गायिका/ अभिनयकर्ता
आज फिर जीने की तमन्ना.... और मरने का इरादा
एक बंगाली फिल्मकार... सत्यजीत रे... अपनी पहली हिंदी फिल्म बनाने की तमन्ना लिए.... हीरोइन वहीदा रहमान के पास आते हैं.... गाइड फिल्म की नायिका का रोल का ऑफर लेकर....। कुछ वक्त गुजरने के बाद यूरोप टूर से लौटे... सदाबहार देवानंद भी पहुँचते हैं... वहीदा रहमान के पास वही ऑफर लेकर...। वहीदा जी चकित हो जाती हैं.. वो "रे" साहब की बात दोहराती हैं.... देव साहब उनसे कोई बात होने का इंकार करते हैं.. और आर के नारायण के लिखे उपन्यास.. द गाइड के सारे अधिकार उनके द्वारा.. खरीद लिए जाने की बात कहते हैं...। वहीदा और आश्चर्य में डूब जाती हैं... फिल्म कोई बनाए.. नायिका की भूमिका उन्हें ही करनी है...।
लगे हाथ बताते चले कि देव साहब ने पहलेएक अच्छी डांसर होने की वजह से वैजयंती माला को हीरोईन लेने का विचार बनाया था.. .. लेकिन वहीदा रहमान के साथ जोड़ी ज्यादा जमने की कल्पना के चलते... रोल का ऑफर बेहतरीन नृत्यांगनाओ में शुमार वहीदा जी को किया..।
फिल्म को अंग्रेजी और हिंदी दोनो में बनाया जाता है... लेकिन अंग्रेजी निर्देशक टेड डेनियलेविस्की और हिंदी निर्देशक चेतन आनंद के बीच पटरी नहीं बैठती है..। तो पहले अंग्रेजी फिल्म को शूट किया जाता है... जो रिलीज होने के बाद.. सुपर फ्लॉप हो जाती है.. तब उपन्यासकार आर के नारायण ने कहा था.... मिस गाइड.... गाइड...।
खैर हिंदी वर्जन गाइड बनना शुरू होती है.. निर्देशक चेतन आनन्द... अपने सपनो की फिल्म हकीकत में व्यस्त हो जाते है.... तब निर्देशन का जिम्मा देव साहब... अपने एक और भाई विजय आनन्द को देते हैं... उनकी शर्त होती है.. फिल्म की पटकथा खुद लिखने की...। उनके पसंदीदा गीतकार हसरत जयपुरी से फिल्म के गीत लिखे जाने का तय होता है...। लेकिन बात नहीं बनती तो इस फिल्म के गीत लिखते हैं... राजकपूर की खोज... गीतकार शैलेंद्र...। वो भी भारी भरकम साईनिंग अमाउंट लेकर...। तब जाकर उनकी कलम से गीत जन्म लेता है... आज फिर जीने की तमन्ना है.. आज फिर मरने का इरादा है....। गीत क्या है....बंधनों से आजाद हुए....मन की आत्मकथा है....। गीत का मुखडा हो...या अंतरा....हर शब्द दिल को बल्लियों उछलने को मजबूर कर देता है...।दर्शक या श्रोता को खुद के ही आजाद होने का गुमान करा देता है....। पूरी शब्द रचना...बाग में खिले ताजा गुलाबों की...ताज़गी से भरपूर है...। जिसकी खुशबू आज तक सुनने वालो को मद मस्त कर देने की काबलियत रखती है..। फूलों के खुली हवा में इठलाने... का अहसास है। फिर देव साहब के फेवरिट सचिन देव बर्मन का संगीत ....इस गीत को....और अमर बना जाता है...। किस वाद्य यंत्र का कहाँ....किस अंदाज में उपयोग होना है....जैसे सचिन दा को पहले से ही हर चीज पता थी....। उस समय के मशहूर संगीतकार ओ पी नैयर ने कहा है...
