लेखिका
एक कप चाय
एक कप चाय
और सोचने को बहुत कुछ
आज भी बालकनी की बन्नी पर
चाय का कप रख कर ..
निहारती हूँ ..सड़क पर भागती हुई गाड़ियों की
आवाजाही को और
सोचती हूँ
ज़िंदगी की खोखली रफ़्तार को !
एक कप चाय
और सोचने को बहुत कुछ
आज भी निहारती हूँ बारिश की उन बूंदों को
और उन्हें पकड़ लेने की जिद्द में
बच्ची बन जाती हूँ
और दूसरे ही पल बेटे लगायी गई आवाज़
'ओए मम्मी’
खींच लाती है फिर से
सपनों से बाहर !
एक कप चाय
और सोचने को बहुत कुछ
कभी कभी टीवी पर चल रही फिल्मों में
खुद जैसे के किरदार को ढूँढती
''इंग्लिश-विंग्लिश ‘'हिंदी मीडियम’ और ''mom'' जैसी फिल्मों में
खुद को उनकी जगह खड़ी देखती हूँ
और दूसरे ही पल ..
हक से भी आगे बढ़ कर 'उनकी' आवाज़ से
'' मेरा तौलिया कहाँ है'' ...
फिर से लौटती हूँ वर्तमान में
सपनों से जागते ही
हाथ से फिसल कर गिरते कप की भांति
सब सपने उसी पल में टूट जाते हैं
एक कप चाय और सोचने को बहुत कुछ
कुछ खाली सा समय और मेरी फेसबुक की वाल
यहाँ ज्यादातर मेरा समय व्यतीत होता है
यहाँ मुझे नारीवादी आन्दोलन..नारीवादी नारे और
और धर्म-युद्ध करती... हजारों-हजारों महिलायें
बहुत आराम से गाली-गलौच करती हुई
पटल पर उभरती और
ग़ायब होती दिखती हैं
चाहे वो परंपरागत वेशभूषा फ़ैशन का मामला हो या
कोई राजनीति मसला
नाक की नोंक तक सिंदूर खींच लेने का मामला या
किसी भी मॉबलिंचिंग को सांप्रदायिक रंग देने का
हर किसी को,एक दूसरे को गाली देते हुए..
पढ़ती रहती हूँ
तब घंटों सोचती हूँ
बदलती औरतों को /बदलते पुरुषों को
और पुरुष प्रधान समाज को..
चाहे वो उम्र में बड़ा हो या छोटा
किसी की भी हत्या करने की
जैसे आग लग चुकी हो
पर वें अपनी ही धुन में कुछ भी लिखते चले जाते हैं
ऐसे ही वक़्त वक़्त पर
फेसबुक के घिनौने समाज और गन्दी सोच से
वाकिफ होती जाती हूँ
और सोचती हूँ
अपने आस पास बदल रहे परिवेश को,
देखती हूँ ..आस भरी नज़रों से
अपने बड़े होते बच्चों की ओर
बहुत कुछ ओर देखती..
इस से पहले ही बेटे की आवाज़
''मम्मी ! जल्दी से खाना दो..बहुत भूख लगी है ''
कि आवाज़ से...सपने से जगती हुई सी
भागती हूँ ..अपनी रसोई की ओर
रसोई ..जो मेरा एक मात्र सम्राज्य है
यहाँ मेरा एकाधिकार और आधिपत्य है
जहाँ मुझे मेरे होने की ख़ुशी और मायने मिलते है
जहाँ मैं...धर्म /संस्कृति/ परंपरा
ऐसे ही अजीबोगरीब रस्मोरिवाज,
संकेत, बिम्ब से परे
है मेरी अपनी पूरी दुनिया
जहाँ मैं खुदे सवाल पूछती और
उत्तर ढूँढती और अपने ही संकेतों /बिम्बों पर
परंपरा के अंदर और बाहर के लोग को सोचती हुई
खुद पर मंद-मंद मुस्कराती हूँ ........
