जो जितना धनवान उसका उतना सम्मान"
व्यक्ति का नहीं उसके पद का होता है सम्मान"
                           लेखिका 
रिश्तों और व्यक्ति का आंकलन हम भौतिक सुख -सुविधाओं और पद से करते है।बाहरी तरक्की और बाहरी आर्कषण को सम्मान देते है,व्यक्ति का आंकलन हम उसके सुख -सुविधाओ के समान से करते है।भौतिक वादी सोच ने हमारे मन पर चोट की है।वैभव और संपन्नता सदा मानवता पर हॉवी रही है। रिश्तो की गरिमा भी पद-प्रतिष्ठा के नीचे दम तोड़ रही है। ये जिंदगी की वो कसौटी है ,जो आपको वाकिफ कराती है आपकी अहमियत से।एक कामयाब आदमी सम्मान से चले ना चले,सम्मान उसके साथ-साथ चलता है।भौतिक अौर मनोभौतिक व्यवहार के आधार पर समाज के संवेदनात्मक रवैयो को निर्धारित करते है। तथ्य तर्क और संवेदनाओं के बीच स्थापित रिश्ते---अपमान और अवमानना के शिकार रिश्तो से संवेदनाएं मरती जा रही है। दुनिया के छ्ल -प्रपंचो में आम आदमी अपनी मासूमियत खो रहा है।आज लोगो ने अपनी सरलता खो दी है।आज आदमी कुटिल होना अपनी उपलब्धि मानता है। पद प्रतिष्ठा,रुपया-पैसा एक ऐसी रेलगाड़ी की तरह है,जिसमें अभी आप बैठे है ,तो कल कोई और बैठेगा---ये सारी चीजें जिंदगी में आती जाती रहती है---इसीलिये मान-सम्मान रूपये पैसे को मत दीजिये---जीवन के सच को ढूंढिये,जीवन जैसा दिख ता वैसा होता नहीं,बाहरी आर्कषण से अंदर की स्थितियो को तय मत कीजिये,हर बात की उम्र होती है।भौतिक सुख सुविधाये आज प्राथमिकता बनके हमारा उपहास उड़ा रही है,साधन संपन्नता को जीवन का लक्ष्य समझ बैठे है,बाहरी व्यक्तित्व के मायने नहीं होते,मायने होते है संस्कारो से बने व्यक्तित्व के-----नम्रता रखे,नम्रता जीवन को आगे बढाती है।सार्थक सफल एवं संपूर्ण बनाती है,मनी प्रेस्टीज ,अवार्ड जो हमने अपने लिये कमाये थे ,अंतिम समय में दूसरो का हो जाता है ,साधन संपन्नता के अलावा भी विकल्प रखे--बारूद के ढ़ेर पर बैठकर जिंदगी की बाते ना करे,जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में जो आपके साथ थे आपकी मुस्कुराहट थे,उन्हें अपने जीवन में महत्व दे,जाने ना दे उन्हें जीवन से---उन दर्दो को याद रखे जिनसे आपकी आंखे नम थी-----पता नहीं उनके जीवन से चले जाने का बोझ कल आप सह पाये या नहीं --सम्मान के निहतार्थ अर्थ गहरे रखना चाहिये,इन अर्थो को अनदेखा ना करे,जीवन का जो दर्शन हमारे सामने है वो अत्यंत गूढ है इसे स्वीकारे ---।
                   

मंजू श्रीवास्तव, छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)

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