"आज फ़िर जीने की तमन्ना है" … हिंदी फिल्मो का सर्वश्रेष्ठ गीत है....। इसमें गीत के बोल और संगीत जिस तरह से एक दूसरे को पूरी तरह से कॉम्प्लीमेंट करते हैं वैसे किसी और गीत में कभी नहीं किए...।
इस गाने को गायिका स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने भी.. एकदम अल्हड़ शैली से गाया है... मानों पिंजरे के पंछी को.. आकाश में उड़ान भरने का मौका मिल गया हो....। और वह अपनी पूर्ण तीव्रता से... चहचहाते हुए.... ये गीत गा रहा हो...। वैसी मस्ती लता जी ने अपनी आवाज से... इस गाने में कामयाबी के साथ घोली है...।
गीत के बोल, संगीत, गायन और वहीदा रहमान और देव आनंद की बेहतरीन अदाकारी... इस गाने को बार बार सुनने के लिए... आमंत्रित करती है...। उस पर कैमरा मेन... जॉली मिस्त्री की कमाल फोटोग्राफी.. विजय आनंद का निर्देशन.. सबका जादू.. दर्शक के सर चढ़ कर बोलता है...। वो भी ऐसा कि.... वाह... कहने को जी मचलने लगे।
मजे की बात यह है कि... रोजी (वहीदा) और राजू(देवानंद) की प्रेम कहानी का आरंभ भी है। हीरो राजू एक सवाल करता है... हीरोईन रोजी से...
मेरी समझ में नहीं आ रहा.....कल तक आप लगती थीं 40 साल की औरत जो ज़िंदगी की हर ख़ुशी ...हर उमंग...हर उम्मीद ...बीच कहीं रास्ते में खो आई है. ...और आज लगती हैं 16 साल की बच्ची – भोली...नादान...बचपन की शरारत से भरपूर.....।
इस सवाल का जवाब ही ये गाना है...
आज फ़िर जीने की तमन्ना है…’ एस. डी. बर्मन की ऐसी कंपोजिशन है जो मुखड़े (आज फिर जीने की तमन्ना है…) से नहीं अंतरे से (कांटों से खींच के ये आंचल…) से शुरू होती है....
कांटो से खींच के ये आंचल,
तोड़ के बंधन बांधी पायल.
कोई न रोके दिल की उड़ान को,
दिल वो चला, आ हां हां हां…
यहीं पर याद कीजिए उस सीन को.. जब दिल वो चला... गाते हुए.. ट्रक में सवार नायिका गाँव की गोरी से छीने मटके को.. फेक देती है..... इस पूरे अंतरे के बाद मुखड़ा आता है –
आज फिर जीने की तमन्ना है,
आज फिर मरने का इरादा है.....
है न गजब.... जो अब ज्यादा अजब लग रहा होगा...। ट्रक से शुरू हुए गाने को.. आगे ऊँट वाले को पैसे देकर.... नायिका ऊँट पर बैठकर गाती है...। फिर चित्तौड़ के किले में गाना फिल्माया गया है...। जहाँ पर वहीदा जी का एक सीन आईने... में उन्हें दिखाता है... यह सीन पद्मिनी महल का है...। जो अलाउद्दीन खिलजी द्वारा... पद्मिनी को आईने में देखने के ०ऐतिहासिक दृश्य को याद करा जाता है...।
चलते चलते एक बात और बता दूँ कि भारतीय सिने इतिहास की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में शुमार... फिल्म गाइड (1965) को अपने निर्माण के 42 साल बाद 2007 के कान फिल्म समारोह में प्रदर्शित किए जाने का गौरव भी प्राप्त है...।
शैलेश तिवारी
---------------------
जहाँ चाह.... वहाँ राह...
