लेखक
महेंद्र कपूर का स्वर ....नरेंद्र शर्मा जी की रचना.....राजकमल के संगीत निर्देशन वाला ... सीरियल का शीर्षक गीत ... ये भी बताता है कि... यह कथा... पुरुषार्थ की... स्वार्थ की... परमार्थ की... भी है..। संसार भर का मानव जीवन भी तो ...इतने भर में ही सिमटा हुआ है।
नश्वर संसार के सत्य को उद्घाटित करता.. महाभारत सीरियल..... देखने से ताल्लुक रखता है...। बिना किसी संशय के...। सिखा देता है मानव को मानव की तरह रहना...। सबसे तारतम्य बिठा कर...। विवाद भी होंगे.. षड्यंत्र भी होंगे... लेकिन कथा के सारथी कृष्ण का प्रेम संदेश भी है... जो ग्रहण योग्य है..। आम तौर पर महाभारत का उल्लेख आते ही.... कुरुक्षेत्र का मैदान.. आँखों के सामने आ जाता है...। जहाँ अठारह दिन के युद्ध में.... अठारह हजार अक्षोणी सेना ( अनुमान से लगभग पचास लाख व्यक्ति).... काल के गाल में समा गई थी....। लेकिन हर विध्वंस अपने साथ.... कुछ सृजन भी कर जाता है... दोनों सेनाओं के आमने सामने... युद्ध के लिए तत्पर होने के साथ ही... संसार को क्या किया जाए... कैसे किया जाए... इसका ज्ञान मिला... श्रीमद् भागवत गीता के रूप में..। जो अर्जुन का असमंजस दूर करने के लिए.. भगवान कृष्ण के मुख से प्रवाहित हुई... और जीवन को कर्म का सिद्धांत गा रही है... आज भी.... और गाती रहेगी... आने वाली सदियों तक....।
अंत में महाभारत के आदि पर्व के उस व्याख्यान का उल्लेख जरूर करना प्रासंगिक होगा, जिसमे धृतराष्ट्र... पांडवों को कृष्ण के माध्यम से खांडव वन दे देते हैं...। उसको इंद्रप्रस्थ में बदलने के लिए.. वहाँ के पेड़ पौधे.. जीव जंतु.. उनकी राह में रोड़ा बनते हैं...। अर्जुन के निवेदन पर अग्नि देव बताते हैं.. यहाँ का राजा तक्षक नाग है...। जिसके प्रभाव से वह इस जगह को अभी तक जला नहीं पाए हैं...। जलाने की तरकीब भी अर्जुन को बताते हैं...। तरीका अपना कर... खांडव वन में अग्नि जलती है.. पेड़ पौधे.. जीव जंतु.. जलाशय.. सभी भस्मी भूत हो जाते हैं.. तक्षक बदला चाहकर भी नहीं ले पाता...। उस को मौका मिलता है... तब जब पांडव वंश के अंश.. परीक्षित को डस लेता है...। अब बदले की आग का ठिया... परीक्षित के पुत्र जन्मेयजय के जिम्मे हो जाता है..। वह सर्प यज्ञ के माध्यम से.. समस्त सर्प जाति का.. नाश करने पर तुल जाता है...। व्यास उसको शांत करने के लिए ही महाभारत की कथा सुनाते हैं...। बताते हैं कि... स्वार्थ में अंधे न बनो... सबसे संतुलन बनाओ.. जिसमे प्रकृति का हर अंश आता है.. पेड़ पौधों.. को अंधाधुंध न काटो...। पशु पक्षी भी.. मानव के सहायक हैं.. उनकी रक्षा करो..। जल स्रोतों को सुरक्षित एवं संरक्षित रखो...। वायु की शुद्धता पर ध्यान दो..। इंद्रप्रस्थ के विकास की तरह... विनाश पर उतारू मत हो जाओ.. अन्यथा प्रकृति अपने संतुलन के न्याय सिद्धांत को अपनाती है.... जो मानव के लिए विध्वंसकारी बन जाता है..।
कितने बेहतर तरीके से.. महाभारत की कथा संसार में रहना सिखाती है.. इन उदाहरणों से समझा जा सकता है..। अन्यथा ज्वालामुखी, भूकंप, सुनामी, आँधियों की तरह ही.. महामारी प्रकृति के संतुलन के सिद्धांत के रूप में... विभीषिका बनकर सामने खड़ी हो जाती है... सुरसा की तरह मौत का मुँह खोलकर.. मानव जीवन को निगलने के लिए...। महाभारत से रहना सीख लें... रामायण से जीना.. और महाभारत के अंश गीता से करना... सीख लें.. इसमें ही मानव मात्र का कल्याण है...।
शैलेश तिवारी
जो कुछ है संसार में, जो कुछ है संसार वेद व्यास ने लिख दिया महाभारत में सार"
