l जब सरकार को नक्सलियों का साहित्य मिल गया था तो सरकार को प्रभावी कदम उठाने चाहिए थे l हमारी व्यवस्था से चूक तो हुई है लेकिन इस चूक से सबक लेना होगा l इस समस्या से निपटने के लिए पक्ष और विपक्ष दोनों को साथ आना होगा l एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने से बचना होगा l
नक्सली किसी पार्टी विशेष से नहीं होते l व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाते हैं और गलत रास्ता चुनकर सरकार को चुनौती देते हैं l सरकार किसी भी पार्टी की हो सबको अपनी रणनीति में बदलाव लाना होगा l राज्य शासन सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों को साथ मिलकर स्थायी समाधान पर विचार करना होगा l यह बात भी सच है कि भूपेश बघेल के 15 माह के शासन में पहली बार इतना बड़ा हमला हुआ है जिससे 17 जवान शहीद हुए हैं l लेकिन यह समय आरोप लगाने का बिल्कुल नहीं है बल्कि नक्सलियों की मानसिकता को बदलने के लिए प्रयास करना होगा l यह नक्सली बाहर के नहीं है बल्कि इन्हीं क्षेत्रों के भटके और गुमराह नौजवान हैं l जो कहीं ना कहीं शासन की नीतियों से खफा हैं l अब नक्सली भी आधुनिक हथियारों से लैस होते हैं l उन्हें बाहरी मदद मिलती है सरकार को इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है l नक्सली क्षेत्रों में कार्य कर रही पर कहीं ना कहीं कोई कमी है जिस पर और आगे बढ़ने की आवश्यकता है l
अब समय आ गया है जब केंद्र सरकार को भी नक्सलवाद के उन्मूलन की ओर ठोस कदम उठाना होगा वैसा ही कदम जैसा केंद्र ने कश्मीर पर उठाया, बात यहाँ बाहरी मदद की है जैसे पैसे, हथियार, टेक्नोलॉजी की मदद विदेश से आ रही है नक्सलियों के शीर्षस्थ नेता भी छत्तीसगढ़िया आदिवासी नहीं है इसमें केंद्र सरकार सक्षम है जो इस कॉकस को तोड़ सकती है क्योंकि समस्या की मूल जड़ छ.ग. की सीमा के परे है फिर राज्य सरकार और केंद्र मिलकर इस क्षेत्र को साफ करें और आदिवासी को इस भृम जाल से मुक्त करा दें क्योंकि केंद्र सरकार के माध्यम से ही नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आर्थिक सहायता पहुंचाई जाती है आज छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद एक बहुत बड़ी समस्या है अतः राज्य सरकार के साथ मिलकर केंद्र सरकार को भी नक्सली समस्या के उन्मूलन के लिए बातचीत का रास्ता छोड़ कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए अगर ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले समय में नक्सलियों के हौसले बुलंद होंगे और इसी तरह नक्सली हमले होते रहेंगे और जल्दी केंद्र और राज्य सरकारें एकजुट नहीं हुई तो आने वाले समय में छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के वजूद पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाएगा जो अभी भी हांशिये पर है


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