लेखक 

#*# रह गए #*#

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ये सच है रियासतें गईं, मगर नवाब रह गए ।
कुछ तो बन गए घोड़े, शेष रकाब रह गए ।।

दरियादिल इंसान,  हमें छोड़कर चलते बने ।
जबकि संगदिल वाले, सारे कसाब रह गए ।।

उसने औने पौने कीमतों पर, ली थी जमीन ।
बनाई अट्टालिका,कागज़ों पे तलाब रह गए ।।

जो उसूलों वाला था,बगैर कफ़न जल गया ।
जिनकी चोंच लंबी है,   वैसे उकाब रह गए ।।

मुल्क की आबोहवा,  किसी ने बदल दी है ।
बस मुफलिस बचपन,बेगैरत शबाब रह गए ।।

इस कदर लूट खसोट मचाई है चंद लोगों ने ।
पूरा दरिया पी गए,     केवल हबाब रह गए ।।

मुखौटे खिलौनों पे फबते हैं, इंसानों पे नहीं ।
मगर अफसोस है, कुछ ऐसे नकाब रह गए ।।

जिनको मिट्टी से था प्यार,मिल गए मिट्टी में ।
जिंदा सिर्फ,  चंद सफेदपोश जनाब रह गए ।।

वो जो सारी अच्छी बातें थीं ना,खो गईं कहीं ।
अब तो बस इताब, अजाब व सराब रह गए ।।

@मनीष सिंह "वंदन"


सराब : धोखेबाजी, अजाब : पीड़ा, इताब : क्रोध
हबाब : बुलबुला, उकाब : गिद्ध, कसाब : कसाई
रकाब : घोड़े की काठी का झूलता पायदान
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परिचय

मनीष सिंह "वंदन"वाराणसी, उत्तर प्रदेश के हैं। वर्तमान में  आदित्यपुर, जमशेदपुर, झारखंड मे निवास कर रहे हैं। कंप्यूटर में मास्टर डिग्री(M C A) के साथ साहित्य में रुचि रखते हैं। आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
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