लॉक डाउन के इस दौर को खुशनुमा बनाये जाने की कल्पना ने डॉ मीनू पाण्डेय भोपाल को गीत के फिल्मांकन की परिकल्पना को साकार करने की इच्छा जगाई। और उन्होंने जहाँ चाह... वहाँ राह...की कहावत को चरितार्थ कर दिखाया। उन्होंने इस गाने के कांसेप्ट को सभी को बताया और उनकी स्वीकृति मिल जाने पर गाने के अलग अलग हिस्से कर अपने ग्रुप में दिए और उन पर डांस किए जाने का आग्रह किया। शर्त एक ही थी कि अलग अलग शैली की साडी पहनकर कर इस गाने के अपने अपने हिस्से को शूट करना है।
वंदना पांडेय, रश्मि पाण्डेय, दीपा पाण्डेय, कीर्ति पाण्डेय, कल्पना चतुर्वेदी, देवांशी पांडेय, अयोनिजा पांडेय, मानसी पाण्डेय, आकृति चतुर्वेदी, सुशांतिका पांडेय और श्रेया तिवारी ने अपना अपना वीडियो बनाकर इन्हें भेजा। गौर तलब बात यह है कि इस वीडियों को बनाने में शामिल होने वाली प्रतिभागी न ही एक ही कॉलोनी की हैं और एक ही शहर की भी नहीं है। एक भुवनेश्वर की हैं तो एक दिल्ली की..। कुछ सागर की हैं तो कुछ भोपाल की....। सभी बिखरे मोतियों को एक माला में गूँथने का काम आसान नहीं था...।लेकिन कमर कसी जा चुकी थी...सफर भी शुरू था ... कुछ पढ़ाव पार भी किए जा चुके थे लेकिन मंजिल....और मेहनत मांग रही थी तब अयोनिजा पांडेय ने सभी के वीडियो को जोडा और एडिटिंग की..। एक सप्ताह के अथक प्रयास की दिलखुश कर देने वाली उपलब्धि इस आधी आबादी ने पूरी की पूरी हासिल की। वीडियो की सूत्रधार डॉ मीनू पांडेय भोपाल ने फिल्म की नायिका की तरह ही नीली साडी पहन कर अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। यह उन लोगों के लिए ज्यादा अनुकरणीय है जो लॉक डाउन को बोरियत समझ रहे हैं या कुछ नहीं कर पाने की हालत में डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। इस पूरी टीम को बहुत बहुत शुभ कामनाएं देते हुए एम पी मीडिया पॉइंट पर आप सभी का स्वागत करता हूँ।
संपादक
आज फिर जीने की तमन्ना.... और मरने का इरादा
लगे हाथ बताते चले कि देव साहब ने पहलेएक अच्छी डांसर होने की वजह से वैजयंती माला को हीरोईन लेने का विचार बनाया था.. .. लेकिन वहीदा रहमान के साथ जोड़ी ज्यादा जमने की कल्पना के चलते... रोल का ऑफर बेहतरीन नृत्यांगनाओ में शुमार वहीदा जी को किया..।
फिल्म को अंग्रेजी और हिंदी दोनो में बनाया जाता है... लेकिन अंग्रेजी निर्देशक टेड डेनियलेविस्की और हिंदी निर्देशक चेतन आनंद के बीच पटरी नहीं बैठती है..। तो पहले अंग्रेजी फिल्म को शूट किया जाता है... जो रिलीज होने के बाद.. सुपर फ्लॉप हो जाती है.. तब उपन्यासकार आर के नारायण ने कहा था.... मिस गाइड.... गाइड...।