एक कप चाय और सोचने को बहुत कुछ ||
एक कप चाय
एक कप चाय
और सोचने को बहुत कुछ
आज भी बालकनी की बन्नी पर
चाय का कप रख कर ..
निहारती हूँ ..सड़क पर भागती हुई गाड़ियों की
आवाजाही को और
सोचती हूँ
ज़िंदगी की खोखली रफ़्तार को !
एक कप चाय
और सोचने को बहुत कुछ
आज भी निहारती हूँ बारिश की उन बूंदों को
और उन्हें पकड़ लेने की जिद्द में
बच्ची बन जाती हूँ
और दूसरे ही पल बेटे लगायी गई आवाज़
'ओए मम्मी’
खींच लाती है फिर से
सपनों से बाहर !
एक कप चाय
और सोचने को बहुत कुछ
कभी कभी टीवी पर चल रही फिल्मों में
खुद जैसे के किरदार को ढूँढती
''इंग्लिश-विंग्लिश ‘'हिंदी मीडियम’ और ''mom'' जैसी फिल्मों में
खुद को उनकी जगह खड़ी देखती हूँ
और दूसरे ही पल ..
हक से भी आगे बढ़ कर 'उनकी' आवाज़ से
'' मेरा तौलिया कहाँ है'' ...
फिर से लौटती हूँ वर्तमान में
सपनों से जागते ही
हाथ से फिसल कर गिरते कप की भांति
सब सपने उसी पल में टूट जाते हैं
एक कप चाय और सोचने को बहुत कुछ
कुछ खाली सा समय और मेरी फेसबुक की वाल
यहाँ ज्यादातर मेरा समय व्यतीत होता है
यहाँ मुझे नारीवादी आन्दोलन..नारीवादी नारे और
और धर्म-युद्ध करती... हजारों-हजारों महिलायें
बहुत आराम से गाली-गलौच करती हुई
पटल पर उभरती और
ग़ायब होती दिखती हैं
चाहे वो परंपरागत वेशभूषा फ़ैशन का मामला हो या
कोई राजनीति मसला
नाक की नोंक तक सिंदूर खींच लेने का मामला या
किसी भी मॉबलिंचिंग को सांप्रदायिक रंग देने का
हर किसी को,एक दूसरे को गाली देते हुए..
पढ़ती रहती हूँ
तब घंटों सोचती हूँ
बदलती औरतों को /बदलते पुरुषों को
और पुरुष प्रधान समाज को..
चाहे वो उम्र में बड़ा हो या छोटा
किसी की भी हत्या करने की
जैसे आग लग चुकी हो
पर वें अपनी ही धुन में कुछ भी लिखते चले जाते हैं
ऐसे ही वक़्त वक़्त पर
फेसबुक के घिनौने समाज और गन्दी सोच से
वाकिफ होती जाती हूँ
और सोचती हूँ
अपने आस पास बदल रहे परिवेश को,
देखती हूँ ..आस भरी नज़रों से
अपने बड़े होते बच्चों की ओर
बहुत कुछ ओर देखती..
इस से पहले ही बेटे की आवाज़
''मम्मी ! जल्दी से खाना दो..बहुत भूख लगी है ''
कि आवाज़ से...सपने से जगती हुई सी
भागती हूँ ..अपनी रसोई की ओर
रसोई ..जो मेरा एक मात्र सम्राज्य है
यहाँ मेरा एकाधिकार और आधिपत्य है
जहाँ मुझे मेरे होने की ख़ुशी और मायने मिलते है
जहाँ मैं...धर्म /संस्कृति/ परंपरा
ऐसे ही अजीबोगरीब रस्मोरिवाज,
संकेत, बिम्ब से परे
है मेरी अपनी पूरी दुनिया
जहाँ मैं खुदे सवाल पूछती और
उत्तर ढूँढती और अपने ही संकेतों /बिम्बों पर
परंपरा के अंदर और बाहर के लोग को सोचती हुई
खुद पर मंद-मंद मुस्कराती हूँ ........
एक कप चाय और सोचने को बहुत कुछ ||


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