अथ श्री महाभारत कथा.... ये कथा है संसार की... इसमें अगर कुछ नही है तो वह संसार में भी नहीं है...। यही मर्म बताते हैं विद्वजन महाभारत का...। गुणी जनों की माने तो... गीता व्यवहार केंद्रित... रामायण संस्कार केंद्रित... भागवत उद्धार केंद्रित.... शिव पुराण परिवार केंद्रित.... और महाभारत संसार केंद्रित ग्रंथ हैं....। दूसरे शब्दों में समझने का प्रयास करें तो.... रामायण जीना.... गीता करना.... भागवत मरना..... और महाभारत रहना सिखाती है...। इस असार संसार में रहा किस तरह जाए.... यही अलख बीआर चोपड़ा के दूरदर्शन से प्रसारित हो रहे... धारावाहिक जगा रहा है..। विचार आ सकता है.... रामायण के जीने.... और महाभारत के रहने में क्या फर्क है..। यही संसार का सार है... जहाँ रहते तो पशु भी हैं..... लेकिन जीने की संभावना केवल मनुष्य के पास है...। ताजुब्ब इस बात का है... मानव जीने की बात तो दूर... इस धरा पर रहना ही भूल गया है...। यही महाभारत इन लॉक डाउन के दिनों में हमें सिखा रही है...। कैसे रहा जाए... घर के अंदर.. अपनी मौज में... मस्ती को जिंदा रखते हुए...।महेंद्र कपूर का स्वर ....नरेंद्र शर्मा जी की रचना.....राजकमल के संगीत निर्देशन वाला ... सीरियल का शीर्षक गीत ... ये भी बताता है कि... यह कथा... पुरुषार्थ की... स्वार्थ की... परमार्थ की... भी है..। संसार भर का मानव जीवन भी तो ...इतने भर में ही सिमटा हुआ है।
नश्वर संसार के सत्य को उद्घाटित करता.. महाभारत सीरियल..... देखने से ताल्लुक रखता है...। बिना किसी संशय के...। सिखा देता है मानव को मानव की तरह रहना...। सबसे तारतम्य बिठा कर...। विवाद भी होंगे.. षड्यंत्र भी होंगे... लेकिन कथा के सारथी कृष्ण का प्रेम संदेश भी है... जो ग्रहण योग्य है..। आम तौर पर महाभारत का उल्लेख आते ही.... कुरुक्षेत्र का मैदान.. आँखों के सामने आ जाता है...। जहाँ अठारह दिन के युद्ध में.... अठारह हजार अक्षोणी सेना ( अनुमान से लगभग पचास लाख व्यक्ति).... काल के गाल में समा गई थी....। लेकिन हर विध्वंस अपने साथ.... कुछ सृजन भी कर जाता है... दोनों सेनाओं के आमने सामने... युद्ध के लिए तत्पर होने के साथ ही... संसार को क्या किया जाए... कैसे किया जाए... इसका ज्ञान मिला... श्रीमद् भागवत गीता के रूप में..। जो अर्जुन का असमंजस दूर करने के लिए.. भगवान कृष्ण के मुख से प्रवाहित हुई... और जीवन को कर्म का सिद्धांत गा रही है... आज भी.... और गाती रहेगी... आने वाली सदियों तक....।
अंत में महाभारत के आदि पर्व के उस व्याख्यान का उल्लेख जरूर करना प्रासंगिक होगा, जिसमे धृतराष्ट्र... पांडवों को कृष्ण के माध्यम से खांडव वन दे देते हैं...। उसको इंद्रप्रस्थ में बदलने के लिए.. वहाँ के पेड़ पौधे.. जीव जंतु.. उनकी राह में रोड़ा बनते हैं...। अर्जुन के निवेदन पर अग्नि देव बताते हैं.. यहाँ का राजा तक्षक नाग है...। जिसके प्रभाव से वह इस जगह को अभी तक जला नहीं पाए हैं...। जलाने की तरकीब भी अर्जुन को बताते हैं...। तरीका अपना कर... खांडव वन में अग्नि जलती है.. पेड़ पौधे.. जीव जंतु.. जलाशय.. सभी भस्मी भूत हो जाते हैं.. तक्षक बदला चाहकर भी नहीं ले पाता...। उस को मौका मिलता है... तब जब पांडव वंश के अंश.. परीक्षित को डस लेता है...। अब बदले की आग का ठिया... परीक्षित के पुत्र जन्मेयजय के जिम्मे हो जाता है..। वह सर्प यज्ञ के माध्यम से.. समस्त सर्प जाति का.. नाश करने पर तुल जाता है...। व्यास उसको शांत करने के लिए ही महाभारत की कथा सुनाते हैं...। बताते हैं कि... स्वार्थ में अंधे न बनो... सबसे संतुलन बनाओ.. जिसमे प्रकृति का हर अंश आता है.. पेड़ पौधों.. को अंधाधुंध न काटो...। पशु पक्षी भी.. मानव के सहायक हैं.. उनकी रक्षा करो..। जल स्रोतों को सुरक्षित एवं संरक्षित रखो...। वायु की शुद्धता पर ध्यान दो..। इंद्रप्रस्थ के विकास की तरह... विनाश पर उतारू मत हो जाओ.. अन्यथा प्रकृति अपने संतुलन के न्याय सिद्धांत को अपनाती है.... जो मानव के लिए विध्वंसकारी बन जाता है..।
कितने बेहतर तरीके से.. महाभारत की कथा संसार में रहना सिखाती है.. इन उदाहरणों से समझा जा सकता है..। अन्यथा ज्वालामुखी, भूकंप, सुनामी, आँधियों की तरह ही.. महामारी प्रकृति के संतुलन के सिद्धांत के रूप में... विभीषिका बनकर सामने खड़ी हो जाती है... सुरसा की तरह मौत का मुँह खोलकर.. मानव जीवन को निगलने के लिए...। महाभारत से रहना सीख लें... रामायण से जीना.. और महाभारत के अंश गीता से करना... सीख लें.. इसमें ही मानव मात्र का कल्याण है...।


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