खैर हिंदी वर्जन गाइड बनना शुरू होती है.. निर्देशक चेतन आनन्द... अपने सपनो की फिल्म हकीकत में व्यस्त हो जाते है.... तब निर्देशन का जिम्मा देव साहब... अपने एक और भाई विजय आनन्द को देते हैं... उनकी शर्त होती है.. फिल्म की पटकथा खुद लिखने की...। उनके पसंदीदा गीतकार हसरत जयपुरी से फिल्म के गीत लिखे जाने का तय होता है...। लेकिन बात नहीं बनती तो इस फिल्म के गीत लिखते हैं... राजकपूर की खोज... गीतकार शैलेंद्र...। वो भी भारी भरकम साईनिंग अमाउंट लेकर...। तब जाकर उनकी कलम से गीत जन्म लेता है... आज फिर जीने की तमन्ना है.. आज फिर मरने का इरादा है....। गीत क्या है....बंधनों से आजाद हुए....मन की आत्मकथा है....। गीत का मुखडा हो...या अंतरा....हर शब्द दिल को बल्लियों उछलने को मजबूर कर देता है...।दर्शक या श्रोता को खुद के ही आजाद होने का गुमान करा देता है....। पूरी शब्द रचना...बाग में खिले ताजा गुलाबों की...ताज़गी से भरपूर है...। जिसकी खुशबू आज तक सुनने वालो को मद मस्त कर देने की काबलियत रखती है..। फूलों के खुली हवा में इठलाने... का अहसास है। फिर देव साहब के फेवरिट सचिन देव बर्मन का संगीत ....इस गीत को....और अमर बना जाता है...। किस वाद्य यंत्र का कहाँ....किस अंदाज में उपयोग होना है....जैसे सचिन दा को पहले से ही हर चीज पता थी....। उस समय के मशहूर संगीतकार ओ पी नैयर ने कहा है...
"आज फ़िर जीने की तमन्ना है" … हिंदी फिल्मो का सर्वश्रेष्ठ गीत है....। इसमें गीत के बोल और संगीत जिस तरह से एक दूसरे को पूरी तरह से कॉम्प्लीमेंट करते हैं वैसे किसी और गीत में कभी नहीं किए...।
इस गाने को गायिका स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने भी.. एकदम अल्हड़ शैली से गाया है... मानों पिंजरे के पंछी को.. आकाश में उड़ान भरने का मौका मिल गया हो....। और वह अपनी पूर्ण तीव्रता से... चहचहाते हुए.... ये गीत गा रहा हो...। वैसी मस्ती लता जी ने अपनी आवाज से... इस गाने में कामयाबी के साथ घोली है...।
गीत के बोल, संगीत, गायन और वहीदा रहमान और देव आनंद की बेहतरीन अदाकारी... इस गाने को बार बार सुनने के लिए... आमंत्रित करती है...। उस पर कैमरा मेन... जॉली मिस्त्री की कमाल फोटोग्राफी.. विजय आनंद का निर्देशन.. सबका जादू.. दर्शक के सर चढ़ कर बोलता है...। वो भी ऐसा कि.... वाह... कहने को जी मचलने लगे।
मजे की बात यह है कि... रोजी (वहीदा) और राजू(देवानंद) की प्रेम कहानी का आरंभ भी है। हीरो राजू एक सवाल करता है... हीरोईन रोजी से...
मेरी समझ में नहीं आ रहा.....कल तक आप लगती थीं 40 साल की औरत जो ज़िंदगी की हर ख़ुशी ...हर उमंग...हर उम्मीद ...बीच कहीं रास्ते में खो आई है. ...और आज लगती हैं 16 साल की बच्ची – भोली...नादान...बचपन की शरारत से भरपूर.....।
इस सवाल का जवाब ही ये गाना है...
आज फ़िर जीने की तमन्ना है…’ एस. डी. बर्मन की ऐसी कंपोजिशन है जो मुखड़े (आज फिर जीने की तमन्ना है…) से नहीं अंतरे से (कांटों से खींच के ये आंचल…) से शुरू होती है....
कांटो से खींच के ये आंचल,
तोड़ के बंधन बांधी पायल.
