लेखिका 

बड़े-बड़े कनस्तर
और भंडार घर
पुराने संबंधी से
जैसे माँ और उनका बक्सा,
बरसों से बंद था
भंडार घर के ताले सा
मुँह चिढ़ाता था,
जब से माँ गयीं थीं
बक्सा खोला नहीं गया था
बरसों देखा न गया था, 
कोने में कील पर लटकी
चाभियों के गुच्छे से
बमुश्क़िल एक चाभी लगी
और वो 
जादुई बक्सा 
टर्र की आवाज़ से खुल गया।

उसमें मिले
संभालकर रखे हुई 
भाई के बचपन की लंगोटी, 
तकिया, चादर और कुछ कपड़े,
उसमें दिखी नानी द्वारा बनाई
मेरी बचपन की फ्रॉक
एक लाल रिबन और मेरे खेलने के गुट्टे,
दादी के बनाये
एक जोड़ी मोजे और टोपी,
माँ के श्रृंगार का सामान
घर का बना काजल, सिंदूर, 
लाल-हरी चूड़ियाँ
गोटे लगी चुनरी
टूटी कंघी और
मुँह भर देखने को छोटा सा आईना,
माँ के ठाकुर जी, उनके वस्त्र
मंदिर की घण्टी
और लाल कपड़े में लिपटी रामायण,
एक डिब्बे में
नज़र उतारने की सामग्री,
सेब के आकार की पीतल जड़ी
खाली आभूषण दानी
और एक दो तीन पैसे के सिक्कों से भरी 
पुरानी गुल्लक,
मिला उसमें पापा के टूटे फ्रेम वाला चश्मा,
फाउंटेन पेन, हिसाब की डायरी
और नकली दांत,
एक कोने में छोटी सी पोटली थी
जिसमें से झांक रहीं थीं
कुछ चिट्ठियाँ
जिसकी मंद पड़ी रोशनाई में भी
एहसास जिंदा थे।

मानो तो कुछ नहीं
पर समझो तो 
पूरी गृहस्थी सिमटी थी
माँ के बक्से में,
बरसों से संजोयी यादें थीं
जिसने सजीव कर दिया था उस जमाने को,
जंग से बचाने को
नीचे अखबार का कागज़ बिछा था
किन्तु शायद हमने
उन यादों को जंग लगा दिया था,
दोहरे अखबार के बीच में
पूरे परिवार की श्वेत-श्याम ग्रुप फ़ोटो थी,
सीलन तब भी नहीं आई थी उसमें
शायद उसमें माँ के प्यार की गरमाई थी,
उस चित्र में अब भी दीख रही थी
माँ की आंखों में
स्नेह की छाया
और शायद इसी छाया ने
बचाया था बरसों पुरानी यादों को।

नहीं थी कोई वसीयत
नहीं थी कोई बैंक पासबुक
नहीं थे सोने चांदी के जेवर
पर फिर भी वो बक्सा
बहुत कीमती लगा,
उस बक्से में
ज़िन्दगी को करीब से
देखने की, समझने की
एक रहगुज़र थी,
वो नहीं था सिर्फ
मज़बूत लोहे का बक्सा 
वो हमारे जीवन को
ताक़त, हिम्मत, सुकून
देने वाला
जादुई बक्सा था
हाँ, जादुई बक्सा था।

"नीरजा मेहता"

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परिचय

नीरजा मेहता कमलिनी... गाजियाबाद की निवासी हैं। उच्च शिक्षित सेवा निवृत संस्कृत की व्याख्याता हैं। काव्य मंजरी समूह की संस्थापिका हैं। एमपी मीडिया पॉइंट के लिए अपनी रचनाओं को प्रेषित करती आ रही हैं। बहुत बहुत आभार...।
संपादक
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