पंचक मे चुने गए पांच अभिनेता___

राजेश शर्मा 

बात पंचक की हो रही है। शिवराज ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो पंचक मे,मंत्री बनाए तो पंचक मे, संख्या भी पांच___यह अपशकुन है सनातनी धर्मानुसार!
लोग कहीं न कहीं पूरे मामले को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी देख रहे हैं। अंदर रखना-बाहर भेजना जैसे निर्णय इनके बाप की बपौती है। कायर राजनीति की शिकार मध्यप्रदेश सरकार खुद अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। "मामा" का ममत्व इसबार गायब है। न वाणी मे वह तेज है और न ही सोचने मे पहले जैसी तीव्रता। एक पुतले को जैसे कुर्सी पर रख दिया गया हो।

महान ज्ञाता-विज्ञाता और सरस्वती पुत्र, मेरे गुरु पत्रकार महेश श्रीवास्तव जी ने 7 मई सन् 1999 को  दैनिक भास्कर के अंक मे लिखा था कि___

"कुछ साल पहले की बात है, एक महान नेता के बारे मे मेरी एक विशेष टिप्पणी छपी थी और तब उनके निजि एक भक्त ने फोन कर कहा- धन्यवाद! उधर से आवाज आई- और जब तुम्हारी गर्दन टूटेगी तब? मेने कहा- उसके लिए अग्रिम धन्यवाद! क्योंकि गर्दन ही टूट जाएगी तो धन्यवाद कैसे दूंगा।"

श्रद्धेय महेश जी के वह शब्द और पंक्तियाँ आज के इस दौर मे 21 वर्ष बाद भी प्रासंगिक नजर आ रही हैं।

शिवराज टूटे-टूटे से हैं_छद्म कांग्रेस  का एक गुच्छा जुड़ा-जुड़ा सा है। सरकार प्यार से नहीं समझोते से चल रही है। समझोता टूटा तो सरकार गई। सात फेरों को चुनौती देकर रखैलों को घर मे लाकर ऐसा ही किया गया जैसे जलती गाडर को घर मे घुसेड़ लिया गया।

एक तरफ कोरोना की महामारी और दूसरी तरफ भाजपा आलाकमान की मनमानी...दोनों तरफ घिरे शिवराज को अब बाहर निकलने का रास्ता सूझ नहीं पड़ रहा। जिस दौर मे उन्होंने विगत दौर गुजारा वह कुछ ओर था लेकिन यह दौर कुछ ओर है। शिवराज वह नहीं जो कभी हुआ करते थे। जिन पांच मंत्रियों को उन्होंने कसम खाने के लिए प्रस्तुत किया यह उनकी च्वाइस नहीं हैं। 
कहावत है कि हाथी के दांत खाने के ओर , दिखाने के ओर.....फिलहाल शिवराज सिर्फ़ दिखाने के दांतो का इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि यह उनकी मजबूरी है। अपाच्य भोजन का सेवन उन्हें करना पड़ रहा है।

चौतरफा घिरा हुआ शिव का राज अपनी कहानी खुद बयां कर रहा है। कमल को अनाथ कर देने वाला "हथकंडा" ग्वालियरी भाषा बोल पब्लिक का मूंह चिढ़ा रहा है। आरंभ मे कोरोना को समझने की भूल करने वाले अफसरानों को मुकाम दिखाया गया लेकिन फलफूल रहे कोरोना की जवाबदेही को नकारा जाना कबतक न्याय संगत माना जाता रहेगा। इंदौर,भोपाल,उज्जैन आदि शहरों मे कोराना के खिज़िरसराय कौन हैं ?? नैतिकता क्या घर भूल गई है या इस्तीफों पर दीमक लग हुई है? लालबहादुर शास्त्री एक ही थे या एक ही रहेंगे?
तुम भी तो प्रदेश के लाल हो "लाल" लाल ही रहता है। "मामा" तो कंस और शकुनि भी हुए हैं।
उठो "लाल" अब आंखें खोलो__"मामा" के किरदार से बाहर निकलो और हकीकत को "अमलीजामा" पहनाओ।

आज कुर्सी नहीं वसुन्धरा से मोहब्बत की ऋतु आई है। प्रदेश के इस मुफलिसी के दौर मे मीडिया को विज्ञापन परोसे जाना कौन सी तुम्हारी मजबूरी है। पत्थर सेंककर खाने वालों को बताओ तो जरा! पांच मंत्रियों के "मुख्य" मूंह तो खोलो जरा। हथकंडों के कंडों पर सेंककर बनी सरकार कितने दिन तक प्रदेश के पेट की आपूर्ति बनी रहेगी!!
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