कोई न रोके दिल की उड़ान को,
दिल वो चला, आ हां हां हां…
यहीं पर याद कीजिए उस सीन को.. जब दिल वो चला... गाते हुए.. ट्रक में सवार नायिका गाँव की गोरी से छीने मटके को.. फेक देती है..... इस पूरे अंतरे के बाद मुखड़ा आता है –
आज फिर जीने की तमन्ना है,
आज फिर मरने का इरादा है.....
है न गजब.... जो अब ज्यादा अजब लग रहा होगा...। ट्रक से शुरू हुए गाने को.. आगे ऊँट वाले को पैसे देकर.... नायिका ऊँट पर बैठकर गाती है...। फिर चित्तौड़ के किले में गाना फिल्माया गया है...। जहाँ पर वहीदा जी का एक सीन आईने... में उन्हें दिखाता है... यह सीन पद्मिनी महल का है...। जो अलाउद्दीन खिलजी द्वारा... पद्मिनी को आईने में देखने के ०ऐतिहासिक दृश्य को याद करा जाता है...।
चलते चलते एक बात और बता दूँ कि भारतीय सिने इतिहास की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में शुमार... फिल्म गाइड (1965) को अपने निर्माण के 42 साल बाद 2007 के कान फिल्म समारोह में प्रदर्शित किए जाने का गौरव भी प्राप्त है...।
शैलेश तिवारी
---------------------
जहाँ चाह.... वहाँ राह...
लॉक डाउन के इस दौर को खुशनुमा बनाये जाने की कल्पना ने डॉ मीनू पाण्डेय भोपाल को गीत के फिल्मांकन की परिकल्पना को साकार करने की इच्छा जगाई। और उन्होंने जहाँ चाह... वहाँ राह...की कहावत को चरितार्थ कर दिखाया। उन्होंने इस गाने के कांसेप्ट को सभी को बताया और उनकी स्वीकृति मिल जाने पर गाने के अलग अलग हिस्से कर अपने ग्रुप में दिए और उन पर डांस किए जाने का आग्रह किया। शर्त एक ही थी कि अलग अलग शैली की साडी पहनकर कर इस गाने के अपने अपने हिस्से को शूट करना है।
वंदना पांडेय, रश्मि पाण्डेय, दीपा पाण्डेय, कीर्ति पाण्डेय, कल्पना चतुर्वेदी, देवांशी पांडेय, अयोनिजा पांडेय, मानसी पाण्डेय, आकृति चतुर्वेदी, सुशांतिका पांडेय और श्रेया तिवारी ने अपना अपना वीडियो बनाकर इन्हें भेजा। गौर तलब बात यह है कि इस वीडियों को बनाने में शामिल होने वाली प्रतिभागी न ही एक ही कॉलोनी की हैं और एक ही शहर की भी नहीं है। एक भुवनेश्वर की हैं तो एक दिल्ली की..। कुछ सागर की हैं तो कुछ भोपाल की....। सभी बिखरे मोतियों को एक माला में गूँथने का काम आसान नहीं था...।लेकिन कमर कसी जा चुकी थी...सफर भी शुरू था ... कुछ पढ़ाव पार भी किए जा चुके थे लेकिन मंजिल....और मेहनत मांग रही थी तब अयोनिजा पांडेय ने सभी के वीडियो को जोडा और एडिटिंग की..। एक सप्ताह के अथक प्रयास की दिलखुश कर देने वाली उपलब्धि इस आधी आबादी ने पूरी की पूरी हासिल की। वीडियो की सूत्रधार डॉ मीनू पांडेय भोपाल ने फिल्म की नायिका की तरह ही नीली साडी पहन कर अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। यह उन लोगों के लिए ज्यादा अनुकरणीय है जो लॉक डाउन को बोरियत समझ रहे हैं या कुछ नहीं कर पाने की हालत में डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। इस पूरी टीम को बहुत बहुत शुभ कामनाएं देते हुए एम पी मीडिया पॉइंट पर आप सभी का स्वागत करता हूँ।
संपादक



Post A Comment: