लेखिका
जीवन का खुशनुमा पढ़ाव दाम्पत्य
विवाह ,सप्तपदी सात फेरो के बाद प्रेम के नवअंकुरण का सहज उत्सव और स्वाभविक अभिव्यक्ति का रोचक सिलसिला है ,इसमें छिपा है प्रेम का वो सूत्र जो दो लोगो के यकीन और विश्वास के महीन संर्दभो से गुंथा हुआ है ,जहां जिंदगी सफर और साथी सफर की मंजिल बन जाता है,विवाह के कई रूप कई स्तर ---लेकिन विडम्बना ही है की नियति और समाज ने विवाह को जिस रुप में ढ़ालकर दिखाया वहां वो कभी व्यंग तो कभी हास्य में रंगा हमारे समक्ष आया विवाह लगाव और लगाव और जुड़ाव का रिश्ता है प्रीत का ऐसा बंधन जो जोड़ता है दो दिलों को जहां सवेंदनाये कदम से कदम मिला कर चलती है एक अलहदा एहसास कराती है,जहां सपने दुखदर्द हंसी खुशी सब सांझे हो जाते है ,जहां दंभ हो वहां ये रिश्ता टिकता नहीं----एक ऐसा रिश्ता जो पीछे मुड़कर देखने को बाध्य नहीं करता ,दाम्पत्य का बहुस्तरीय ,बहुआयामी ,संबंध सिर्फ संतति विस्तार का कोई सामजिक विधान नहीं,अपितु एक रिश्ता है कल्पनाओ और कामनाओ का ,जहां थोड़े से दुख और अलगाव के बाद फिर आकुल हो पुनः एक -दूसरे को थाम लेते है,विवाह दाम्पत्य वहां कामयाब होता है जहां "मैं"दूसरे की खातिर खुद को भुलाये हुये जिंदगी से जूझता है-----जहां "मैं"निकल पड़ता हैं दूसरे के लिये उन मौको को तलाशने के लिये जो कहता है---लो जी लो जी भरकर ---अजीज हो जाते है वो सारे प्रयास जो दूसरे की खुशी की नई शक्ल आखित्यार करने में मददगार होते है, इन प्रयासों में गूंथे नए ख्बाव ही होते जो दाम्पत्य को जीने के नये आयाम देते है,विवाह दाम्पत्य कई रंगों का मेल हैै ,सुख -दुख ,मिलन जुदाई ,हास परिहास ,नाराजगी प्रतिक्षा ---कितने ही रंगों से रंगा प्रतिबद्धता के दायरो से बंधा ,जहां दो लोग एक दूसरे की छाया बन जाते है,खुशी और दुख के मौको पर एक हो जाते है ------परंतु ढ़ेरो परिवर्तन से गुजरते वैवाहिक रिश्तो के सिरे ही कभी -कभी गुम हो जाते है ,अक्सर साथी जोड़े अपने अपने आप में इतने व्यस्त और मस्त हो जाते है कि ठहरे हुये रिश्ते को आगे ले जाने की कोशिश भी नहीं करते,अपने से जुड़े इस रिश्ते पर गौर करे और एक सवाल खुद से भी करे ,रिश्ते की गर्माहट बनाये रखने के कितने प्रयास हमने किये-----ये प्यार और परवाह का रिश्ता है सब कुछ प्रयासों पर ही निर्भर है ,प्रयासो से ही विवाह ,दाम्पत्य पुख्ता रुख अखितयार करता है ,बनता है बना रहता है ,जिंदगी का एक खुशनुमा मौसम है दाम्पत्य---विवाह---
संपादक
जीवन का खुशनुमा पढ़ाव दाम्पत्य
विवाह ,सप्तपदी सात फेरो के बाद प्रेम के नवअंकुरण का सहज उत्सव और स्वाभविक अभिव्यक्ति का रोचक सिलसिला है ,इसमें छिपा है प्रेम का वो सूत्र जो दो लोगो के यकीन और विश्वास के महीन संर्दभो से गुंथा हुआ है ,जहां जिंदगी सफर और साथी सफर की मंजिल बन जाता है,विवाह के कई रूप कई स्तर ---लेकिन विडम्बना ही है की नियति और समाज ने विवाह को जिस रुप में ढ़ालकर दिखाया वहां वो कभी व्यंग तो कभी हास्य में रंगा हमारे समक्ष आया विवाह लगाव और लगाव और जुड़ाव का रिश्ता है प्रीत का ऐसा बंधन जो जोड़ता है दो दिलों को जहां सवेंदनाये कदम से कदम मिला कर चलती है एक अलहदा एहसास कराती है,जहां सपने दुखदर्द हंसी खुशी सब सांझे हो जाते है ,जहां दंभ हो वहां ये रिश्ता टिकता नहीं----एक ऐसा रिश्ता जो पीछे मुड़कर देखने को बाध्य नहीं करता ,दाम्पत्य का बहुस्तरीय ,बहुआयामी ,संबंध सिर्फ संतति विस्तार का कोई सामजिक विधान नहीं,अपितु एक रिश्ता है कल्पनाओ और कामनाओ का ,जहां थोड़े से दुख और अलगाव के बाद फिर आकुल हो पुनः एक -दूसरे को थाम लेते है,विवाह दाम्पत्य वहां कामयाब होता है जहां "मैं"दूसरे की खातिर खुद को भुलाये हुये जिंदगी से जूझता है-----जहां "मैं"निकल पड़ता हैं दूसरे के लिये उन मौको को तलाशने के लिये जो कहता है---लो जी लो जी भरकर ---अजीज हो जाते है वो सारे प्रयास जो दूसरे की खुशी की नई शक्ल आखित्यार करने में मददगार होते है, इन प्रयासों में गूंथे नए ख्बाव ही होते जो दाम्पत्य को जीने के नये आयाम देते है,विवाह दाम्पत्य कई रंगों का मेल हैै ,सुख -दुख ,मिलन जुदाई ,हास परिहास ,नाराजगी प्रतिक्षा ---कितने ही रंगों से रंगा प्रतिबद्धता के दायरो से बंधा ,जहां दो लोग एक दूसरे की छाया बन जाते है,खुशी और दुख के मौको पर एक हो जाते है ------परंतु ढ़ेरो परिवर्तन से गुजरते वैवाहिक रिश्तो के सिरे ही कभी -कभी गुम हो जाते है ,अक्सर साथी जोड़े अपने अपने आप में इतने व्यस्त और मस्त हो जाते है कि ठहरे हुये रिश्ते को आगे ले जाने की कोशिश भी नहीं करते,अपने से जुड़े इस रिश्ते पर गौर करे और एक सवाल खुद से भी करे ,रिश्ते की गर्माहट बनाये रखने के कितने प्रयास हमने किये-----ये प्यार और परवाह का रिश्ता है सब कुछ प्रयासों पर ही निर्भर है ,प्रयासो से ही विवाह ,दाम्पत्य पुख्ता रुख अखितयार करता है ,बनता है बना रहता है ,जिंदगी का एक खुशनुमा मौसम है दाम्पत्य---विवाह---
मंजु श्रीवास्तव
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मंजु श्रीवास्तव छिंदवाड़ा मप्र में निवास करती हैं। साहित्य से लगाव रहा है। आलेख कविता और कहानियां आदि विधाओं से आप साहित्य सेवा करती रही हैं। आपकी रचनाएँ विभिन्न समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। एमपी मीडिया पांईट पर आपका स्वागत हैं।संपादक


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